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Amar Ujala Special: महाकालेश्वर की तरह रायपुर में भी है महाकाल धाम!, 12 ज्योतिर्लिंगों से जुड़ी है पौराणिकता
सार
Sawan 2024, Shri Mahakal Dham Amleshvar: उज्जैन के महाकालेश्वर धाम की तरह ही छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सटे अमलेश्वर में श्री महाकाल धाम है।
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श्री महाकाल धाम अमलेश्वर
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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Sawan 2024, Shri Mahakal Dham Amleshvar: उज्जैन के महाकालेश्वर धाम की तरह ही छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सटे अमलेश्वर में श्री महाकाल धाम है। वेद- पुराणों के अनुसार इस धाम की पौराणिकता 12 ज्योतिर्लिंगों से जुड़ी है। इसी वजह से इसे महाकाल धाम कहते हैं। दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर से मुड़कर खारून नदी स्वयंभू महाकाल धाम को और भी पवित्र-पावन बना देती है।
श्री महाकाल धाम में स्थापित नंदी बाबा की प्रतिमा
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। बड़ी संख्या में कांवड़ियां यहां आते हैं और खारून नदी के तट पर डूबकी लगाते हैं फिर महाकाल का दर्शन करते हैं। श्री महाकाल धाम में नियमित रूप से अलग-अलग रूपों में भगवान का श्रृंगार होता है। इसमें भगवान महाकाल के बाल रूप से लेकर अर्धनारीश्वर तक के रूपों का श्रृंगार किया जाता है। सुबह-शाम भगवान की जागरण आरती, भोग आरती फिर शयन आरती होती है।
महाकाल दरबार में विराजित शनि भगवान की प्रतिमा
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
महाकाल धाम अमलेश्वर में यजमानों के सभी प्रकार के कार्मिक अनुष्ठान विद्वानों के निर्देश में कराए जाते हैं। यहां पलाश विधि से नारायण नागबली, कालसर्प जैसे तमाम धार्मिक अनुष्ठान और पूजा अर्चना की जाती है। साथ ही विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिये कुंवारे युवाओं ने अर्क विवाह और कन्याओं ने कुंभ विवाह भी करवाया है। महाकाल धाम में करीब 20 साल से ये पूजा अनवरत जारी है। सैकड़ों की संख्या में पहुंचने वाले भक्त यहां देव दर्शन और पवित्र स्नान के बाद पूजा-पाठ कराते हैं।
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मंदिर के गर्भगृह में महाकाल बाबा
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
जानें ऐतिहासिक महत्व
श्री महाकाल धाम अमलेश्वर की पौराणिकता भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों से जुड़ी है। महाकाल धाम में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू हैं। यहां खारून नदी के बहने का आकार 'अ'के रूप में हैं। माना जाता है कि इस वजह से इस क्षेत्र का नाम अमलेश्वर पड़ा। करीब 100 साल पहले यहां घना जंगल था। यहां लोग जाने से भी डरते थे। इस इलाके में चूने की भट्ठियों पर काम करने वाले मजदूर ज्यादातर जंगल में रहा करते थे। जंगल में रहने वाले मजदूरों ने यहां अमलेश्वर लिंग की पूजा शुरू की। कालांतर में चूने की भट्ठियां बंद हो गई और वहां काम करने वाले मजदूर भी चले गए। इसके बाद यहां स्थित शिवलिंग मिट्टी में दब गया। साल 2004 में छत्तीसगढ़ के दानवीर दाऊ कल्याण सिंह के अग्रज अशोक अग्रवाल को सपने में आदेश मिला कि अमलेश्वर के एक खेत में खारुन नदी के किनारे शिवलिंग मिट्टी में दबा हुआ है। इसे निकालकर इसकी विधिवत पूजा कराई जाए। अशोक अग्रवाल के मार्गदर्शन में शिवलिंग की खोज की गई तो नदी के तट पर एक खेत में नीम के पास शिवलिंग प्रकट हुआ।
श्री महाकाल धाम अमलेश्वर की पौराणिकता भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों से जुड़ी है। महाकाल धाम में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू हैं। यहां खारून नदी के बहने का आकार 'अ'के रूप में हैं। माना जाता है कि इस वजह से इस क्षेत्र का नाम अमलेश्वर पड़ा। करीब 100 साल पहले यहां घना जंगल था। यहां लोग जाने से भी डरते थे। इस इलाके में चूने की भट्ठियों पर काम करने वाले मजदूर ज्यादातर जंगल में रहा करते थे। जंगल में रहने वाले मजदूरों ने यहां अमलेश्वर लिंग की पूजा शुरू की। कालांतर में चूने की भट्ठियां बंद हो गई और वहां काम करने वाले मजदूर भी चले गए। इसके बाद यहां स्थित शिवलिंग मिट्टी में दब गया। साल 2004 में छत्तीसगढ़ के दानवीर दाऊ कल्याण सिंह के अग्रज अशोक अग्रवाल को सपने में आदेश मिला कि अमलेश्वर के एक खेत में खारुन नदी के किनारे शिवलिंग मिट्टी में दबा हुआ है। इसे निकालकर इसकी विधिवत पूजा कराई जाए। अशोक अग्रवाल के मार्गदर्शन में शिवलिंग की खोज की गई तो नदी के तट पर एक खेत में नीम के पास शिवलिंग प्रकट हुआ।
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महाकाल धाम का प्रवेश द्वार
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
क्यों कहा गया महाकाल धाम
इस धाम के सर्वराकार पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी के अनुसार, साल 2004 में यहां पर नीम के पेड़ के पास स्वयंभू शिवलिंग मिला। तीन जुलाई और सावन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि के बाद शिवलिंग की एक टेंट में पूजा की जाने लगी और जनवरी 2024 में इस भव्य-दिव्य दरबार को श्री महाकाल धाम अमलेश्वर का नाम दे दिया गया। धाम में करीब 20 वर्षों से पूजा अनवरत चल रही है। इसी साल जनवरी में महाकाल धाम का जीर्णोंद्धार शुरू हुआ। इस मंगल तीर्थ में श्रद्धालु न केवल पूजा करते हैं बल्कि पूजन के बाद विधिवत रूद्राभिषेक एवं महाप्रसादी का आनंद भी लेते हैं।
इस धाम के सर्वराकार पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी के अनुसार, साल 2004 में यहां पर नीम के पेड़ के पास स्वयंभू शिवलिंग मिला। तीन जुलाई और सावन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि के बाद शिवलिंग की एक टेंट में पूजा की जाने लगी और जनवरी 2024 में इस भव्य-दिव्य दरबार को श्री महाकाल धाम अमलेश्वर का नाम दे दिया गया। धाम में करीब 20 वर्षों से पूजा अनवरत चल रही है। इसी साल जनवरी में महाकाल धाम का जीर्णोंद्धार शुरू हुआ। इस मंगल तीर्थ में श्रद्धालु न केवल पूजा करते हैं बल्कि पूजन के बाद विधिवत रूद्राभिषेक एवं महाप्रसादी का आनंद भी लेते हैं।