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छत्तीसगढ़: एक ऐसा समुदाय जिनके रोम-रोम में बसते हैं श्रीराम, रामायण महोत्सव में दे रहे नशामुक्ति का संदेश

Fri, 02 Jun 2023 07:38 PM IST
ललित कुमार सिंह अमर उजाला ब्यूरो, रायपुर
अमर उजाला ब्यूरो, रायपुर Published by: ललित कुमार सिंह Updated Fri, 02 Jun 2023 07:38 PM IST
सार

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में राष्ट्रीय रामायण महोत्सव का आयोजन किया गया गया है। इसमें देशभर से कलाकार प्रस्तुति देने पहुंचे हुए हैं। इसमें रामनामी समुदाय भी शिरकत कर रहा है। यह समुदाय अपने पूरे शरीर पर राम नाम लिखवाया रहता है।

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रामनामी संप्रदाय के साथ सीएम भूपेश बघेल - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में राष्ट्रीय रामायण महोत्सव का आयोजन किया गया गया है। इसमें देशभर से कलाकार प्रस्तुति देने पहुंचे हुए हैं। इसमें रामनामी समुदाय भी शिरकत कर रहा है। यह समुदाय अपने पूरे शरीर पर राम नाम लिखवाया रहता है। इस दौरान एक कलाकार ने बताया कि वो राम नाम लिखवाकर लोगों को नशामुक्त होने का संदेश देना चाहते हैं। उनका कहना है कि लोग भोजन में शाकाहार लें और मन, वचन, कर्म से किसी को बिना कष्ट दिए भगवान राम के नाम का जाप करें।
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यह समुदाय गोदना के जरिए भगवान राम के प्रति अपनी भक्ति और आस्था का भाव प्रकट करते हैं। छत्तीसगढ़ का यह संप्रदाय राम के नाम को अपने भीतर ऐसे समा लिया है कि अपने पूरे शरीर पर राम नाम का गोदना कर लिया है। उनके कपड़ों पर भी राम नाम लिखा रहता है।  भक्ति भाव की ऐसी परंपरा देश में अन्य कहीं देखने को कम ही मिलती है। रामनामी संप्रदाय ने पूरी तरह अपने को राम के रंग में रंग लिया है। उनका पूरा जीवन अपने आराध्य की भक्ति में लीन है। 

इस संप्रदाय का बसेरा उन्हीं क्षेत्रों में है, जहां से भगवान श्रीराम के पवित्र चरण गुजरे और जिन्हें अभी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल श्रीराम वन गमन पथ के रूप में विकसित कर रहे हैं। उनका बसेरा जांजगीर चांपा, शिवरीनारायण, सारंगढ़, बिलासपुर के पूर्वी क्षेत्र में है और अधिकतर ये नदी किनारे पाए जाते हैं। भगवान श्रीराम अपने वनवास के दौरान महानदी के किनारों से गुजरे और संभवतः इन इलाकों में रहने वाले लोगों को सबसे पहले उन्होंने अपने चरित्र से प्रभावित किया होगा। 



उनका मानना है कि उनके भगवान भक्त के बिना अधूरे हैं। सच्चे भक्त की खोज भगवान को भी होती है। छत्तीसगढ़ में यह पद्य बहुत चर्चित है कि हरि का नाम तू भज ले बंदे, पाछे में पछताएगा जब प्राण जाएगा छूट। रामनामी संप्रदाय के हिस्से में इस पछतावे के लिए जगह ही नहीं है क्योंकि उनका हर पल राम के नाम में लिप्त है। न केवल राम का नाम बल्कि आचरण भी वे अपने जीवन में उतारते हैं। जिस तरह वे सुंदर मोर पंख धारण करते हैं, उसी प्रकार की मन की सुंदरता भी उनके भीतर है। भगवान श्रीराम का नाम और उनका आदर्श चरित्र उनके मन को निर्मल रखता है। मयूर की तरह ही सुंदर मन के साथ वे प्रभु की भक्ति में लीन रहते हैं।

छत्तीसगढ़ के रामनामी संप्रदाय के रोम-रोम में भगवान राम बसते हैं। तन से लेकर मन तक तक भगवान राम का नाम है। इस समुदाय के लिए राम सिर्फ नाम नहीं बल्कि उनकी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ये राम भक्त लोग ‘रामनामी’ कहलाते हैं। राम की भक्ति भी इनके अंदर ऐसी है कि इनके पूरे शरीर पर ‘राम नाम’ का गोदना गुदा हुआ है। शरीर के हर हिस्से पर राम का नाम, बदन पर रामनामी चादर, सिर पर मोरपंख की पगड़ी और घुंघरू इन रामनामी लोगों की पहचान मानी जाती है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की भक्ति और गुणगान ही इनकी जिंदगी का एकमात्र मकसद है। रामनामी संप्रदाय के पांच प्रमुख प्रतीक हैं। ये हैं भजन खांब या जैतखांब, शरीर पर राम-राम का नाम गोदवाना, सफेद कपड़ा ओढ़ना, जिस पर काले रंग से राम-राम लिखा हो, घुंघरू बजाते हुए भजन करना और मोरपंखों से बना मुकट पहनना है। रामनामी समुदाय यह बताता है कि श्रीराम भक्तों की अपार श्रद्धा किसी भी सीमा से ऊपर है। 



छत्तीसगढ़ के पूर्वी और मैदानी क्षेत्रों में सतनाम पंथ के अनुयायी सतनामी समाज के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। तत्कालीन समय में जब समाज में कुरीतियां काफी व्याप्त थीं। मंदिरों में प्रवेश पर कई तरह के प्रतिबंध थे। ऐसा माना जाता है कि वर्ष 1890 के आस-पास ऐसे समय में सतनामी समाज के ही एक सदस्य वर्तमान में जांजगीर-चांपा जिले के अंतर्गत ग्राम चारपारा निवासी परशुराम ने रामनामी पंथ शुरू की थी। 


रामनामी समाज के लोगों के अनुसार शरीर में राम-राम शब्द अंकित कराने का कारण इस शाश्वत सत्य को मानना है कि जन्म से लेकर और मृत्यु के बाद भी पूरे देह को ईश्वर को समर्पित कर देना है। जब हमारी मृत्यु हो जाती है तो राम नाम सत्य है पंक्ति के साथ अंतिम संस्कार की ओर आगे बढ़ते हैं और राम नाम सत्य के उद्घोष के साथ ही पूरा शरीर राख में परिवर्तित हो जाता है। रामनामी समाज के लोग इस हाड़-मांस रूपी देह को प्रभु श्रीराम की देन मानते है। रोम-रोम में राम की उपस्थिति मानते हैं। 



रामनामी अहिंसा पर विश्वास करते हैं। सत्य बोलते हैं। सात्विक भोजन करते हैं। सतनाम पंथ के लोग सतनाम की आराधना करते हैं। वहीं रामनामी राम की आराधना करते हैं। संतनाम पंथ के संस्थापक संत गुरू घासीदास बाबा ने कहा है कि ‘अपन घट के ही देव ला मनइबो, मंदिरवा में का करे जइबों के जरिए अपने शरीर को ही मंदिर मानकर उन्हीं की पूजा आराधना व विचार को बदलने की बात कही है। वहीं रामनामी संप्रदाय के लोगों ने भी मंदिर और मूर्ति के बजाय अपने रोम-रोम में ही राम को बसा लिया और तन को मंदिर बना दिया। अब इस समाज के सभी लोग इस परंपरा को निभा रहे हैं। इनकी एक अलग पहचान है। पूरे बदन पर राम नाम का गुदना गुदवाते हैं। घरों की दीवारों पर राम के ही चित्र होते है। अभिवादन भी राम का नाम लेकर करते हैं। मानव तन ईश्वर का सबसे सुंदर रूप माना जाता है। 
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