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इस बार नहीं चली रमन की 'आदिवासी एक्सप्रेस'

Tue, 10 Dec 2013 02:02 PM IST
सुदीप ठाकुर/ अमर उजाला, दिल्ली
सुदीप ठाकुर/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Tue, 10 Dec 2013 02:02 PM IST
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raman singh has lost his strong image between

छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह ने तीसरी बार भाजपा को सत्ता जरूर दिला दी है, लेकिन नतीजे बताते हैं कि आदिवासियों के बीच उनकी और पार्टी की छवि पहले जैसी नहीं रही।

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भाजपा को आदिवासियों के लिए सुरक्षित 29 सीटों में से पिछली बार 19 सीटें मिली थीं, मगर इस बार न केवल उसकी 11 सीटें रह गईं, बल्कि गृह मंत्री ननकीराम कंवर सहित तीन आदिवासी मंत्री भी चुनाव हार गए।
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इसका असर आने वाले दिनों में प्रदेश की आदिवासी राजनीति में देखने को मिल सकता है। उल्लेखनीय है कि 13 वर्ष पहले मध्य प्रदेश को अलग कर छत्तीसगढ़ राज्य बनाए जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण इसका आदिवासी बहुल होना ही था।
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राज्य बनने के बाद अजीत जोगी के रूप में कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ को पहला आदिवासी मुख्यमंत्री दिया था। हालांकि जोगी की जाति को लेकर मामला अदालत तक भी गया और अंतत: उन्हें आदिवासी माना गया।

मगर 2003 में कांग्रेस सरकार को पराजित करने के बाद से रमन सिंह मुख्यमंत्री हैं। भाजपा के भीतर से बीच बीच में आदिवासी मुख्यमंत्री का सवाल भी उठता रहा है, जिसे हवा देने में जोगी ने भी गुरेज नहीं किया।

दिवंगत आदिवासी नेता बलीराम कश्यप के साथ मिलकर उन्होंने ऐसी ही व्यूह रचना की थी, लेकिन मामला उलट गया। उनके अलावा भाजपा से राज्यसभा सदस्य नंदकुमार साय भी बीच बीच में आदिवासी विधायकों को गोलबंद कर ‘आदिवासी एक्सप्रेस’ को सत्ता की पटरी पर लाने की कोशिश कर चुके हैं।

इस बार कांग्रेस को 39 सीटें मिली हैं, जिनमें से करीब आधी यानी 18 सीटें आदिवासी क्षेत्रों से हैं। ऐसे में रमन सिंह के सामने बड़ी चुनौती होगी कि वह आदिवासियों की भावनाओं और उनके हितों का कैसे ध्यान रखते हैं।

उनके लिए यह चुनौती इसलिए भी है, क्योंकि दस वर्षों के उनके शासन के दौरान माओवाद की चुनौती कम होने के बजाय बढ़ी ही है। प्रदेश की आबादी में आदिवासियों की हिस्सेदारी 32 फीसदी के करीब है, लेकिन मानव विकास सूचकांक में यही तबका सबसे पिछड़ा हुआ है।

छत्तीसगढ़: रमन सिंह ने लगाई हैट्रिक


रमन सिंह अलबत्ता इस बात पर खुश हो सकते हैं कि उनकी पैठ दलितों यानी अनुसूचित जाति के बीच बढ़ी है, जिनके लिए आरक्षित दस में से उन्हें नौ सीटें मिली हैं। पिछली बार भाजपा को एससी के लिए सुरक्षित सीटों में से पांच, कांग्रेस को चार और बसपा को एक सीट मिली थी।

इस बार कांग्रेस को एक सीट ही मिल पाई। उल्लेखनीय है कि इस समुदाय में सतनामी समाज की बड़ी हिस्सेदारी है, जिसका छत्तीसगढ़ की सियासत में अच्छा खासा असर रहा है।

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