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Hindi News ›   Chhattisgarh ›   Raipur News ›   Chhattisgarh Shankar Guha Niyogi Current Ground Reality in Dalli Rajhara Balod District

छत्तीसगढ़ के हालात: अपने ही शहर में बेगाने हुए शंकर गुहा, आंदोलन में भी बिखराव; आज लोग पूछते हैं कौन नियोगी

Sun, 14 Apr 2024 06:58 AM IST
मनोज मिश्र मनोज मिश्र
Updated Sun, 14 Apr 2024 06:58 AM IST
सार

अपने ही शहर में बेगाने हुए शंकर गुहा, आंदोलन में भी बिखराव छत्तीसगढ़ के श्रमिक नेता के नाम से पहचाना जाता था कभी शहर, आज लोग पूछते हैं कौन नियोगी
 

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Chhattisgarh Shankar Guha Niyogi Current Ground Reality in Dalli Rajhara Balod District
शंकर गुहा नियोगी (फाइल) - फोटो : amar ujala

विस्तार

कौन शंकर गुहा नियोगी?' कभी जिस शख्स के नाम से छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के इस शहर की पहचान हुआ करती थी, उसके बारे मैं मुख्य चौराहे पर खड़े होकर लोगों से पूछिए तो यही जवाब मिलता है। आसपास के तमाम दुकानदारों के लिए यह नाम अब अनजाना हो चुका है।

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बीते 22-23 वर्षों में देश के जुझारू श्रमिक नेताओं में से एक नियोगी की न केवल पहचान उनके अपने शहर में गुम हो गई है, बल्कि विरासत भी कई टुकड़ों में बंट गई है। 1991 में जब नियोगी की गोली मारकर हत्या की गई तो जैसे पूरे देश के श्रमिक हितों के लिए संघर्ष करने वाले तबके में उबाल सा आ गया था। दोषियों को सजा की मांग के साथ-साथ नियोगी की विरासत को सहेजने का संकल्प भी तमाम संगठनों ने लिया। लेकिन, आज उनका अपना शहर ही इस संकल्प को भूल चुका है।
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कार्यालय ढूंढ़ना तक मुश्किल
नियोगी की विरासत का दावा करने वाले जन मुक्ति मोर्चा का कार्यालय ढूंढने में खासी मशक्कत करनी पड़ती है। मिलता भी है तो शहर के बिलकुल बाहर एक जर्जर इमारत में। करीब-करीब वीरान। कार्यालय की दीवार पर लगी नेल्सन मंडेला, इरोम शर्मिला, बिरसा मुंडा, चे ग्वेरा और वीर गुंडाघूर की तस्वीरें सवाल पूछती सी लगती हैं- अब हमारा यहां क्या काम ? हमें भी किसी कोने-अतरे में फेंक दिया जाता तो ज्यादा बेहतर रहता।
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अब आंदोलन पर मिलता है दमन
जनमुक्ति मोर्चा के संचालक और शंकर गुहा नियोगी के बेटे जीत नियोगी मौजूदा हालात पर निराशा जताते हैं। कहते हैं- चुनौती बढ़ गई है। पहले आंदोलन करो तो सरकारें झुक जाती थीं। मांगें मान ली जाती थीं। मगर अब मिलता है तो बस दमन। नियोगी आगे जोड़ते हैं, इसके बावजूद हम संषर्घ को जारी रखे हुए हैं। किसानों और खदान मजदूरों के रों के हितों की लड़ाई चलती रहेगी।' लेकिन, यह सब इतना आसान नहीं दिखता। जीत नियोगी के दावों के विपरीत कुछ ही बातों से समझ में आने लगता है कि संगठन के पास समर्पित कार्यकर्ताओं की कमी है।


मजदूरों की आवाज थे नियोगी
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के संस्थापक और मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी 1970 के दशक में भिलाई स्टील प्लांट में काम करने के दौरान मजदूर नेता के तौर पर पहचाने जाने लगे थे। मजदूरों की आवाज उठाने के कारण ही उन्हें भिलाई स्टील प्लांट से बर्खास्त कर दिया गया था। नियोगी ने मजदूरों को लेकर छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ की स्थापना की। यह संगठन देशभर में 1977 में उस समय चर्चा में आया जब खदान मजदूरों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल कर दी। ठेके पर काम करने वाले मजदूरों की यह देश की सबसे बड़ी हड़ताल कही गई। उस समय भिलाई स्टील प्लांट प्रबंधन को मजदूरों की सभी मांगें माननी पड़ी थीं। 28 सितंबर 1991 को भिलाई वाले आवास पर नियोगी की गोली मारकर हत्या कर दी थी।

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