छत्तीसगढ़ : आदिवासियों को नक्सलियों की सच्चाई बताने के लिए पुलिस ने लिया कैमरे का सहारा
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छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में पुलिस द्वारा आदिवासियों को नक्सलियों के जीवन की सच्चाई बताने के लिए फिल्मों का सहारा लेने जा रही है। पुलिस ने बताया कि फिल्म की शूटिंग बस्तर के घने जंगलों में की गई है, जंगलों में बन रही 10 मिनट की इस फिल्म में जिले के पुलिस अधीक्षक, पुलिस अधिकारी और आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों ने अभिनय किया है। साथ ही इसमें स्थानीय लोगों ने भी अभिनय किया है।
दंतेवाडा जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का कहना है कि वे इस फिल्म के प्रदर्शित होने का बेसबरी से इंतजार कर रहे है। फिल्म को 'नई सुबह का सूरज' नाम दिया गया है। उन्होनें बताया कि फिल्म की शूटिंग का काम पूरा हो चुका है। संपादन के बाद यह लोगों के सामने होगी। फिल्म के निर्माता जिले के पुलिस अधीक्षक अभिषेक पल्लव हैं तथा निर्देशक अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सूरज सिंह परिहार हैं। फिल्म में जिले के अन्य पुलिस अधिकारी और कर्मचारी तथा आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों ने विभिन्न भूमिकाएं निभाई हैं।
पुलिस अधीक्षक पल्लव ने बताया कि इस फिल्म का निर्माण नक्सलियों को मुख्यधारा से जोड़ने और नक्सलवाद के सच को जनता के सामने लाने के लिए पुलिस ने एक लघु फिल्म बनाने का फैसला किया। इस फैसले के साथ ही फिल्म निर्माण का कार्य शुरू हुआ। उन्होंने कहा कि फिल्म की कहानी उनकी (अभिषेक पल्लव) और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सूरज सिंह परिहार की नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनाती के दौरान मिले अनुभव के आधार पर लिखी गई है। वहीं, अन्य महत्वपूर्ण जानकारी समर्पण कर चुके नक्सलियों से ली गई हैं।
पल्लव ने कहा कि फिल्में लोगों को किसी भी मुद्दे को समझाने व जोड़ने के लिए सबसे अच्छा साधन होती हैं। 'नई सुबह का सूरज' माओवादियों के असली चेहरे को सामने लाएगी और लोगों में नक्सलवाद के खिलाफ जागरूकता पैदा करेगी। इसके साथ ही यह फिल्म पुलिस को आदिवासियों तक पहुंचने में और मनोरंजन के माध्यम से उनका दिल जीतने में भी मदद करेगी।
उन्होंने बताया कि दंतेवाड़ा जिले के घने जंगलों में पुलिस अधिकारियों, कर्मचारियों तथा आत्मसमर्पित नक्सलियों ने लगभग एक माह तक काम कर इस फिल्म को पूरा किया है। पुलिस अधीक्षक ने कहा कि फिल्म में नक्सलवाद के विभिन्न पहलुओं को सामने लाने की कोशिश की गई है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार नक्सली क्षेत्रों में सड़क, अस्पताल और स्कूलों को नष्ट कर दिया जाता है। क्यों लोगों का जुड़ाव नक्सलवाद से होता हैं और फिर लोग इसे छोड़ देते हैं।
आत्मसमर्पण करने पर वे किस प्रकार अपने जीवन में उथल-पुथल का सामना करते हैं। इसके अलावा इस फिल्म में यह भी बताया गया है कि जब बस्तर के नक्सली नेताओं को पदोन्नत नहीं किया जाता है और उनकी जगह पड़ोसी राज्यों आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के निचले पायदान के नक्सलियों को पदोन्नत कर दिया जाता है तब किस तरह का असंतोष उत्पन्न होता है। .
इस फिल्म में महिला नक्सलियों के जबरन गर्भपात और जबरन नसबंदी जैसे मुद्दे को भी दिखाया गया है। पुलिस अधीक्षक ने बताया कि फिल्म को स्थानीय लोगों से जोड़ने के लिए हिंदी के अलावा इसे गोंडी बोली में भी रिलीज किया जाएगा। क्योंकि बस्तर क्षेत्र के ज्यादातर आदिवासी गोंडी बोली बोलते हैं।
उन्होंने कहा कि फिल्म की शूटिंग पूरी हो चुकी है और एक सप्ताह के भीतर संपादन का काम भी पूरा हो जाएगा। इसके बाद दंतेवाड़ा जिले के एजुकेशन सिटी जवांगा में फिल्म का प्रीमियर किया जाएगा।फिल्म में दंतेवाड़ा जिले के पुलिस अधीक्षक की ही भूमिका निभा रहे पल्लव ने कहा कि फिल्म को ग्राम पंचायतों के सरपंचों को भी वितरण किया जाएगा जिससे कि वे इसे अपने गावों में दिखा सकें।
उन्होंने बताया कि इस फिल्म को पूरा करने के बाद जिले में नक्सलवाद के विभिन्न पहलुओं को दर्शाने वाली कुछ और फिल्में बनाई जाएंगी। पल्लव ने कहा है कि हमें उम्मीद है इस फिल्म से पुलिस को नक्सलियों की सांस्कृतिक शाखा चेतना ‘नाट्य मंडली’ का मुकाबला करने में मदद मिलेगी जो मनोरंजन के साधनों के माध्यम से माओवादियों के प्रचार-प्रसार में लगी हुई है।