फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Chhattisgarh ›   naxal in manpur constituency in chhattisgarh assembly election 2013

चुनाव आयोग की सख्ती और नक्सलियों का खौफ

Thu, 07 Nov 2013 11:03 AM IST
सुदीप ठाकुर/ अमर उजाला, मानपुर
सुदीप ठाकुर/ अमर उजाला, मानपुर Updated Thu, 07 Nov 2013 11:03 AM IST
विज्ञापन
naxal in manpur constituency in chhattisgarh assembly election 2013

राजनांदगांव जिले के धुर नक्सल प्रभावित मानपुर के बस स्टैंड के नजदीक पहुंचते ही भाजपा और कांग्रेस उम्मीदवारों के कार्यालयों के बाहर दोनों पार्टियों के होर्डिंग्स के अलावा एक और पोस्टर ध्यान खींचता है, जिसे किसी उम्मीदवार ने नहीं लगाया है।

विज्ञापन


इस इश्तहारनुमा पोस्टर में एक लाख रुपये से लेकर दो लाख रुपये तक के इनामी नक्सली कमांडरों कमलाकर, दिवाकर, विजय, सियाबती और लच्छू की तस्वीरें लगी हुई हैं और लिखा हुआ है, 'पकड़ो, सूचना दो और इनाम पाओ।'
विज्ञापन


सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि गढ़चिरौली से महज 90 किमी दूर और बस्तर से सटे इस आदिवासी सुरक्षित क्षेत्र में चुनावी माहौल कैसा है।

पढें: सबसे कठिन चुनाव से गुजर रहे हैं रमन!
विज्ञापन
विज्ञापन


यह वही मानपुर है, जिसके मदनवाड़ा इलाके में 12 जुलाई 2009 को नक्सलियों ने पुलिस के काफिले पर हमला किया था, जिसमें एसपी वीके चौबे सहित 30 लोगों की मौत हो गई थी।

साल, सागौन, बीजा और तेंदू के घने जंगलों वाला मानपुर छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के लिए 1980 के दशक से ही महाराष्ट्र की ओर से प्रवेशद्वार की तरह रहा है, जब कोंडापल्ली सीतारमैया ने पीपुल्स वार के जरिये छत्तीसगढ़ को हिंसक वामपंथ की प्रयोगशाला बनाई थी।

लिहाजा चुनाव यहां हमेशा एक चुनौती की तरह रहे हैं। सो इस बार भी हैं, नतीजतन मानपुर-मोहला विधानसभा क्षेत्र के सभी पोलिंग बूथ अतिसंवेदनशील श्रेणी में रखे गए हैं।

पढ़ें: कैसे है छत्तीसगढ़ के राजनीतिक समीकरण

मानपुर-मोहला सहित राजनांदगांव जिले की छह विधानसभा सीटों में बस्तर की 12 सीटों के साथ ही 11 नवंबर को मतदान होना है।

राजनांदगांव को छोड़ दिया जाए, तो जिले की बाकी पांच सीटें- मानपुर-मोहला, डोंगरगांव, खुज्जी, डोंगरगढ़ और खैरागढ़ नक्सल प्रभावित हैं, उनमें मानपुर सबसे संवेदनशील है।

अकेले इस विधानसभा क्षेत्र में ही अर्ध सैन्य बलों की 36 कंपनियां तैनात हैं। वरना यहां के पांच थाना क्षेत्रों में पुलिस बल के अलावा अर्ध सैन्य बलों की एक-एक कंपनियां पहले से तैनात हैं।

कुछ तो चुनाव आयोग की सख्ती, कुछ हद तक नक्सलियों का खौफ कि चुनावी माहौल नजर नहीं आता। हालत यह है कि मानपुर से थोड़ा भीतर घुसो तो राजनीतिक कार्यकर्ताओं से अधिक सुरक्षा बल के जवान नजर आते हैं।

chhattisgarh assembly election 2013



















हालांकि जिला कलेक्टर एके अग्रवाल चुनावी तैयारियों को लेकर आश्वस्त नजर आते हैं। उन्होंने अमर उजाला से कहा, 'मानपुर ही क्यों पूरे जिले में हमारी तैयारी है। हमें उम्मीद है कि इस बार जिले में पिछली बार के 76 फीसदी की तुलना में अधिक मतदान होगा।'

पढ़ें, छत्तीसगढ़ का चुनावी दंगलः एक नजर में

बेशक, यहां पहले से अधिक जागरुकता नजर आती है, लेकिन यह जिले का सर्वाधिक पिछड़ा इलाका है। थोड़ा सा अंदर घुसो और कहानी आपके सामने।

मसलन टोह गांव को ही लीजिए, चार सौ की आबादी वाले इस गांव में सिर्फ आठवीं तक ही स्कूल है, उप स्वास्थ्य केंद्र अभी तक नहीं खुल सका है, अधिकांश छोटे किसान हैं जिनके पास एक से लेकर पांच एकड़ तक की जमीन जरूर है मगर पानी के लिए बारिश पर निर्भर हैं और गांव वालों की बातों पर यकीन करें तो यहां एकमात्र सरकारी मुलाजिम यहां का एक शिक्षाकर्मी है!

मानपुर से यहां तक तो आप कुछ कच्ची-पक्की सड़क से होकर आसानी से पहुंच सकते हैं, लेकिन इसके आगे आपका चार पहिया नहीं जा सकता। वजह है गांव को भीतर जंगल की ओर जोड़ने वाला रास्ता कई बरसों से कटा हुआ है।

कहना मुश्किल है कि नक्सलियों ने यह हालत की या फिर उस ठेकेदार ने जिसे इसे बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी! ढलती हुई शाम को यहां खड़े कुछ युवाओं से जब चुनावी माहौल और नक्सल बहिष्कार के बारे में पूछा जाता है, तो वे खुलकर कुछ नहीं बोलते।


पढें, विधान सभा चुनावों की हर एक खबर

तभी उनमें से एक लगभग चुनौती भरे स्वर में कहता है, आप लोग तो बाहर-बाहर से ही चले जाते हैं, जरा अंदर घुसकर भी हालत देखकर आइये।

वैसे यहां कहने को नौ उम्मीदवार हैं, लेकिन कांग्रेस की तेजकुंवर (जिन्हें मौजूदा विधायक शिवराज उसारे का टिकट काटकर उम्मीदवार बनाया गया है) और भाजपा के भोजेश शाह के अलावा बसपा उम्मीदवार का वाहन नजर आता है।

वरना चुनाव आयोग की सख्ती और पर्यवेक्षकों की नजर इतनी पैनी है कि प्रचार का रंग-ढंग ही बदल गया है, जिसका असर यहां भी देखा जा सकता है।

उनके गांधी

chhattisgarh assembly election 2013दिवाली के अगले दिन जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह का काफिला उनके निर्वाचन क्षेत्र राजनांदगांव में भाजपा कार्यालय के नजदीक स्थित उनके निवास पर पहुंचा तो, उसमें पूर्व सांसद प्रदीप गांधी भी थे।


गांधी को लोकसभा में सवाल पूछने के बदले पैसे लेने वाले चर्चित स्टिंग ऑपरेशन की वजह से सदस्यता गंवानी पड़ी थी, तबसे वह एक तरह से राजनीतिक निर्वासन में थे।

कभी रमन सिंह के खास लोगों में गिने जाने वाले गांधी के चचेरे भाई और जिला पंचायत अध्यक्ष दिनेश गांधी को भाजपा ने डोंगरगांव से उम्मीदवार बनाया है। लंबे समय से हाशिये की राजनीति कर रहे प्रदीप गांधी कहते हैं, 'पार्टी ने मेरा मान रखा है!'

मगर दिनेश की सबसे बड़ी मुश्किल उनके नाम के आगे लगा गांधी है। उनके खिलाफ खड़े कांग्रेस के उम्मीदवार दलेश्वर साहू अपनी सभाओं में चुटकी लेते हैं कि हमारे पास सोनिया और राहुल गांधी हैं, उनके पास हैं प्रदीप गांधी!

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed