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छत्तीसगढ़: एएसपी पदस्थापना पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पुलिस अधिकारी माधुरी धिरही की याचिका खारिज
Wed, 26 Aug 2026 03:16 PM IST
अमन कोशले
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: अमन कोशले
Updated Wed, 26 Aug 2026 03:16 PM IST
सार
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने वर्ष 2014 बैच की पुलिस अधिकारी माधुरी धिरही की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पद पर पदस्थापना के लिए खुद को अयोग्य घोषित किए जाने के निर्णय को चुनौती दी थी।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने वर्ष 2014 बैच की पुलिस अधिकारी माधुरी धिरही की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पद पर पदस्थापना के लिए खुद को अयोग्य घोषित किए जाने के निर्णय को चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने याचिका को गुणवत्ता रहित मानते हुए निरस्त कर दिया। उच्च न्यायालय ने इस मामले में अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए विभागीय पदोन्नति समिति के निर्णय में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया।
फैसला सुनाते हुए उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी द्वारा पदोन्नति की पात्रता पूरी कर लेने मात्र से उसे उच्च पद पर पदस्थापना का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने कहा कि पात्र अधिकारी को केवल पदोन्नति की प्रक्रिया में विचार किए जाने का अधिकार प्राप्त होता है। उच्च न्यायालय ने कहा कि संबंधित अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड और वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट के आधार पर उपयुक्तता का सही आकलन करने का अधिकार विभागीय पदोन्नति समिति के पास सुरक्षित है। समिति के पास यह अधिकार भी है कि वह सभी अधिकारियों पर समान रूप से लागू होने वाला न्यूनतम मानक निर्धारित करे।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि विभागीय पदोन्नति समिति ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पद पर पदस्थापना के लिए पात्र सभी अधिकारियों हेतु 'गुड' ग्रेडिंग के साथ न्यूनतम 15 अंक का मानक निर्धारित किया था। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता के सेवा रिकॉर्ड में चार 'वेरी गुड' और एक 'गुड' ग्रेडिंग दर्ज थी, जिसके आधार पर उन्हें कुल 14 अंक प्राप्त हुए थे। 15 अंक का निर्धारित मानक पूरा न होने के कारण समिति ने उन्हें इस पद के लिए फिट नहीं माना। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि संबंधित नियमों में 15 अंकों का न्यूनतम बेंचमार्क निर्धारित नहीं है।
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मामले के सभी पक्षों पर विचार करने के बाद उच्च न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह असमर्थ रहीं कि 15 अंकों का मानक उनके खिलाफ किसी भेदभावपूर्ण तरीके से लागू किया गया था। इसके साथ ही समिति के निर्णय में किसी प्रकार की दुर्भावना, पक्षपात या मनमानी का कोई ठोस आधार भी अदालत के सामने नहीं आया। इन परिस्थितियों को देखते हुए उच्च न्यायालय ने विभागीय पदोन्नति समिति के फैसले में दखल देने से साफ इन्कार कर दिया और याचिका खारिज कर दी। इस निर्णय से पदस्थापना से जुड़ी चुनौती पर विराम लग गया है।
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फैसला सुनाते हुए उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी द्वारा पदोन्नति की पात्रता पूरी कर लेने मात्र से उसे उच्च पद पर पदस्थापना का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने कहा कि पात्र अधिकारी को केवल पदोन्नति की प्रक्रिया में विचार किए जाने का अधिकार प्राप्त होता है। उच्च न्यायालय ने कहा कि संबंधित अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड और वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट के आधार पर उपयुक्तता का सही आकलन करने का अधिकार विभागीय पदोन्नति समिति के पास सुरक्षित है। समिति के पास यह अधिकार भी है कि वह सभी अधिकारियों पर समान रूप से लागू होने वाला न्यूनतम मानक निर्धारित करे।
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सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि विभागीय पदोन्नति समिति ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पद पर पदस्थापना के लिए पात्र सभी अधिकारियों हेतु 'गुड' ग्रेडिंग के साथ न्यूनतम 15 अंक का मानक निर्धारित किया था। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता के सेवा रिकॉर्ड में चार 'वेरी गुड' और एक 'गुड' ग्रेडिंग दर्ज थी, जिसके आधार पर उन्हें कुल 14 अंक प्राप्त हुए थे। 15 अंक का निर्धारित मानक पूरा न होने के कारण समिति ने उन्हें इस पद के लिए फिट नहीं माना। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि संबंधित नियमों में 15 अंकों का न्यूनतम बेंचमार्क निर्धारित नहीं है।
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मामले के सभी पक्षों पर विचार करने के बाद उच्च न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह असमर्थ रहीं कि 15 अंकों का मानक उनके खिलाफ किसी भेदभावपूर्ण तरीके से लागू किया गया था। इसके साथ ही समिति के निर्णय में किसी प्रकार की दुर्भावना, पक्षपात या मनमानी का कोई ठोस आधार भी अदालत के सामने नहीं आया। इन परिस्थितियों को देखते हुए उच्च न्यायालय ने विभागीय पदोन्नति समिति के फैसले में दखल देने से साफ इन्कार कर दिया और याचिका खारिज कर दी। इस निर्णय से पदस्थापना से जुड़ी चुनौती पर विराम लग गया है।