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Rajnandgaon: शिव-पार्वती के विवाह के बाद किया गया गौरा-गौरी का विसर्जन, नाचते-गाते निकली महिलाएं
Wed, 26 Oct 2022 06:44 PM IST
मोहनीश श्रीवास्तव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, राजनांदगांव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, राजनांदगांव
Published by: मोहनीश श्रीवास्तव
Updated Wed, 26 Oct 2022 06:44 PM IST
सार
छत्तीसगढ़ में गौरा गौरी उत्सव का एक अलग महत्व है। प्रत्येक वर्ष दीपावली और लक्ष्मी पूजा के बाद मनाया जाता है। विशेष तौर पर भगवान शिव पार्वती की पूजा-अर्चना और उनके विवाह की रस्म निभाई जाती है। भक्त बड़ी संख्या में धूमधाम से खुद बाराती बनकर माता पार्वती और शिव जी के विवाह उत्सव में शामिल होते हैं।
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राजनांदगांव में गौरा-गौरी विसर्जन यात्रा निकाली गई।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में गौरा-गौरी का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। तीन दिनों तक चलने वाले इस पर्व के बाद बुधवार को गौरा-गौरी की विसर्जन यात्रा निकाली गई। इस दौरान महिलाएं, बच्चे सब उनकी धुन और मगन में झूमते हुए निकले। तीन दिनों तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत धनतेरस के दिन हुई थी। इस दौरान शिव-पार्वती के विवाह की रस्म निभाई गई और श्रद्धा पूर्वक पूजन किया गया।
दरअसल, दिवाली के अगले दिन गौरा-गौरी विसर्जन यात्रा निकाली जाती है और तालाब में विसर्जन होता है, लेकिन इस बार सूर्य ग्रहण होने के कारण यह रस्म एक दिन बाद निभाई गई। शहर के विभिन्न क्षेत्रों में गौरा-गौरी विसर्जन कार्यक्रम धूमधाम से मनाया गया। विधि विधान से पूजा-अर्चना की गई। दीपावली के दिन दोपहर में तालाब से काली मिट्टी लाकर गौरा गौरी की मूर्ति बनाकर रंग रोगन किया गया।
छत्तीसगढ़ में गौरा गौरी उत्सव का एक अलग महत्व है। प्रत्येक वर्ष दीपावली और लक्ष्मी पूजा के बाद मनाया जाता है। विशेष तौर पर भगवान शिव पार्वती की पूजा-अर्चना और उनके विवाह की रस्म निभाई जाती है। भक्त बड़ी संख्या में धूमधाम से खुद बाराती बनकर माता पार्वती और शिव जी के विवाह उत्सव में शामिल होते हैं। फिर रात भर भजन-कीर्तन व गीत पारंपरिक रूप से गाते हुए शिव पार्वती का विवाह संपन्न किया जाता है।
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दरअसल, दिवाली के अगले दिन गौरा-गौरी विसर्जन यात्रा निकाली जाती है और तालाब में विसर्जन होता है, लेकिन इस बार सूर्य ग्रहण होने के कारण यह रस्म एक दिन बाद निभाई गई। शहर के विभिन्न क्षेत्रों में गौरा-गौरी विसर्जन कार्यक्रम धूमधाम से मनाया गया। विधि विधान से पूजा-अर्चना की गई। दीपावली के दिन दोपहर में तालाब से काली मिट्टी लाकर गौरा गौरी की मूर्ति बनाकर रंग रोगन किया गया।
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छत्तीसगढ़ में गौरा गौरी उत्सव का एक अलग महत्व है। प्रत्येक वर्ष दीपावली और लक्ष्मी पूजा के बाद मनाया जाता है। विशेष तौर पर भगवान शिव पार्वती की पूजा-अर्चना और उनके विवाह की रस्म निभाई जाती है। भक्त बड़ी संख्या में धूमधाम से खुद बाराती बनकर माता पार्वती और शिव जी के विवाह उत्सव में शामिल होते हैं। फिर रात भर भजन-कीर्तन व गीत पारंपरिक रूप से गाते हुए शिव पार्वती का विवाह संपन्न किया जाता है।
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