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कोयला खदान आवंटन रद्द, कंपनियां परेशान

Sun, 23 Feb 2014 11:21 AM IST
Updated Sun, 23 Feb 2014 11:21 AM IST
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coal blocks de allocation chattisgarh

छत्तीसगढ़ की आठ कोयला खदानों का आवंटन रद्द करने के केंद्र सरकार के फ़ैसले ने औद्योगिक घरानों की परेशानी बढ़ा दी है। माना जा रहा है कि केंद्र सरकार की अंतर-मंत्रालय समूह की सिफारिशों के आधार पर राज्य में कुछ और कोयला खदानों के आवंटन रद्द हो सकते हैं।

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केंद्र सरकार के अंतर-मंत्रालय समूह ने देश भर की 61 कोयला खदानों के आवंटन को लेकर 15 जनवरी को नोटिस जारी किया था। इसके बाद 28 कोयला खदानों का आवंटन रद्द करने का निर्णय लिया गया।
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राज्य के खनिज सचिव एमके त्यागी का कहना है, “यह केंद्र सरकार का विषय है। कोयला खदानों का आवंटन काग़ज़ पर हुआ था और काग़ज़ पर ही रद्द भी हो गया। जो चीज़ भौतिक रूप से है ही नहीं, उसका राज्य की खनन व्यवस्था पर भी असर नहीं होगा। ”
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दूसरी ओर जिंदल समूह के प्रवक्ता का कहना है, “कोयला मंत्रालय द्वारा छत्तीसगढ़ में आवंटित गारे-पलमा कोयला खदान का आवंटन रद्द करने का कोई कारण हमें नज़र नहीं आ रहा है। हम इस मामले को अदालत में ले कर गए हैं।”

वहीं छत्तीसगढ़ में अलग-अलग कोयला खदानों के खिलाफ आंदोलन चला रहे जन संगठन इसे एक सकारात्मक क़दम बता रहे हैं। वन्यजीव और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वालों ने भी केंद्र सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया है।

राज्य में नेता प्रतिपक्ष का मानना है कि जिस तरीक़े से कोल खदानों का आवंटन हुआ था, उसमें राज्य सरकार की भूमिका ग़ैर-ज़िम्मेदराना थी।

देश का कुल 17.24% कोयला छत्तीसगढ़ में

coal blocks de allocation chattisgarh

राज्य सरकार के अनुसार देश का कुल 17.24 प्रतिशत कोयला भंडार छत्तीसगढ़ में है। राज्य के कोरबा, रायगढ़, कोरिया और सरगुजा ज़िले में 49 हज़ार 280 मिलियन टन कोयला ज़मीन के नीचे है। देश के कोयला उत्पादन में छत्तीसगढ़ हर साल 21 प्रतिशत से अधिक का योगदान करता है।

राज्य में कुल 39 कोयला खदानों से कोयला निकाला जाता है, जिनमें रायगढ़ और कोरबा ज़िले में छह-छह खदानें हैं, जबकि सूरजपुर और कोरिया ज़िले में 11-11 खदानें हैं। इसके अलावा सरगुजा में चार और बलरामपुर में एक कोयला खदान है। अधिकांश कोयला खदानों से निकले कोयले का इस्तेमाल उद्योग धंधों और विशेषकर बिजली उत्पादन में होता है।

छत्तीसगढ़ सरकार का दावा है कि राज्य में बिजली का उत्पादन आवश्यकता से कहीं अधिक होता है और छत्तीसगढ़ पावर सरप्लस राज्य है। देश के 18वें ऊर्जा सर्वेक्षण के अनुसार छत्तीसगढ़ राज्य को वर्ष 2017 तक अधिकतम 4325 मेगावॉट बिजली की ज़रूरत होगी। लेकिन अभी भी राज्य में सात हज़ार मेगावॉट से अधिक बिजली का उत्पादन होता है।

भाजपा की सरकार ने पिछले कुछ सालों में राज्य में पावर प्लांट लगाने के लिए 91 निजी कंपनियों से समझौता किया था, जिनमें से 8 कंपनियों में तो विद्युत उत्पादन भी शुरू हो गया है। राज्य सरकार ने आने वाले कुछ सालों में राज्य में 60 हज़ार मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा है।

ज़ाहिर तौर पर छत्तीसगढ़ सरकार ने दूसरे राज्यों और औद्योगिक घरानों को बेचने के लिए राज्य में बड़ी संख्या में पावर प्लांट लगाने के निर्णय लिए हैं। लेकिन पावर प्लांट लगाने वाली कंपनियों के कोल ब्लॉक रद्द होने से राज्य सरकार की योजना मुश्किल में पड़ सकती है।

आवंटन रद्द होने से सामाजिक कार्यकर्ता खुश

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हालांकि राज्य में कोल ब्लॉक के आवंटन रद्द होने से सामाजिक कार्यकर्ता ख़ुश हैं। 'छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन' के आलोक शुक्ला का कहना है कि कोल आवंटन का रद्द होना उन लोगों के लिए राहत की बात है, जो इन कोयला खदानों का विरोध कर रहे हैं।

आलोक का कहना है कि जहां यह कोयला खदान आवंटित हुए हैं, वे घने जंगल के इलाके हैं और इन जंगलों में रहने वाले आदिवासियों की पूरी आजीविका इन्हीं जंगलों पर निर्भर है।

आलोक कहते हैं, “कोरबा, रायगढ़, जशपुर और सरगुजा ज़िले में अगर यह कोयला खदान शुरू हो जातीं तो कम से कम ढाई लाख लोगों को अपनी उस ज़मीन से बेदखल होना पड़ता, जहां वो सदियों से रहते आए हैं।”

वन्यजीव विशेषज्ञ और कंजर्वेशन कोर सोसायटी की मीतू गुप्ता का मानना है कि अभी राज्य के जंगल से खनन का खतरा टला नहीं है। उनका कहना है कि बिजली उत्पादन का हवाला दे कर कोल ब्लॉक का आवंटन फिर से हो जाए तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

मीतू कहती हैं, “छत्तीसगढ़ के जिन इलाकों को कोल ब्लॉक के लिए आवंटित किया गया था, ये वे इलाके हैं, जो जैव विविधता से भरपूर हैं। अगर हम केवल नकिया कोल ब्लॉक को देखें तो नकिया कोल ब्लॉक के कारण चार लाख पेड़ों की बलि दी जाती। ये वे इलाके हैं, जो छत्तीसगढ़ के दो सौ हाथियों के निवास स्थल हैं। अगर यहां कोल ब्लॉक आ जाते तो यहां की जैव विविधता और हाथियों का क्या होगा?”

विस्थापन का मुद्दा

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राज्य में नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव भी पर्यावरण और गांवों के विस्थापन को एक बड़ा मुद्दा मानते हैं। सिंहदेव का कहना है कि जिस तरह से कोयला खदानों के आवंटन को मंजूरी दी गई थी, उसमें राज्य सरकार की भूमिका ग़ैर-ज़िम्मेदराना थी।

सिंहदेव कहते हैं, “कोल उत्खनन और विस्थापन ऐसा मुद्दा है, जिस पर ध्यान ही नहीं दिया जाता।" वे कहते हैं, "कोयला उत्खनन के लिए ली गई ज़मीन को उत्खनन के बाद वापस उसी स्थिति में उसके मालिक को सौंपा जा सकता है और इसमें कहीं दिक्कत नहीं है। लेकिन इस ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता।”

जिंदल स्टील पावर लिमिटेड ने गारे-पलमा के कोल ब्लॉक 4/6 पर कोयला मंत्रालय के निर्णय को अदालत में चुनौती दी है। उम्मीद जताई जा रही है कि कुछ और औद्योगिक घराने जिंदल की राह पर चल सकते हैं।

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