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10 दिन में दो हाथियों, कई हिरणों की मौत

Sun, 25 May 2014 01:25 PM IST
आलोक प्रकाश पुतुल/छत्तीसगढ़ से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
आलोक प्रकाश पुतुल/छत्तीसगढ़ से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए Updated Sun, 25 May 2014 01:25 PM IST
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chhattisgarh poaching deer

छत्तीसगढ़ में जंगली जानवरों के शिकार और उनकी संदिग्ध मौत के मामलों की बाढ़ सी आ गई है। पिछले 10 दिन में यहां दो हाथी और चार भालुओं समेत कई जानवर मारे गए हैं। वन विभाग ने शिकार की घटनाओं पर रोक की बात की है, लेकिन इसके बावजूद जानवरों के शिकार की वारदात कम नहीं हुई हैं।

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ताज़ा मामला बारनवापारा अभयारण्य का है, जहां रवान इलाके में दर्जन भर हिरणों के शिकार का मामला सामने आया है। शिकारियों ने वन विभाग के रिसॉर्ट से लगे तालाब के पास पानी में यूरिया खाद मिलाकर हिरणों को मार डाला। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि शिकारी पानी वाली जगह पर मिट्टी या प्लास्टिक के पात्र में ज़हरीला पानी भरकर उसे ज़मीन में गाड़ देते हैं। जैसे ही जानवर यह पानी पीता है, उसकी मौत हो जाती है।
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राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक, वन्यप्राणी रामप्रकाश के अनुसार, "हिरणों को पानी में यूरिया मिलाकर मारने की यह घटना हमारे संवेदनहीन होते समाज का परिचायक है। हमारी सोच का स्तर इस हद तक गिर गया है कि हम मूक जानवरों की प्यास बुझाने के बजाए उनकी हत्या कर रहे हैं।"
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कार्रवाई नहीं

हालांकि रामप्रकाश शिकार को लेकर वन विभाग की लापरवाही स्वीकार नहीं करते। उनका तर्क है कि जिस इलाक़े में हिरण मारे गए हैं, वह वन विकास निगम का इलाक़ा है। वहीं वन विकास निगम के मंडल प्रबंधक का कहना है कि जिस तालाब के पास यह घटना हुई है, उसका दूसरा हिस्सा अभयारण्य से लगा है।

ज़ाहिर है, यह पहला मामला नहीं है जब वन विभाग के अधिकारी मामले को एक-दूसरे के पाले में फेंक रहे हैं। इसके चलते जानवरों की मौत की ज़िम्मेदारी तय नहीं हो पाती। इसी साल 15 जनवरी को बिलासपुर के कानन पेंडारी स्मॉल ज़ू में 22 हिरण मरे पाए गए थे। इनकी मौत एंथ्रेक्स बताकर शवों को आनन-फ़ानन में दफ़ना दिया गया था।

जांच के बाद पता चला था कि हिरणों की मौत एंथ्रेक्स से नहीं हुई थी। इस मामले में भी शिकार का अंदेशा जताया गया था लेकिन वन विभाग आज तक यह बताने की स्थिति में नहीं है कि हिरणों की मौत कैसे हुई थी।

पहले भी कई केस

इससे पहले भी राज्य में तीन बाघों का शिकार हुआ था। एक बार राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह के इलाक़े राजनांदगांव में भीड़ ने एक बाघ को पीट-पीटकर मार डाला था। तब मौक़े पर तैनात वन अधिकारी चुप्पी साध गए थे। बाद में पूरे मामले की जांच में कई अधिकारियों को ज़िम्मेदार ठहराया गया था पर आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इसी तरह भोरमदेव अभयारण्य में भी एक बाघ के शिकार के मामले में कुछ आदिवासियों को यह कहकर गिरफ़्तार कर लिया गया कि उन्होंने ज़हर देकर बाघ को मारा है। बाद में बैलिस्टिक रिपोर्ट से पता चला था कि बाघ की हत्या गोली मारकर की गई थी। ज़ाहिर है, अब तक यह पता नहीं चल पाया है कि बाघ का शिकार किसने किया था।

कंज़र्वेशन कोर सोसायटी के लिए मध्य भारत में कार्यरत वन्य जीव विशेषज्ञ मीतू गुप्ता कहती हैं, "वन प्रबंधन का अभाव, अतिक्रमण और जंगल की कटाई के कारण जानवर मारे जा रहे हैं। रायगढ़ समेत दूसरे इलाक़ों में मायनिंग जानवरों की मौत का कारण बन रही है। गर्मी के दिनों में संरक्षित क्षेत्रों के अंदर पानी न होने से जानवर पानी की तलाश में मानव बस्तियों के पास आकर मौत के शिकार हो रहे हैं।"


उनका कहना है कि राज्य में शिकार के मामलों की जांच को लेकर भी कोई खास गंभीरता नज़र नहीं आती। जब तक जांच की दिशा में गंभीरता नहीं बरती जाएगी, शिकार पर रोक असंभव है।

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