सरकार और कानून के फेर में उलझा आदिवासियों का हक
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छत्तीसगढ़ सरकार बड़े पैमाने पर ग्रामीणों की जमीन अधिग्रहित कर रही है। किसान कानूनी तरीकों से अपनी जमीन बचाना चाह रहे हैं लेकिन उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। आदिवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए बनाए गए कानून का उल्लंघन हो रहा है। आदिवासी भूमि अधिग्रहण के सिलसिले में हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने की तैयारी कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ में कोरबा के लक्ष्मी चौहान इन दिनों सरकारी दस्तावेजों में उलझे हुए हैं। कानून की बारीकियों को समझने वाले लक्ष्मी चौहान यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उनके जिले के हजारों किसानों की जमीन पर सरकारी नियत्रंण की कोशिशों को कैसे रोका जाए।
एशिया की सबसे बड़ी कोयला खदानों वाला छत्तीसगढ़ का कोरबा संविधान की पांचवी अनुसूची वाला इलाका है। आदिवासियों और क्षेत्र के मूल निवासियों के हितों के संरक्षण के लिए संविधान में अनुसूचित क्षेत्र का प्रावधान है।
जिम्मा किसका?
इन इलाकों में वर्ष 1996 में बनाया गया पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया यानी 'पेसा' कानून का प्रावधान है, जहां ग्राम सभा की अनुमति के बिना किसी भी जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता। छत्तीसगढ़ की 9734 ग्राम पंचायतों में से 4507 पंचायतों में 'पेसा' कानून लागू है। 'पेसा' कानून लागू होने के बाद भी भारत सरकार का उपक्रम कोल इंडिया ऐसे किसी कानून को नहीं मानता।
वर्ष 1996 में 'पेसा' कानून लागू होने के बाद से शायद ही कभी कोल इंडिया ने इस कानून का कहीं भी पालन किया हो। भारत सरकार की कोल इंडिया के अंतर्गत कुल 11 कंपनियां भारत और भारत से बाहर कोयला खनन का काम करती हैं। इन्हीं में से एक साउथ इस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कोयला खनन करती है।
साउथ इस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के भू राजस्व महाप्रबंधक कहते हैं, "'पेसा' कानून के प्रावधान, भू-अर्जन अधिनियम के तहत अर्जित भूमि पर लागू होते हैं। हम कोल बेयरिंग एक्ट 1957 के तहत जमीनों का अधिग्रहण करते हैं, इसलिये 'पेसा' कानून 1996 यहां लागू नहीं होता।
"ताजा मामला कोरबा के पोड़ी, रलिया, भठोरा, वाहनपाठ और अमगांव इलाके का है, जहां से साढ़े तीन हजार से अधिक ग्रामीणों की जमीन या तो ली जा चुकी है या उसकी प्रक्रिया जारी है। कोरबा के लक्ष्मी चौहान ने सबसे पहले कानून मंत्रालय से जानना चाहा कि आखिर 'पेसा' कानून के लागू करने का जिम्मा किसका है।
विभाग ने पल्ला झाड़ा
कानून मंत्रालय ने कोयला मंत्रालय और ग्रामीण विकास विभाग को पत्र भेज कर पल्ला झाड़ लिया। ग्रामीण विकास विभाग ने इस पत्र को पंचायत विभाग को प्रेषित कर दिया। पंचायत विभाग ने मामले में राज्य सरकार को जिम्मेवार बता कर अपना कर्तव्य पूरा कर लिया।
इस दौरान ज़िलाधिकारी ने लक्ष्मी चौहान के एक अन्य आवेदन पर कार्रवाई करते हुए माना कि इलाके में कोल इंडिया के उपक्रम साउथ इस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड 'पेसा' कानून का पालन नहीं कर रहा है और राज्य सरकार की ओर से साउथ इस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड को 'पेसा' कानून लागू करने के निर्देश दिए जा सकते हैं।लक्ष्मी चौहान इस मामले को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भी गए लेकिन वहां से भी उन्हें राहत नहीं मिली। फिलहाल वे 'पेसा' कानून के प्रावधानों को लेकर उच्चतम न्यायालय में जाने की तैयारी कर रहे हैं।
लेकिन छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला का मानना है कि आदिवासियों से जुड़े अधिकांश कानून छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में नज़रअंदाज़ किए जा रहे हैं।
परसा-केते-बासन कोयला खदान को लेकर हुई ग्राम सभा का उदाहरण देते हुए आलोक कहते हैं, "सरकार ने एक ही ग्राम सभा में आदिवासियों को पट्टा भी दिया और उसी ग्राम सभा में उनसे पट्टा लेकर उन्हें चेक थमा दिए गए। आप इस इलाके में 'पेसा' कानून, सामुदायिक अधिकार या वन अधिकार कानून की बात तो भूल ही जाइए।"
नहीं है कोई कानून
'पेसा' कानून को लेकर सरकार का रुख कैसा है, इसे जानने के लिए सूरजपुर जिले के प्रेमनगर ग्राम पंचायत का हाल देखना दिलचस्प है। गांव में इफ्को ने जब अपना पावर प्लांट लगाने के लिए 'पेसा' कानून के तहत ग्राम सभा बुलाई तो ग्रामीण पावर प्लांट के ख़िलाफ़ अड़ गए। पंचायत ने कम से कम एक दर्जन बार ग्राम सभा में इस पावर प्लांट के ख़िलाफ प्रस्ताव पारित किया। इफ्को की बात बनी नहीं।
फिर एक दिन राज्य सरकार ने रातों-रात प्रेमनगर को ग्राम पंचायत के बजाए नगर पंचायत बनाने की घोषणा कर दी। मतलब प्रेमनगर गांव के बजाए नगर बनते ही 'पेसा' कानून के दायरे से बाहर हो गया और इफ्को का रास्ता साफ हो गया।
देश में कोयला खदानों को लेकर उच्चतम न्यायालय में याचिका लगाने वाले सुदीप श्रीवास्तव का कहना है कि भारतीय संविधान में पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया यानी 'पेसा' कानून तो है लेकिन म्युनिस्पल एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया जैसा कोई कानून नहीं है।