भिलाई हादसाः 'सुरक्षा के अभाव में हुई मौतें'
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छत्तीसगढ़ के भिलाई में गैस हादसे में छह लोगों की मौत के बाद श्रमिकों का कहना है कि अगर प्रबंधन सजग होता तो इस हादसे में मारे गए लोगों की जान बच सकती थी। श्रमिकों का आरोप है कि मौके पर सुरक्षा और बचाव के साधन ही नहीं थे।
श्रमिकों ने सुरक्षा के इन सवालों को लेकर गुरुवार को जमकर प्रदर्शन किया और इस्पात संयंत्र के प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए।
शुक्रवार की सुबह भी मज़दूर संगठन सीटू के सदस्यों ने मौन प्रदर्शन किया।
ग़ौरतलब है कि देश के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के इस्पात भिलाई संयंत्र में यह हादसा कल शाम को उस समय हुआ, जब ब्लास्ट फर्नेस में पानी की आपूर्ति करने वाले पाइपलाइन की मरम्मत चल रही थी।
शुरुआती तौर पर जो जानकारी आई है, उसके अनुसार पानी की पाइपलाइन फटी और उसके बाद पास की गैस पाइपलाइन भी फट गई, जिसके कारण उस पूरे इलाक़े में मिथेन और कार्बन मोनो ऑक्साइड का रिसाव शुरू हो गया।
'सुरक्षा के लचर इंतजाम'
इस हादसे में दो उप महाप्रबंधकों समेत छह लोगों की मौत हुई है। मरने वालों में वाटर मैनेजमेंट विभाग के डीजीएम इंचार्ज बीके सिंह, डीजीएम एनसी कटारिया, चार्जमैन ए। सेमुएल, सीनियर ऑपरेटर वाईएस साहू, फायरमैन रमेश कुमार शर्मा और ठेका श्रमिक विकास वर्मा शामिल हैं।
क्लिक करें भिलाई इस्पात संयंत्र में काम करने वाले कर्मचारियों की मानें तो इस संयंत्र में लगभग 80 हज़ार लोग काम करते हैं लेकिन सुरक्षा और बचाव के इंतजाम बेहद लचर हैं। इस हादसे के बाद संयंत्र में एंबुलेंस की उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठे हैं।
हिंदुस्तान स्टील सप्लाई यूनियन के अध्यक्ष एसपी डे कहते हैं, "आपदा से बचाव का कोई इंतजाम नहीं था। इस हादसे के समय स्टील प्लांट के भीतर केवल एक एंबुलेंस थी।"
उन्होंने कहा, "जब हम लोगों को ख़बर मिली तब कहीं जा कर दूसरे एंबुलेंस का इंतजाम किया गया। अगर समय पर एंबुलेंस मिल जाती तो कई लोगों की जान बच सकती थी।"
रिसाव की घटना
मौके पर बचाव के लिए पहुंचे केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के एक जवान ने बताया कि इस घटना के बाद जो लोग बचाव के लिए पहुंचे, उनके पास गैस से बचने के लिए कोई मास्क नहीं था और बचाव करने वाले लोग अपने मुंह पर गीला रुमाल बांध कर बचाव और राहत में जुटे हुए थे।
यह पहला मौका नहीं है, जब गैस रिसाव के कारण भिलाई इस्पात क्लिक करें संयंत्र में हादसा हुआ है।
इससे पहले इसी साल 29 मार्च को गैस रिसाव के कारण संयंत्र में आग लग गई थी। 14 मार्च 2013 को भी गैस रिसाव के कारण तीन श्रमिकों को अस्पताल ले जाना पड़ा था। पिछले साल ही 27 जुलाई को गैस रिसाव की चपेट में आने के बाद एक श्रमिक को अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
हादसे वाली जगह पर ही काम करने वाले कृष्ण कुमार समेत कई श्रमिकों ने आरोप लगाया कि जिस जगह से गुरुवार को गैस का रिसाव हुआ, चार दिन पहले भी वहां यह समस्या आई थी। उस समय भी संयंत्र के एक अधिकारी गैस रिसाव की चपेट में आने के कारण बेहोश हो गए थे।
'आपदा प्रबंधन की असफलता'
कृष्ण कुमार कहते हैं, "अगर उसी दिन प्लांट को बंद कर के पाइपलाइन को सुधार लिया गया होता तो आज यह नौबत नहीं आती।"
भिलाई इस्पात संयंत्र इस पूरे मामले पर बात करने के लिये तैयार नहीं है। कल शाम की घटना के बाद भी प्रबंधन का पहला अधिकृत बयान घटना के लगभग पांच घंटे बाद ही आ पाया।
प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और विधायक भूपेश बघेल ने अस्पताल का दौरा करने के बाद कहा, "आपदा प्रबंधन किस तरह असफल है, यह इससे पता चलता है कि कितने लोग घायल हुए, कितने लोग मरे, कौन कहां भर्ती है, इसमें से कुछ भी ठीक-ठीक नहीं पता है। कोई बताने वाला भी नहीं है।"
हालांकि राज्य के श्रम मंत्री अमर अग्रवाल का कहना है कि फिलहाल इस हादसे में जो लोग गैस की चपेट में आए हैं, हम उनके इलाज पर ध्यान दे रहे हैं।
अमर अग्रवाल कहते हैं, "पूरे मामले की न्यायिक जांच की घोषणा कर दी गई है और जो भी इसके लिये ज़िम्मेदार होगा, उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से सरकार पीछे नहीं हटेगी।"