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बस्तर में बैलेट और बुलेट की लड़ाई

Sat, 09 Nov 2013 04:13 PM IST
सुदीप ठाकुर/ अमर उजाला,सुकमा-दंतेवाड़ा
सुदीप ठाकुर/ अमर उजाला,सुकमा-दंतेवाड़ा Updated Sat, 09 Nov 2013 04:13 PM IST
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bastar in chhattisgarh assembly election

बस्तर एक बार फिर बैलेट और बुलेट की लड़ाई के लिए तैयार है। यों बस्तर में हमेशा चुनाव, लोकतांत्रिक व्यवस्था को खारिज करने वाले नक्सलियों की वजह से चुनौतीपूर्ण रहे हैं, लेकिन इस वर्ष 25 मई को जीरमघाटी में छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के काफिले पर हुए भीषण हमले के बाद यहां का नजारा पूरी तरह बदल गया है।

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हालत यह है कि जिस जगह पर यह हमला हुआ था, वहां अब सीआरपीएफ की एक चौकी बन गई है और जगदलपुर से कुछ किमी आगे निकलते ही दरभा और जीरम घाटी में चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बलों के जवान नजर आ रहे हैं।
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वास्तव में बस्तर लोकतंत्र की प्रयोगशाला बन गया है, जहां हर पांच वर्ष में आदिवासियों को साबित करना पड़ता है कि वे राष्ट्र की मुख्यधारा का हिस्सा हैं या नहीं।
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यह अलग बात है कि बीते छह दशकों में विकास का उनका पूरा हिस्सा उन तक नहीं पहुंच सका है। जीरमघाटी में रहने वाले मड़कमी बोंजा से बेहतर भला इसे कौन जान सकता है।

chhattisgarh assembly election 2013एक तो यहां लोग आपसे बात नहीं करना चाहते, यदि तैयार हो जाएं, तो भाषा की दिक्कत आती है। मगर इसके बावजूद टूटी फूटी हिंदी में मड़कमी बोंजा ने जो कुछ बताया उससे बस्तर की एक समझ बनती है।

मड़कमी बोंजा ने जगदलपुर से बड़ा कोई शहर नहीं देखा है, वह कभी ट्रेन में नहीं बैठा। उसके पास कहने को थोड़ी जमीन है, लेकिन गुजर बसर करने के लिए रोजी मजदूरी करनी पड़ती है।

उसके पास राशन कार्ड है, मगर उसके हिस्से का पूरा अनाज नहीं मिलता। मनरेगा वाला कार्ड नहीं है और न ही उसे ठीक से यह भी पता है कि मनरेगा में रोजी की दर कितनी है।

यदि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लगातार यह कहते आए हैं कि माओवादी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं, तो इसकी तस्दीक जीरम घाटी से कुछ आगे जाते ही हो जाती है, जहां सुरक्षा व्यवस्था को ताक पर रखकर पोलेम गांव में नक्सलियों ने सड़क किनारे के पेड़ों पर चुनाव बहिष्कार के पर्चे लगा रखे हैं!

ऐसे पर्चे सुकमा से दंतेवाड़ा के रास्ते पर भी कई जगह नजर आए।

इनमें प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा, से लेकर कांग्रेस, कम्युनिष्ट पार्टियों तक को जमकर कोसा गया है और लिखा हुआ है 'क्रांतिकारी जनताना सरकार ही लुटेरी व्यवस्था का एकमात्र विकल्प! ' लेकिन इन पर्चों के बारे में बताने वाला कोई नहीं मिला।

वास्तव में चुनावों ने बस्तर की पूरी काया ही बदल दी है। हालत यह है कि स्कूल से लेकर, उपस्वास्थ्य केंद्र, पंचायत भवन, आयुर्वेद शाला से लेकर छात्रावासों तक में सुरक्षा बलों के जवानों को ठहराया गया है।

chhattisgarh assembly election 2013
















स्कूल तो दशहरे से जो बंद हैं, सो अब चुनाव के बाद ही खुलेंगे। सुरक्षा बलों ने सड़कों पर जगह-जगह बड़े वाहनों के पहियों से बेरिकेड्स बना रखे हैं और किसी भी वाहन को बिना जांच आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक बस्तर की कुल 12 सीटों के लिए पचास हजार से अधिक अतिरिक्त सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है।

सैकड़ों मतदान केंद्रों तक मतदान दलों को हेलीकॉप्टरों से पहुंचाया जा रहा है। मगर इतनी सुरक्षा के बावजदू कहना मुश्किल है कि अंदर के क्षेत्रों में ठीक से मतदान हो भी पाएगा। स्थानीय पत्रकार सुरेश महापात्र चुटकी लेते हैं, 'सरकार जब वोटिंग नहीं करा सकती, तो विकास कैसे कराएगी।'

ऐसा नहीं है कि यहां विकास नहीं हुआ है। इन क्षेत्रों में उम्मीदवारों के प्रचार वाहनों से अधिक बार तो राज्य सरकार की सुरक्षित प्रसव कराने वाली योजना का वाहन 'मितानिन एक्सप्रेस' और राष्ट्रीय ग्रामीण सुरक्षा कार्यक्रम के तहत चलने वाली 108 नंबर की एंबुलेंस नजर आ जाती है।

जगह-जगह मनरेगा के तहत कराए गए कार्यों के ब्यौरे देते बोर्ड भी दिखते हैं। लेकिन इस विकास के विरोधाभास भी कम नहीं हैं।

chhattisgarh assembly election 2013

















मसलन, मुयापारा में मनरेगा के तहत केवल दो साल पहले दस लाख रुपये खर्च कर जो नाली बनाई गई, वह झाड़ियों में छिपकर अब नजर ही नहीं आती! इसी गांव में अब पगडंडी में तब्दील हो चुकी कच्ची सड़क पर 6.44 लाख रुपये खर्च करने का दावा करने वाला बोर्ड भी लगा हुआ!


यह वही गांव है, जहां का एक जवान एस आर हुंगा नक्सली हमले में शहीद हो गया था। बाद में उसकी याद में गांव में सीमेंट से उसकी आदमकद मूर्ति बनाकर लगाई गई है।

मुख्यमंत्री रमन सिंह ने चुनावों से कई महीने पहले विकास यात्रा निकाली थी, बस्तर जिसका अहम पड़ाव था। इसके जवाब में विपक्षी कांग्रेस ने परिवर्तन यात्रा निकाली, जिसे जीरमघाटी में नक्सलियों ने निशाना बनाया था, जिसमें बस्तर के दिग्गज नेता महेंद्र कर्मा और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल सहित 30 लोग मारे गए थे।

मगर जीरमघाटी का हमला आज यहां कोई मुद्दा नहीं है। सच पूछा जाए तो इन चुनावों में बस्तर के जंगल के भीतर के सैकड़ों गांवों में अभी सबसे बड़ा मुद्दा तो सुरक्षित चुनाव करवाना ही है!

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