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Chhattisgarh: यहां संतान पाने के लिए पेट के बल लेटकर महिलाएं लगाती हैं हाजिरी, फिर ऊपर से चलकर जाते हैं बैगा
Sat, 29 Oct 2022 12:55 PM IST
मोहनीश श्रीवास्तव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, धमतरी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, धमतरी
Published by: मोहनीश श्रीवास्तव
Updated Sat, 29 Oct 2022 12:55 PM IST
सार
शहर से करीब 12 किमी दूर स्थित गंगरेल बांध के किनारे मां अंगारमोती विराजित हैं। मान्यता के अनुसार दिवाली के बाद आने वाले पहले शुक्रवार को यहां मड़ई मेला लगता है। मड़ई मेले में करीब 52 गांवों के देची-देवता इस बार शामिल हुए। लोगों का मानना है कि माता से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है।
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धमतरी स्थित अंगारमोती मंदिर में संतान प्राप्ति के लिए अनोखी परंरपरा निभाती हैं महिलाएं।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
छत्तीसगढ़ के धमतरी में संतान पाने के लिए महिलाएं मां अंगारमोती के दरबार में हाजिरी लगाती हैं। यह हाजिरी सबसे अलग है। यहां महिलाएं पेट के बल लेट जाती हैं और फिर बैगा उनके ऊपर से चलकर आगे बढ़ते हैं। यह मड़ई मेला हर साल दिवाली के बाद पहले शुक्रवार को लगता है। इस बार मड़ई मेले में 300 से ज्यादा महिलाएं हाजिरी लगाने और संतान प्राप्ति की इच्छा से पहुंची। इसके लिए दूर-दराज के इलकों से महिलाएं गंगरेल आती हैं। लोगों की मान्यता और आस्था दोनों इससे जुड़ी है।
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शहर से करीब 12 किमी दूर स्थित है मंदिर
दरअसल, शहर से करीब 12 किमी दूर स्थित गंगरेल बांध के किनारे मां अंगारमोती विराजित हैं। मान्यता के अनुसार दिवाली के बाद आने वाले पहले शुक्रवार को यहां मड़ई मेला लगता है। इस मेले में दूर-दूर से हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। यहां उन्होंने वनदेवी अंगारमोती के दर्शन कर अपने परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना की। मड़ई मेले में करीब 52 गांवों के देची-देवता इस बार शामिल हुए। लोगों का मानना है कि माता से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है।
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आदिवासी परंपरा के अनुसार होता है पूजन
बताया जाता है कि जब गंगरेल बांध नहीं बना था, तो इस इलाके में बसे गांवों में शक्ति स्वरूपा मां अंगारमोती अधिष्ठात्री देवी थीं। बांध बनने के बाद सभी गांव डूब गए। इसके बाद माता के भक्तों ने मां अंगारमोती की गंगरेल तट पर फिर से स्थापना की। इसके बाद एक बार फिर से मां का दरबार लगना शुरू हो गया। पूरे साल में मड़ई का दिन सबसे खास होता है। सैकड़ों की संख्या में लोग पहुंचते हैं और आदिवासी परंपरा व रीतियों के अनुसार पूजन-अर्चना करते हैं।
बताया जाता है कि जब गंगरेल बांध नहीं बना था, तो इस इलाके में बसे गांवों में शक्ति स्वरूपा मां अंगारमोती अधिष्ठात्री देवी थीं। बांध बनने के बाद सभी गांव डूब गए। इसके बाद माता के भक्तों ने मां अंगारमोती की गंगरेल तट पर फिर से स्थापना की। इसके बाद एक बार फिर से मां का दरबार लगना शुरू हो गया। पूरे साल में मड़ई का दिन सबसे खास होता है। सैकड़ों की संख्या में लोग पहुंचते हैं और आदिवासी परंपरा व रीतियों के अनुसार पूजन-अर्चना करते हैं।
मान्यता जिस पर बैगा चढ़े उसे मिलता है मां का आशीर्वाद
इस बार यहां 300 से ज्यादा महिलाएं संतान प्राप्ति और मन्नत मांगने पहुंची थी। महिलाएं मंदिर के सामने हाथ में नारियल, अगरबत्ती, नींबू लिए कतार में खड़ी रहीं। फिर एक-एक कर पेट के बल जमीन पर लेट गईं और उनके ऊपर से चलकर बैगा आगे बढ़ने लगे। बताया जाता है कि यहां तमाम बैगा आते हैं, जिन पर देवी सवार होती हैं। ये लोग झूमते, बेसुध से मंदिर की ओर बढ़ते हैं। चारों ओर ढोल-नगाड़े बजते रहेते हैं। उनको आता देख कर ही महिलाएं पेट के बल लेटती हैं। मान्यता है कि जिस भी महिला के ऊपर बैगा का पैर पड़ता है, उसे संतान के रूप में माता अंगारमोती का आशीर्वाद मिलता है।