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यह सिर्फ और सिर्फ जोगी का इलाका है?

Tue, 12 Nov 2013 05:04 PM IST
सुदीप ठाकुर/अमर उजाला, बिलासपुर
सुदीप ठाकुर/अमर उजाला, बिलासपुर Updated Tue, 12 Nov 2013 05:04 PM IST
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area of ajit jogi

यहां से कोई 125 किमी दूर कोटा विधानसभा क्षेत्र के गौरेला नगर पंचायत के एक छोटे से गांव पतेराटोला में एक छोटी चुनावी सभा चल रही है।

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एक-एक कर वक्ता दावा करते जा रहे हैं कि आप विधायक ही नहीं, बल्कि नया मुख्यमंत्री भी चुन रहे हैं।

सभा में कांग्रेस उम्मीदवार और दो बार से विधायक डॉ. रेणु जोगी भी मौजूद हैं, हालांकि वे खुद ऐसा कोई दावा नहीं करतीं, लेकिन याद दिलाना नहीं भूलतीं कि इसी क्षेत्र ने छत्तीसगढ़ को अजीत जोगी के रूप में पहला मुख्यमंत्री दिया था।
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नर्मदा के उदगम अमरकंटक के रास्ते पर स्थित कोटा और उससे सटा आदिवासियों के लिए सुरक्षित मरवाही विधानसभा क्षेत्र पिछले दस वर्षों से अजीत जोगी के अभेद्य किले की तरह है।
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वह खुद भी कोटा या मरवाही से कांग्रेस का टिकट चाहते थे, लेकिन उनके बजाय पार्टी ने उनके बेटे अमित को उम्मीदवार बनाया है।

वर्ष 2000 में जब मध्य प्रदेश का बंटवारा कर छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाया गया था, तब अजीत जोगी ने मरवाही के रास्ते से ही विधानसभा में प्रवेश किया था।

मरवाही क्षेत्र में जोगी का पुस्तैनी गांव जोगीसार हैं, जहां आप पूरे गांव में घूम जाएं तब भी आपको भाजपा सहित किसी भी दूसरी पार्टी का झंडा और पोस्टर तक नजर नहीं आएगा।

छत्तीसगढ़ की 90 सीटों से कांग्रेस की जिन सीटों को सबसे सुरक्षित माना जाता है उनमें कोटा और मरवाही सबसे ऊपर हैं।

कोटा और मरवाही पारंपरिक रूप से कांग्रेस की सीटें ही रही हैं। रेणु जोगी से पहले राजेंद्र प्रसाद शुक्ल इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे, जोकि छत्तीसगढ़ के पहले विधानसभा अध्यक्ष भी रहे।

वहीं मरवाही में 1952 से हुए विधानसभा चुनावों में दस बार कांग्रेस और सिर्फ दो बार ही भाजपा विजयी हुई है।

ajit jogi

















यहां के जातीय समीकरण भी जोगी के मुफीद बैठते हैं। इसके अलावा अजीत जोगी ने लोगों से जीवंत संपर्क बना रखा है। ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो आपको यह बताएं कि कैसे उनके एक फोन से काम हो जाता है।

मरवाही और कोटा क्षेत्र आपस में इतने मिले हुए हैं कि उनमें फर्क कर पाना मुश्किल है। यहां सिर्फ अजीत जोगी का प्रभाव दिखता है, जिससे आप इसे 'जोगी लैंड' कह सकते हैं।

हालांकि खुद अमित ऐसी किसी उपमा को खारिज हैं। लेकिन अमर उजाला से बात करते हुए वह यह जरूर बताते हैं, 'मैंने तो सिर्फ तीन दिन मरवाही के लिए रखे हैं, बाकी समय मुझे प्रदेश के बाकी हिस्सों में घूमना है।'

इसमें कहीं न कहीं खुद को स्थानीय से बड़ा नेता बताने का भाव है।

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सेंट स्टीफंस दिल्ली से पढ़ाई करने वाले अमित की व्यक्तिगत छवि एक दंभी नेता की लगती है। उनके साथ एनसीपी नेता रामावतार जग्गी की हत्या से जुड़े मामले का दाग भी लगा हुआ है।

हालांकि इस मामले में स्थानीय अदालत ने उन्हें बरी कर दिया है, लेकिन अभी इनके खिलाफ अपील ऊपरी अदालत में लंबित है।

इसके अलावा पिता अजीत जोगी की तरह उनके आदिवासी होने पर भी सवाल उठाए जाते रहे हैं, नामांकन दाखिल करते समय भी यह मुद्दा उठा था।

वहीं, नेत्र विशेषज्ञ डॉ रेणु जोगी की छवि एक विनम्र नेता की है, वह अपनी सभाओं में खुद को इलाके की बेटी और बहू बताती हैं।

अमित के मुकाबले भाजपा ने लगातार दो बार से जिला पंचायत सदस्य समीरा पैकरा को उम्मीदवार बनाया है। अमित समीरा को अपनी छोटी बहन बताते हुए कहते हैं कि पूरा मरवाही क्षेत्र ही हमारे लिए परिवार की तरह है।

समीरा की छवि क्षेत्र में अच्छी है, लेकिन उनकी मजबूरी यह है कि उन्हें बिना किसी सेनापति के ही रण में उतार दिया गया है।

हालांकि डबल एमए और अब एलएलएम कर रहीं समीरा कहती हैं, 'अजीत जोगी खुद को मरवाही का कमिया (काम करने वाला मजदूर) बताते थे, लेकिन यहां के मालिक बन बैठे। लेकिन इस बार यहां के लोग बदलाव चाहते हैं।'

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कोटा में रेणु जोगी के खिलाफ भाजपा ने काशीराम साहू को मैदान में उतारा है। मगर भाजपा ही नहीं, कांग्रेस के भीतर ही ऐसे लोग कम नहीं हैं, जो यह मानते हैं कि उनकी जगह यदि एक बार फिर से मूलचंद खंडेलवाल को उतारा जाता, तो डॉ रेणु के लिए मुकाबला कठिन हो सकता था।

जोगी परिवार की वजह से यह हाई प्रोफाइल क्षेत्र माना जाता है, लेकिन जिस तरह का विकास होना चाहिए वैसा नजर नहीं आता।

मसलन, बिलासपुर से शहडोल को जोड़ने वाली जो सड़क कोटा और मरवाही से होकर गुजरती है, उसकी बदहाली यहां एक बड़ा मुद्दा है। इसके अलावा कोई बड़ा उद्योग यहां नहीं है, अधिकांश लोग खेती पर निर्भर हैं।

बताने के लिए सिर्फ दो बड़ी घोषणाएं हैं, एक 50 करोड़ से बनने वाला एंटी टेरेरिस्म कॉलेज और दूसरा है मलनिया बांध।

इसके अलावा यह इलाका मलेरिया से भी ग्रस्त है। आरटीआई और सामाजिक कार्यकर्ता उस्मान कुरैशी कहते हैं, 'यहां चुनाव मुद्दों के आधार पर कहां लड़े जाते हैं? यहां तो सिर्फ जोगी ही मुद्दा हैं।'

जोगी जाने क्या होगा आगे?
कभी यह बात मध्य प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रहे दिवंगत श्यामाचरण शुक्ल के बारे में कही जाती थी कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से न तो कुछ कम चाहिए और न ही कुछ ज्यादा।

अजीत जोगी के बारे में इसका पहला हिस्सा कहा जा सकता है। यही वजह है कि हर विधानसभा चुनाव के दौरान वे कांग्रेस के लिए खुद बड़ा मुद्दा बन जाते हैं।

वह चाहते तो थे कि पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करे। जीरमघाटी में हुए नक्सल हमले में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल सहित अनेक नेताओं के मारे जाने के बाद भी उन्हें लग रहा था कि पार्टी उन्हें आगे करेगी। मगर उनकी जगह पार्टी ने चरणदास महंत को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया।


इसके बाद जोगी ने नया पैतरा खेला और बिना पार्टी के झंडे-बैनर के पूरे प्रदेश में यात्राएं शुरू कर दी थीं, जिसे उनकी बगावत की तरह देखा जाने लगा।

मगर आखिरकार प्रदेश में पार्टी के चुनाव प्रचार का समन्वयक बनाकर शांत किया गया। अब वे प्रदेश के स्टार प्रचारक बनकर रह गए हैं।

पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है, लेकिन भाजपा उनके नाम का हौवा खड़ा करने से गुरेज नहीं करती।

मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह सहित भाजपा के राष्ट्रीय और स्थानीय नेता जोगी के तीन वर्ष के कार्यकाल के कथित उत्पीड़न को ही कांग्रेस के खिलाफ बड़ा मुद्दा बनाते हैं।

असल में इसकी वजह भी है, क्योंकि अजीत जोगी शांत बैठने वालों में से नहीं हैं। लोग नहीं भूले हैं कि 2003 के चुनाव में पराजित होने के बावजूद उन्होंने किस तरह बस्तर के भाजपा के दिग्गज दिवंगत नेता बलीराम कश्यप को आगे कर आदिवासी कार्ड खेला था।

जोगी की प्रदेश में हैसियत को समझने के लिए वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कनक तिवारी की इस टिप्पणी पर गौर किया जा सकता है, '2008 के चुनाव में 2003 की पुनरावृत्ति हुई। गुटों में बंटी कांग्रेस विद्याचरण शुक्ल, मोतीलाल वोरा, श्यामाचरण शुक्ल और अजीत जोगी के रहते हुए भी सत्ता में वापसी नहीं कर पाई। शुक्ल बंधु अब नहीं हैं। बूढ़े वोरा ने दिल्ली में राजनीतिक कारोबार जमा लिया है। बड़े नेताओं में जोगी अकेले हैं, जो मैदान में हैं। बाकी छोटे भाइयों की भूमिका में...।'

मगर यह जोगी भी जानते हैं कि ऐसी कोई भी स्थिति तभी आ सकती है, जब कांग्रेस बहुमत के करीब पहुंचे! रमन सरकार के वरिष्ठ मंत्री और बिलासपुर से भाजपा विधायक अमर अग्रवाल जोगी फैक्टर जैसी किसी भी चीज को खारिज करते हैं और दावा करते हैं कि कांग्रेस इस बार 35 सीटों में सिमट जाएगी।

(फोटोः अजित जोगी की पत्नी डॉ. रेणु जोगी चुनव प्रचार करतीं हुईं।)

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