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एजीआर : टेलीकॉम कंपनियों ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की अर्जी, भुगतान के लिए समयसीमा बढ़ाने की मांग

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 20 Jan 2020 04:31 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : social media
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दूरसंचार कंपनियां वोडाफोन आइडिया, टाटा टेलीसर्विसेज और भारती एयरटेल ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर दूरसंचार विभाग (DoT) के साथ भुगतान अनुसूची पर बातचीत करने की अनुमति देने के लिए अपने पहले के आदेश में संशोधन की मांग की है।
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दूरसंचार कंपनियों ने शीर्ष अदालत से कहा कि उन्हें दूरसंचार विभाग के साथ चर्चा करने और भुगतान करने के लिए उपयुक्त समय सीमा दी जाए।
 


इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को भारती एयरटेल, वोडाफोन आइडिया समेत अन्य कंपनियों की पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि उसे याचिकाओं पर विचार करने के लिए कोई वाजिब वजह नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने कंपनियों को 23 जनवरी तक 1.47 लाख करोड़ रुपये सरकार को चुकाने के आदेश दिए थे।
 
दूरसंचार विभाग (डॉट) सरकारी गैर दूरसंचार कंपनियों (पीएसयू) के मामले में 2.4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के बकाये के भुगतान की 23 जनवरी की समयसीमा की कानूनी वैधता की जांच कर रहा है। सूत्रों ने ये जानकारी देते हुए कहा कि ये कंपनियां एजीआर मामले में सुप्रीम कोर्ट में मूल रूप से पार्टी नहीं थी।

दूरसंचार विभाग के सूत्रों ने कहा कि भले ही सांविधिक बकायों से संबधित भुगतान के लिए गैर दूरसंचार पीएसयू से भी कहा गया है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि 23 जनवरी की समयसीमा उन सरकारी कंपनियों पर भी कानूनी रूप से लागू है, जो इस विवाद में सीधे पार्टी नहीं थीं।

एक सूत्र ने कहा, ‘वास्तव में अदालत ने एजीआर के सिद्धांत के मसले पर फैसला दिया है, इसलिए उन्हें (पीएसयू) भुगतान करना है, लेकिन यदि वे 23 जनवरी तक भुगतान नहीं करती हैं तो इसे अदालत की अवमानना नहीं माना जाएगा।’

सुप्रीम कोर्ट ने 24 अक्तूबर 2019 को अपने फैसले में कहा था कि दूरसंचार कंपनियों के एजीआर में उनके दूरसंचार सेवाओं से इतर राजस्व को शामिल किया जाना कानून के अनुसार ही है। 22 नवंबर को एयरटेल, वोडाफोन-आइडिया और टाटा टेलीसर्विसेज ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। इसमें फैसले पर पुनर्विचार करने और ब्याज, जुर्माना और जुर्माने पर ब्याज को माफ करने की अपील की गई थी।  

दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पिछले साल नवंबर में संसद को बताया था कि दूरसंचार कंपनियों पर सरकार का 1.47 लाख करोड़ रुपये का बकाया है। साथ ही उन्होंने कहा था कि इस बकाये पर जुर्माने-ब्याज पर राहत का कोई प्रस्ताव नहीं है। उन्होंने कहा था कि दूरसंचार कंपनियों पर लाइसेंस शुल्क का 92,642 करोड़ रुपये और स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क 55,054 करोड़ रुपये बकाया है। 

इन कंपनियों पर इतना बकाया

भारती एयरटेल                        21,682.13
वोडाफोन-आइडिया                 19,823.71
रिलायंस कम्युनिकेशंस             16,456.47 
बीएसएनएल                             2,098.72 
एमटीएनएल                             2,537.48

(नोट : राशि करोड़ रुपये में, इसमें जुर्माना और ब्याज शामिल नहीं है)

एजीआर क्या है

दूरसंचार कंपनियों को एजीआर का तीन फीसदी स्पेक्ट्रूम फीस और 8 प्रतिशत लाइसेंस फीस के तौर पर सरकार को देना होता है। कंपनियां एजीआर की गणना दूरसंचार ट्रिब्यूनल के 2015 के फैसले के आधार पर करती थीं। ट्रिब्यूनल ने उस वक्त कहा था कि किराये, स्थायी संपत्ति की बिक्री से लाभ, डिविडेंड और ब्याज जैसे गैर प्रमुख स्रोतों से हासिल राजस्व को छोड़कर बाकी प्राप्तियां एजीआर में शामिल होंगी। जबकि दूरसंचार विभाग किराये, स्थायी संपत्ति की बिक्री से लाभ और कबाड़ की बिक्री से प्राप्त रकम को भी एजीआर में मानता है। इसी आधार पर वह कंपनियों से बकाया शुल्क की मांग कर रहा है। 


बिड़ला ने कहा था, मदद नहीं मिली तो बंद हो सकती है कंपनी

वोडाफोन-आइडिया के चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला ने पिछले साल दिसंबर में कहा था कि अगर कंपनी को सरकार मदद मुहैया नहीं कराती है तो यह बंद हो सकती है। उन्होंने साफ कहा था कि वह इस कंपनी में और ज्यादा पैसा निवेश नहीं करने वाले हैं क्योंकि इसका कोई मतलब नहीं है कि डूबते पैसे में और पैसा लगा दिया जाए।

देनदारी में हो सकती थी बढ़ोतरी

इस एजीआर संबंधित देनदारी में बढ़ोतरी हो सकती थी। ब्रोकरेज फर्म ने कहा है कि कंपनी ने टेलीकॉम डिपार्टमेंट से मिले नोटिस के आधार पर एजीआर की मूल रकम के 11,100 करोड़ रुपये होने का अनुमान लगाया है। वहीं, पिछले 2-3 साल का अनुमान कंपनी ने खुद लगाया है। ब्रोकरेज फर्म क्रेडिट सुइस के अनुसार, वोडाफोन-आइडिया की एजीआर संबंधित देनदारी 54,200 करोड़ रुपये रह सकती है। ऐसे में टेलीकॉम कंपनी को 10,100 करोड़ रुपये की अतिरिक्त प्रोविजनिंग एजीआर के लिए करनी पड़ेगी। सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी को तीन महीने के अंदर इस रकम का भुगतान करने का आदेश दिया है।

 

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