फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Business ›   Investment demand of Rs 17 lakh crore to save the economy, experts suggested ways

अर्थव्यवस्था बचाने के लिए 17 लाख करोड़ रुपये के निवेश की मांग, विशेषज्ञों ने सुझाए रास्ते

Sat, 09 May 2020 04:32 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 09 May 2020 04:32 PM IST
सार

  • अर्थव्यवस्था और मजदूर, दोनों को बचाने के लिए भारी निवेश ही एकमात्र रास्ता
  • एसोचैम ने कहा- निवेश के बाद देश की आर्थिक रफ्तार चार से पांच फीसदी बनाए रखना होगा संभव
  • मजदूर कानून को निलंबित करने पर लेबर यूनियन खिलाफ, भारतीय मजदूर संघ ने जताया विरोध

विज्ञापन
Investment demand of Rs 17 lakh crore to save the economy, experts suggested ways
MSME Sector - फोटो : Social Media (सांकेतिक)

विस्तार

औद्योगिक संगठन एसोचैम के डिप्टी जनरल सेक्रेटरी सौरभ सान्याल ने कहा है कि देश की आर्थिक रफ्तार बनाए रखने के लिए 17 लाख करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता है। इस निवेश से न सिर्फ देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को बचाना संभव होगा, बल्कि इन क्षेत्रों में काम करने वाले करोड़ों कामगारों के भविष्य की भी रक्षा की जा सकेगी।
विज्ञापन


इसी तरह की मांग सीआईआई और पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स की तरफ से भी की गई है। औद्योगिक संगठनों की यह मांग ऐसे समय में आई है जबकि सरकार सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योगों को बचाने के लिए आर्थिक पैकेज का एलान करने वाली है।
विज्ञापन

कहां से आ सकता है पैसा

सौरभ सान्याल ने अमर उजाला से कहा कि देश की आर्थिक गाड़ी को दोबारा पटरी पर दौड़ाने के लिए भारी निवेश की आवश्यकता है। इसके लिए सरकार विश्व बैंक या आईएमएफ के माध्यम से कर्ज ले सकती है।

विज्ञापन
विज्ञापन


इस निवेश से औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार बढ़ेगी। फैक्ट्रियों के चलने से करोड़ों मजदूरों-कामगारों के हाथ में पैसा जाएगा। इससे मांग में बढ़ोतरी होगी और अर्थव्यवस्था चल पड़ेगी।

सरकार के पास विदेशी मुद्रा के रूप में भी पर्याप्त भंडार है। कुछ समय के लिए वह इस योगदान को 3.5 से 4.5 फीसदी तक कम करने की योजना बना ले तो भी इससे अर्थव्यवस्था में पर्याप्त नकदी झोंकी जा सकती है। इससे भी मांग पैदा करने और उद्योगों को चलाने का रास्ता खुल सकता है।

सरकार के पास ईएसआईसी के रूप में लगभग 84 हजार करोड़ रुपये की धनराशि है। लगभग इतना ही पैसा ईपीएफओ में भी जमा है। इस धनराशि में 12 फीसदी सरकार और 12 फीसदी उद्योग अपना योगदान देते हैं।

सरकार इस पैसे को तीन से छह महीने के लिए उद्योगों को दे सकती है, जिससे वे अपने कर्मचारियों को भुगतान कर सकें। इससे भी मांग में बढ़ोतरी होगी और औद्योगिक गतिविधियां चल पड़ेंगी। सरकार के पास उद्योगों को राहत देने के लिए कर राहत और टैक्स जमा करने में कुछ अतिरिक्त समय देने जैसे अन्य उपाय भी किये जा सकते हैं।

श्रम कानूनों पर बचाव

पहले से ही मंदी झेल रहे उद्योगों को 24 मार्च से घोषित लॉकडाउन में भी मजदूरों को वेतन देने और उनकी व्यवस्था देखने के लिए कहा गया। लेकिन कई कमजोर संगठन टूट गए और अपने कर्मचारियों का वेतन नहीं दे पाए।

इससे लाखों लोगों की छंटनी हुई और बेरोजगारी से मजदूरों के हाथ में पैसे की कमी हुई। इससे मांग में भी भारी कमी दर्ज की गई। आर्थिक विशेषज्ञों की राय है कि आर्थिक पैकेज के जरिए दोनों क्षेत्रों के हितों की रक्षा की जा सकती है।

श्रम कानून के उन्मूलन पर मजदूर संगठन नाराज

भारतीय मजदूर संघ के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष अनीश मिश्रा ने कहा कि उद्योगों को राहत देने के नाम पर गरीब मजदूरों के हितों की अनदेखी की जा रही है। शुक्रवार को वे गृहमंत्री अमित शाह से मिलकर इस पर विरोध जता चुके् हैं। अगर सरकार ने मजदूरों के हित में कदम नहीं उठाया, तो वे इस पर व्यापक रणनीति बनाकर विरोध दर्ज कराएंगे।

द ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआईटीयूसी) की जनरल सेक्रेटरी अमरजीत कौर ने कहा कि कोविड जैसी स्थिति में जब मजदूरों के हितों की सबसे ज्यादा रक्षा की जानी चाहिए थी, उन्हें उद्योगों के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है।

अब न तो उनके हितों के लिए कोई आवाज उठाई जा सकती है और न ही उनके हितों की चोट पर कोई कानूनी मदद ली जा सकती है। यह देश के करोड़ों मजदूरों के हितों के साथ खिलवाड़ है।

कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के दीपांकर भट्टाचार्या ने कहा कि केंद्र सरकार स्वयं को मजदूरों और गरीबों की हितैषी बताती है। लेकिन उसका हर फैसला उद्योगपतियों को बचाने वाला उठ रहा है।

बड़े-बड़े उद्योग संगठनों को लाखों करोड़ रुपये का राहत पैकेज दिया जा रहा है, जबकि उसी दौरान श्रम कानूनों में बदलाव करके गरीबों के हितों को चोट पहुंचाई जा रही है।

सरकार को समझना चाहिए कि संतुष्ट मजदूर उसके लिए ज्यादा उत्पादक और मांग बढ़ाने वाला साबित हो सकता है।

क्या कहता है कानून

मजदूर कानून विशेषज्ञ अधिवक्ता अमित सिन्हा के मुताबिक राज्यों ने अध्यादेश के जरिए अधिकतम तीन साल के लिए श्रम कानूनों में बदलाव किया है। लेकिन इस दौरान भी न्यूनतम मजदूरी, बाल मजदूरी निषेध, सुरक्षा और बंधुआ मजदूरी जैसे कानूनों को जारी रखने के विषय में निर्णय लिया गया है।



कुछ जगहों पर काम के घंटे बढ़ाए गए हैं, लेकिन इस विषय में भी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रावधान हो सकते हैं। कुछ राज्यों ने इसके लिए अतिरिक्त वेतन देने की बात कह दी है।

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें कारोबार समाचार और Union Budget से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। कारोबार जगत की अन्य खबरें जैसे पर्सनल फाइनेंस, लाइव प्रॉपर्टी न्यूज़, लेटेस्ट बैंकिंग बीमा इन हिंदी, ऑनलाइन मार्केट न्यूज़, लेटेस्ट कॉरपोरेट समाचार और बाज़ार आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed