साक्षात्कार: खेतों में पानी की खपत घटाने की तैयारी, तकनीक की मदद से होगी उन्नत खेती
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देश में मीठे पानी की उपलब्धता घट रही है। इसके बावजूद इसकी खपत बढ़ रही है और खासकर खेतों में। कई राज्यों में खेती के लिए पानी का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है, जिससे वहां का भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। इससे निपटने के लिए कृषि मंत्रालय न सिर्फ कम पानी की खपत वाली उन्नत बीजों की खोज कर रहा है बल्कि किसानों को सही फसलों के चयन के लिए जागरूक कर रहा है।
डॉ. त्रिलोचन महापात्र, डेयर सचिव एवं महानिदेशक आईसीएआर ने कहा कि, खेती के दौरान पानी की खपत कम करने के लिए तकनीक का अधिक-से-अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है। फसलों के विविधीकरण पर जोर दिया जा रहा है। इस दिशा में आगे क्या हो रहा है, इस पर अमर उजाला के शिशिर चौरसिया ने कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. त्रिलोचन महापात्र से बातचीत की। पेश है अंश :-
किसान सिंचाई के लिए पानी का कम इस्मेताल करें, इसके लिए क्या रणनीति है?
अभी हमने पंजाब की चर्चा की। वहां आमतौर पर धान और गेहूं की खेती होती है, जिसमें पानी की खूब खपत होती है। हमने धान की कुछ ऐसी किस्मों को ढूंढा है, जिनमें पानी कम लगता है। जैसे ऐरोबिक राइस में 20 फीसदी पानी कम लगता है। इसी तरह हमने सहभागी धान की किस्म विकसित की है, जिसमें कम पानी की जरूरत है। हम किसानों को भी खेती के लिए सही फसल का चुनाव करने के लिए जागरूक करेंगे। यदि आप धान या गन्ने का चयन करेंगे तो उसमें पानी की ज्यादा जरूरत है। यहां तक कि गेहूं में भी ज्यादा पानी चाहिए। किसान यदि गेहूं के बदले सरसों की बुवाई करें तो पानी की खपत एक तिहाई रह जाती है, जबकि लाभ बराबर। सरकार आयल सीड मिशन ला रही है, जिसमें किसानों को खेती के लिए सब्सिडी भी मिलेगी। बाजरा और मडुआ की खेती में भी पानी की कम खपत होती है। खास बात है कि ये अनाज सुपर फूड माने जाते हैं, इसलिए इनकी कीमत भी अच्छी मिलती है।
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डेयर सचिव और आईसीएआर महानिदेशक के रूप में आपके तीन साल के कार्यकाल में क्या महत्वपूर्ण रहा और आगे की क्या रणनीति है?
मैं अपने तीन साल के कार्यकाल को दलहन और मिठास क्रांति के रूप में देखता हूं। आपको याद होगा कि सरकार के पिछले कार्यकाल में दाल 200 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई थी। उसके बाद हमने इस दिशा में काम शुरू किया। दलहनी फसलों के लिए हर राज्य में सीड हब बनाया। इसी का परिणाम था कि 2017-18 में 252.3 लाख टन दलहन उत्पादन हुआ। देश में सालाना करीब 250 लाख टन दाल की खपत है। इसका मतलब कि हम इसमें आत्मनिर्भर हो गए हैं। इसके बाद मिठास क्रांति भी लाई गई। गन्ने की एक किस्म सीओ-238 ढूंढी गई है, जो उत्तर प्रदेश जैसे इसके उत्पादन राज्यों के लिए मुफीद है। उत्तर प्रदेश में किसानों को पहले प्रति एकड़ 100 से 125 क्विंटल उपज मिलती थी। इस किस्म से अब उपज 150 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच गई। यही नहीं, इस किस्म के गन्ने में चीनी की रिकवरी भी 11 से 12 फीसदी तक मिल रही है, जबकि पुराने किस्म में यह रिकवरी नौ फीसदी या इससे कम थी। अब हम खेती में पानी की कम खपत की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता तेजी से घट रही है और खेती में पानी की भारी खपत है। इससे आप कैसे निपटेंगे?
देश में 1951 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 5,177 घन मीटर थी, जो 2011 में घटकर 1,544 घन मीटर रह गई और 2014 में यह और घटकर 1,504 घन मीटर रह गई। वर्ष 2025 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1,465 और 2050 में 1,235 घन मीटर रह जाएगी। जैसे ही हम 1,000 से 1,100 घन मीटर के दायरे में आएंगे तो भारत भी पानी की कमी वाले देशों की श्रेणी में आ जाएगा। पानी के बंटवारे पर अभी तो कुछ राज्यों में ही लड़ाई हो रही है। अगर ऐसा ही रहा तो हर राज्य एक-दूसरे से लड़ना शुरू देंगे। इस स्थिति में निपटने के लिए अभी से कार्य शुरू कर दिया गया है।
किस प्रकार के कार्य शुरू किए गए हैं?
खेती के दौरान पानी की खपत कम करने के लिए तकनीक का अधिक-से-अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है। फसलों के विविधीकरण पर जोर दिया जा रहा है। साथ ही हम एक विशेष तंत्र विकसित कर रहे हैं, जो किसानों को सुझाव देगा कि उनके खेत के लिए कौन सा फसल उचित है, जिसमें कम पानी की खपत होगी और लाभ भी पूर्ववत बना रहेगा।
देश में अभी सारी जमीनें सिंचित नहीं है, फिर भी खेती को ही पानी की खपत के लिए क्यों जिम्मेदार ठहराया जाता है?
इस समय देश में करीब 14 करोड़ हेक्टेयर जमीन में खेती होती है। इसमें से करीब 48.8 फीसदी रकबे में ही सिंचाई की सुविधा है। शेष किसान मानसून के भरोसे हैं। लेकिन जो 6.83 करोड़ हेक्टेयर सिंचित भूमि है, उसमें से करीब 60 फीसदी खेतों में जमीन से पानी निकालकर सिंचाई होती है। दिक्कत इन्हीं खेतों में है क्योंकि किसान इनके लिए जरूरत से ज्यादा पानी जमीन से निकालते हैं। इससे भूजल स्तर तेजी से घट रहा है। पंजाब में देखिए, वहां हर साल भूजल स्तर एक मीटर नीचे जा रहा है। ज्यादा सिंचाई होने से मिट्टी में नमक की मात्रा बढ़ रही है और खाद भी ज्यादा डालना पड़ रहा है।
इस दिशा में कुछ शोध हो रहा है?
बिल्कुल शोध हो रहा है। हम कुछ प्रमुख फसलों में वाटर एफिशिएंट क्रॉप पर काम कर रहे हैं। इस दिशा में काम काफी आगे बढ़ चुका है। लेकिन जब तक परिणाम नहीं आ जाएं, तब तक इस बारे में कुछ नहीं बोलेंगे। लेकिन इतना मानिए कि शीघ्र ही इस बारे में आपको अच्छी खबर मिलेगी।