पिज्जा, बर्गर पर वन प्लस वन स्कीम पर ऐसे कमाती हैं कंपनियां
अखबारों से लेकर टीवी और रेडियो तक अक्सर ऐसे विज्ञापन देखने को मिलते हैं, जिसमें एक बर्गर खरीदने पर दूसरा बर्गर फ्री, या, एक पिज्जा के साथ दूसरा फ्री, एक पैकेट फ्राइड चिकेन के साथ दूसरा पैकेट मुफ्त देने का ऑफर होता है।
इन विज्ञापनों को देखकर जहन में एक सवाल आता है कि जब ये चीजें एक के साथ एक मुफ्त देकर भी इन कंपनियों को मुनाफा होता है, तो वो इनके दाम क्यों नहीं कम करतीं? सवाल ये भी कि इतनी कम कीमत पर भी क्या फास्ट फूड कंपनियां अपने सामान बेचकर मुनाफा कमा लेती हैं?
अमरीका में इन दिनों फास्ट फूड कंपनियों के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है। कम कीमत पर अपने उत्पाद बेचने का।जनवरी महीने से ही तमाम अमरीकी फास्ट फूड कंपनियों ने बेहद कम दाम पर अपने सामान बेचने के ऑफर जनता को देने शुरू किए हैं। कई कंपनियों ने तो बर्गर के दाम इतने घटा दिए हैं कि ये ब्रेड से भी सस्ता हो गया है।
मैकडॉनल्ड ने 2018 में शुरू किया नया जंग
दिसंबर महीने में ही वित्तीय कंपनी क्रेडिट सुइस ने कहा था कि अमरीका में कम कीमत पर फास्ट फूड बेचने की जंग तेज होने वाली है। मैकडॉनल्ड ने 2018 की शुरुआत 1 डॉलर, 2 डॉलर और 3 डॉलर के नए मेनू लॉन्च करके की थी। कंपनी के दूसरे प्रतिद्वंदियों ने भी अपने-अपने दांव खेले। वेंडीज बर्गर चेन ने एक डॉलर से भी कम कीमत की 20 चीजों का नया मेनू जारी किया। इसके बाद टेक्स-मेक्स कंपनी टैको बेल ने एक डॉलर में नैचो फ्राइज बेचने शुरू कर दिए।
क्रेडिट सुइस का कहना है कि 2012 से 2016 के बीच अमरीका में मैकडॉनल्ड के यहां ग्राहकों की आवक 11 फीसद कम हो गई। पर, सवाल फिर वही कि आखिर 1 डॉलर में बर्गर बेचकर कैसे मुनाफा कमाया जा सकता है, जब इसे लोगों को परोसने वाला हर घंटे के 10 डॉलर लेता हो?
अमरीका में फास्ट फूड कंपनियों के बीच मुकाबला बेहद तगड़ा है। पहली पायदान के लिए मुकाबला चार या पांच कंपनियों के बीच ही रहता है। ऐसे में कंपनियां छोटे-बड़े हेर-फेर के साथ अपने प्रोडक्ट बाजार में उतारती हैं। कोई कहता है कि उसका खाना सीधे आंच में पका है, तो कोई फ्राइड बताता है। और कोई कंपनी खाने के साथ बच्चों के खिलौने देने का मार्केटिंग का नुस्खा अपनाती है।
सस्ते दाम पर सामान बेचने का नुस्खा
पैट्रीशिया स्मिथ अमरीका की मिशिगन यूनिवर्सिटी की फास्ट फूड के अर्थशास्त्र की प्रोफेसर हैं। स्मिथ कहती हैं कि आखिर में मुकाबला कम से कम दाम पर अपने उत्पाद बेचने का होता है। एक डॉलर या इससे भी कम कीमत की चीजें बाजार में उतारी जाती हैं।
स्मिथ का कहना है कि ऐसा कर के कंपनियां ये उम्मीद करती हैं कि वो ज्यादा से ज्यादा सामान बेच पाएंगी। ज्यादा सामान बिकेगा, तो उनका मुनाफा बढ़ेगा। जैसे कि अगर मैक्डोनॉल्ड्स 1 डॉलर वाले ढेर सारे बर्गर बेचेगा, तो उसका मुनाफा बढ़ेगा और फिर लोग सिर्फ बर्गर तो लेंगे नहीं। वो इनके साथ फ्रेंच फ्राइज, ड्रिंक और डेजर्ट भी लेंगे।
लेकिन, सस्ते दाम पर सामान बेचने का नुस्खा कभी-कभी भारी भी पड़ सकता है। खास तौर से तब, जब सामान की कीमत उसकी लागत से भी कम हो जाए। 2009 में बर्गर किंग की फ्रैंचाइजी चलाने वालों ने कंपनी पर मुकदमा ठोक दिया था। इसकी वजह ये थी कि कंपनी की मार्केटिंग की रणनीति के तहत उन्हें एक डॉलर के डबल चीज बर्गर बेचने पड़े। जबकि उसकी लागत एक डॉलर से ज्यादा बैठती थी। हालांकि अदालत ने बर्गर किंग के हक में ही फैसला दिया।
फास्ट फूड को लेकर बदल रहा नजरिया
वैसे कम से कम दाम पर फास्ट फूड बेचने की रणनीति कारगर रहेगी या नहीं, इस बात का फैसला होना अभी बाकी है। इसकी वजह है हमारे खान-पान में आया बदलाव। अब हम सेहत को लेकर ज्यादा जागरूक हो गए हैं। फास्ट फूड खाने से लोग परहेज करते हैं। आज की तारीख में लोग सस्ते खाने से ज्यादा सेहतमंद खाने की तलाश करते हैं। किसी को ऑर्गेनिक फूड चाहिए। तो, किसी को बिना तेल वाला खाना।
खान-पान को लेकर नई पीढ़ी की सोच में आए बदलाव का सबसे बुरा असर फास्ट फूड कंपनियों पर ही पड़ा है। लोग बर्गर से ज्यादा खुद से चुन सकने वाले सलाद को तरजीह देते हैं। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में न्यूट्रिशन की प्रोफेसर मैरियॉन नेस्ले कहती हैं कि आज फास्ट फूड कंपनियां लोगों को अपने स्टोर्स में लाने को बेताब हैं। इसीलिए मैक्डोनॉल्ड्स ने यूबर के साथ करार किया है, ताकि लोग उसके स्टोर तक आएं।
लंदन की सिटी यूनिवर्सिटी के मार्टिन काराहर कहते हैं कि पांच बरस पहले फास्टफूड कंपनियां चाहती थीं कि लोग आएं, खाएं और चलते बनें। आज वो चाहती हैं कि ग्राहक आएं और तसल्ली से उनके यहां वक्त गुजारें। देर तक ठहरेंगे, तो लोग कुछ न कुछ खरीदेंगे ही। इसीलिए फास्ट फूड स्टोर्स में कभी लाउंज सिटिंग की व्यवस्था होती है, तो कहीं पर मुफ्त वाई-फाई का इंतजाम होता है।
आखिर कितनी गिरेंगी कीमतें?
अब सवाल ये है कि जब फास्ट फूड के दाम उसकी लागत से भी कम हो गए, तो फिर उससे नीचे भी जाएंगे क्या? न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की मैरियॉन नेस्ले कहती हैं कि फास्ट फूड इंडस्ट्री ज्यादा से ज्यादा सामान बेचने की रणनीति पर काम करती है। ताकि कम कीमत पर सामान बेचकर भी मुनाफा कमाया जा सके।
असल मकसद होता है ग्राहकों को अपने स्टोर तक ले आना। फिर दाम कम होने पर किसी खास ब्रैंड के शौकीन लोग भी दूसरी कंपनियों के मेनू को ट्राई करते हैं। पैट्रीशिया स्मिथ कहती हैं कि हर धंधे में कंपनियां इस दुविधा में रहती हैं कि वो दाम घटाएं या बढ़ाएं। कहीं दाम बढ़ाने से उसके ग्राहक छिटक न जाएं या दाम घटाने से उसके पास और ग्राहक आएंगे क्या?
कोई कंपनी अगर 5 फीसद दाम घटाकर 10 फीसद ज्यादा सामान बेच लेती है, तो उसका मुनाफा बढेगा ही, घटेगा नहीं। पैट्रीशिया कहती हैं कि कम कीमत या ये युद्ध उन कंपनियों के बीच छिड़ता है, जो ऊपरी पायदान पर होती हैं और बड़े बाजार पर उनका कब्जा होता है। जैसे अमरीका में 40 फीसद बाजार पर 4 या 5 कंपनियों का कब्जा है। इस 40 प्रतिशत बाजार का मतलब 80 अरब डॉलर का कारोबार है।
अमरीका ही नहीं ब्रिटेन में भी कंपनियां कम कीमत वाले उत्पाद बाजार में ला रही हैं। जैसे कि मार्क्स ऐंड स्पेंसर 10 पाउंड में दो लोगों को खाना खिलाने का ऑफर दे रही है। वहीं सुपरमार्केट चेन टेस्को 4 पाउंड में लंच स्पेशल ऑफर लेकर आई।
हालांकि अमरीका के मुकाबले यूरोपीय देशों में कंपनियों का जोर ग्रीन प्रोडक्ट यानी कुदरत के लिए कम नुकसानदेह उत्पाद बेचने पर है। इसलिए यूरोपीय देशों में कम कीमत पर फास्ट फूड बेचने का ये युद्ध शायद न देखने को मिले।
फास्ट फूड का भविष्य क्या है?
तमाम कंपनियों ने इस बारे में खामोशी अख्तियार कर रखी है कि वो कीमतों में और कितनी कटौती करेंगे। बस वो ग्राहकों को कम कीमत पर सामान देने की बात करती हैं। मिशिगन यूनिवर्सिटी की पैट्रीशिया स्मिथ कहती हैं कि कंपनियां अपने मौजूदा ग्राहकों को अपने साथ जोड़े रखने की कोशिश कर रही हैं, क्योंकि नई पीढ़ी तो पहले ही सेहतमंद खाने पर जोर दे रही है।
अभी ये साफ नहीं है कि आखिर गिरती कीमतों से फास्ट फूड के कारोबार का क्या होगा?
मगर सेहत से जुड़े लोग इस बात से फिक्रमंद हैं। उन्हें चिंता है कि सस्ता होने पर लोग ज्यादा फास्ट फूड खाएंगे। ऐसे में मोटापे की समस्या और दूसरी बीमारियां बढेंगी। अमरीका तो पहले से ही दुनिया का सबसे ज्यादा मोटापे का शिकार देश है।
लेकिन, दाम कम होने का ये असर भी हो सकता है कि तमाम कंपनियां सेहत को कम नुकसान पहुंचाने वाले उत्पाद बनाएं। अमरीका में कई ऐसी कंपनियां हैं जो ताजा और सेहतमंद खाने का सामान बेच रही हैं। जैसे कि स्वीटग्रीन्स और फ्रेश जो हरे, पत्तेदार सामान बेचते हैं। इसी तरह व्होल फूड्स नाम की कंपनी भी तेजी से विस्तार कर रही है। ये कंपनी सेहतमंद खाना बेचती है।
साफ है कि फास्ट फूड की दुनिया बदल रही है।