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लंबी छुट्टियों से तौबा!: एशिया में सबसे कम छुट्टियां लेते हैं भारतीय कर्मचारी, जानें क्या है इसकी बड़ी वजह?

Mon, 01 Jun 2026 08:36 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Mon, 01 Jun 2026 08:36 PM IST
सार

भारतीय कर्मचारी अपनी तय छुट्टियों का पूरा इस्तेमाल क्यों नहीं कर पा रहे हैं? ऑफिस के प्रेशर से लेकर त्योहारी कल्चर तक, एचआर कंपनी की इस नई रिपोर्ट का पूरा विश्लेषण आसान भाषा में पढ़ें।

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Vacation Deprived? Indian Employees Take Fewest Leaves in APAC Region, Reveals Report
सांकेतिक फोटो। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

भारत में नौकरीपेशा लोगों को छुट्टियां तो अच्छी-खासी मिलती हैं, लेकिन जब बात उन्हें इस्तेमाल करने की आती है, तो वे एशिया-प्रशांत (एपीएसी) क्षेत्र में अपने समकक्षों से काफी पीछे रह जाते हैं। हाल ही में एचआर और पेरोल कंपनी डील की ओर से जारी की गई एक रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इस रिपोर्ट से साफ होता है कि छुट्टियां उपलब्ध होने के बावजूद, भारतीय कर्मचारी काम से ब्रेक लेने में काफी सावधानी बरतते हैं और एक साथ लंबी छुट्टियों पर जाने के बजाय छोटे ब्रेक लेना ज्यादा पसंद करते हैं।

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केवल 17.2% लोग ही लेते हैं पूरी छुट्टी

यह रिपोर्ट 2025 में डील के एपीएसी प्लेटफॉर्म पर मौजूद 4,500 से अधिक पूर्णकालिक कर्मचारियों के डेटा पर आधारित है। आंकड़ों के अनुसार, 2025 में भारतीय कर्मचारियों द्वारा ली गई औसत छुट्टियां केवल 12 दिन की थीं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत में केवल 17.2 प्रतिशत कर्मचारियों ने ही अपनी 100 प्रतिशत छुट्टियों का उपयोग किया। इसके मुकाबले, सिंगापुर में 57.2 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया में 53.3 प्रतिशत, मलेशिया में 50.8 प्रतिशत, हांगकांग में 42.9 प्रतिशत और जापान में 35.9 प्रतिशत कर्मचारियों ने अपना पूरा लीव कोटा इस्तेमाल किया। इसके अलावा, केवल 29.9 प्रतिशत भारतीय कर्मचारी ही अपनी 80 प्रतिशत छुट्टियों का इस्तेमाल कर पाए, जो प्रमुख एशियाई बाजारों में सबसे कम है।

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लंबी छुट्टियों से परहेज, दो दिन के ब्रेक की ज्यादा डिमांड

रिपोर्ट का एक और अहम पहलू यह है कि भारतीय कर्मचारी एक साथ लंबी छुट्टी लेने के बजाय साल भर में छुट्टियां बांट कर लेना ज्यादा पसंद करते हैं। डेटा के अनुसार, भारत में शॉर्ट-ड्यूरेशन लीव (कम अवधि की छुट्टियों) की हिस्सेदारी सबसे अधिक दर्ज की गई। अगर मल्टी-डे (दो दिन या उससे अधिक) की छुट्टियों के अनुरोधों पर गौर करें, तो 48.4 प्रतिशत रिक्वेस्ट ठीक दो दिन के ब्रेक के लिए थीं।

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छुट्टियां न लेने की असल वजह क्या है?

डील के भारत में हेड ऑफ सेल्स, राकेश गौर के अनुसार, भारत का यह लीव-डेटा बताता है कि कर्मचारी काम से दूर नहीं भागते, बल्कि वे इस बात को लेकर ज्यादा चयनात्मक हैं कि उन्हें छुट्टी का उपयोग कैसे करना है। यह सतर्क रवैया काम के भारी दबाव, हमारी सांस्कृतिक आदतों या फिर त्योहारों और पारिवारिक कार्यक्रमों के लिए छुट्टियां बचाकर रखने की प्रवृत्ति का परिणाम हो सकता है।

हालांकि, यह स्थिति कॉर्पोरेट जगत के लिए एक बड़ा सवाल भी खड़ी करती है। राकेश गौर बताते हैं कि नियोक्ताओं को यह सोचने की जरूरत है कि छुट्टियों का पूरी तरह से इस्तेमाल न होना कर्मचारियों की उत्पादकता  का संकेत है, या फिर यह काम के दबाव, बर्नआउट और ऐसे वर्कप्लेस कल्चर का नतीजा है जहां कर्मचारी पूरी तरह से काम से खुद को 'स्विच ऑफ' करने में असहज महसूस करते हैं।

फ्लेक्सिबल पॉलिसी से बन सकती है बात

इस स्थिति का एक सीधा समाधान कंपनियों की नीतियों में नजर आता है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में जिन कंपनियों में छुट्टियां लेने की फ्लेक्सिबल पॉलिसी है, वहां फिक्स्ड पॉलिसी वाले कर्मचारियों की तुलना में लोगों ने काम से ज्यादा ब्रेक लिया। यह इस बात का मजबूत संकेत है कि केवल छुट्टियां आवंटित करना ही काफी नहीं है, बल्कि कंपनियों की नीतिगत संरचना भी कर्मचारियों के व्यवहार को वर्कप्लेस कल्चर जितना ही प्रभावित करती है। नियोक्ताओं को एक ऐसा सकारात्मक माहौल बनाना होगा जहां कर्मचारी अपनी सेहत और प्रोडक्टिविटी बनाए रखने के लिए बिना किसी झिझक के अपनी तय छुट्टियों का लाभ उठा सकें।

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