Trump Tariffs Analysis: भारत के इन राज्यों से निर्यात पर संकट...अब नहीं मिल रहे ऑर्डर, नए बाजारों की तलाश शुरू
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से भारत पर थोपा गया टैरिफ प्रभावी हो चुका है। इसके अलावा अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ 27 अगस्त से लागू होगा। हरियाणा के करनाल से देव शर्मा, पानीपत से जगमहेंद्र सरोहा, रोहतक से विकास सैनी, लुधियाना से राजीव शर्मा, बद्दी से ओमपाल सिंह; उत्तर प्रदेश के लखनऊ से अभिषेक गुप्ता, जम्मू से गौरव रावत और उत्तराखंड में देहरादून से भूपेंद्र राणा की रिपोर्ट से ट्रंप की टैरिफ नीति और भारत पर इसके असर का आकलन...
विस्तार
- चावल निर्यातकों में चिंता, पर बड़े नुकसान की आशंका नहीं।
- 2.70 लाख टन बासमती चावल अमेरिका को होता है निर्यात।
- 40 फीसदी करनाल की हिस्सेदारी है देश के चावल निर्यात में।
भारत 127 देशों को करीब 60 लाख टन बासमती चावल निर्यात करता है। इसमें से करीब 2.70 लाख टन यानी चार फीसदी बासमती चावल अमेरिका जाता है। बासमती चावल उत्पादन और निर्यात के मामले में देश का करीब 40 फीसदी हिस्सा हरियाणा में तरावड़ी (करनाल) से जाता है। भारत पर अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ ने बासमती चावल निर्यातकों की चिंता जरूर बढ़ा दी है, लेकिन बड़े नुकसान की आशंका नहीं है।
ऑल इडिया राइस एक्सपोर्ट एसोसिएशन के प्रधान सतीश गोयल का कहना है कि करनाल में दावत, श्रीजगदंबा, डबल चाबी, एरोमा, वीर, ग्लैक्सी, महारानी, दोनार और डीडी इंटरनेशनल जैसे बड़े ब्रांड हैं। अगर अमेरिका को बासमती चावल का निर्यात नहीं होता है, तो भी बड़ा नुकसान नहीं होगा। अमेरिका को निर्यात होने वाले 2.70 लाख टन चावल को अन्य देशों में खपाना बड़ी बात नहीं है। इसके लिए नए बाजार को तलाश कर उसकी भरपाई आसानी से की जा सकती है। फिलहाल, चावल निर्यातक वेट एंड वॉच की स्थिति में हैं, क्योंकि इस साल का निर्यात लगभग पूरा हो चुका है और नया सीजन शुरू होने में अभी दो-तीन महीने शेष हैं।
पाकिस्तान पूरी नहीं कर सकता अमेरिका की जरूरत
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्ट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष एवं हरियाणा राइस एक्सपोर्ट एसोसिएशन के प्रधान सुशील जैन ने बताया कि अमेरिका भारत और पाकिस्तान से ही बासमती चावल खरीदता है। लेकिन, पाकिस्तान अमेरिका की जरूरत पूरी करने में सक्षम नहीं है, क्योंकि इस्लामाबाद के कुल करीब 9 लाख टन चावल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 50 से 60 हजार टन है।
- भारत अमेरिका को 2.70 लाख टन बासमती चावल निर्यात करता है। इसलिए, अमेरिका को अभी भारत से चावल खरीदना ही होगा।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से ऑल इडिया राइस एक्सपोर्ट एसोसिएशन ने तीन अगस्त को मुलाकात की थी। सरकार ने भरोसा दिलाया है कि नुकसान की भरपाई के लिए नए बाजार खोजे जाएंगे।
पानीपत उत्तर भारत का बड़ा टैक्सटाइल हब है, जहां से हर साल करीब 20,000 करोड़ रुपये का निर्यात होता है। इसमें से 10,000 करोड़ रुपये तक का व्यापार अकेले अमेरिकी बाजार से जुड़ा है।निर्यातकों का कहना है कि अमेरिका के टैरिफ बढ़ाने से 500 करोड़ रुपये के पुराने ऑर्डर पर संकट आ गया है। नए ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं। कुछ कंपनियां पहले ही अन्य देशों में संभावनाएं तलाश रही हैं। तुर्किये और बांग्लादेश से प्रतिस्पर्धा बढ़ने की भी आशंका जताई जा रही है।
- एस्टेट इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के प्रधान श्रीभगवान अग्रवाल ने बताया, कुछ निर्यातक पहले से ही स्थिति को भांप गए थे। ऐसे में उन्होंने अमेरिका से बड़े ऑर्डर लेना बंद कर दिया और उत्पादन में भी कटौती की है।
हरियाणा चैंबर ऑफ कॉमर्स पानीपत चैप्टर के प्रधान विनोद धमीजा ने बताया, तुर्किये अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई चुनौती है। सिंगापुर के जरिये ही अमेरिका में व्यापार की गुंजाइश है। यूके से द्विपक्षीय समझौते से कुछ लाभ मिल सकता है। अफ्रीकी देशों में व्यापार बढ़ाया जाएगा। ब्राजील में भी अच्छा बाजार है।
- 20000 करोड़ रुपये का सालाना माल जाता है पानीपत से।
- 10000 करोड़ रुपये का व्यापार अकेले अमेरिका से।
पानीपत में 35,000 टेक्सटाइल इकाइयां हैं। इनमें 500 एक्सपोर्ट हाउस हैं। इनसे करीब 2.5 लाख लोगों को रोजगार मिला है। नए ऑर्डर नहीं मिलने पर इनकी आजीविका पर असर पड़ेगा।
रोहतक का नट-बोल्ट उद्योग सालाना 5,000 करोड़ का कारोबार करता है। इसमें 70 फीसदी निर्यात अमेरिका को होता है। उद्यमियों का कहना है कि 7 अगस्त से नया टैरिफ लागू होता है तो न सिर्फ आपूर्ति प्रभावित होगी, बल्कि कारोबार मुश्किल हो जाएगा। चिंता की बात है कि कुछ कंपनियों को दो महीने से अमेरिका से कोई ऑर्डर नहीं मिला है। बड़ी कंपनियां पुराने ऑर्डर को पूरा करने में जुटी हैं। भविष्य के लिए जो ऑर्डर मिले हैं, उनकी आपूर्ति पर टैरिफ का असर दिखेगा। अतिरिक्त टैरिफ से जिले की औद्योगिक इकाइयों के लिए दुनिया के बड़े बाजारों में माल बेचना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि उत्पाद 25 फीसदी तक महंगा हो जाएगा। इसका असर कंपनी पर सीधा न पड़कर ग्राहक पर पड़ेगा।
5000 करोड़ का सालाना कारोबार करता है नट-बोल्ट उद्योग
जसमेर लाठर, एमडी, एरो फास्टनर्स के एमडी जसमेर लाठर ने बताया, हम अमेरिका, यूके और यूरोप में नट-बोल्ट की आपूर्ति करते हैं। टैरिफ के कारण यहां से करीब 50 करोड़ रुपये के ही ऑर्डर बुक हुए हैं।
टैरिफ 40-50 वर्षों में सबसे ज्यादा
हमारा 70 फीसदी नट-बोल्ट अमेरिका जाता है। पहले कस्टम ड्यूटी तीन फीसदी थी। अब यह बढ़कर 25 फीसदी हो गई है। यह पिछले 40-50 वर्षों में बहुत ज्यादा है। इसके अलावा, 25 फीसदी टैरिफ और भी है। इससे हमारा उत्पाद काफी महंगा हो जाएगा।
-राजेश जैन, एमडी, एलपीएस बोसार्ड
पंजाब में भी अमेरिका से मोहभंग, भाने लगे रूस समेत ठंडे देश
ट्रंप की टैरिफ नीतियों से आहत निर्यातक अब अन्य देशों से संपर्क साध रहे हैं। रेडिमेड कपड़ों पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने के बाद लुधियाना के वुलेन गारमेंट्स कारोबारियों का अमेरिका से मोहभंग हो गया है। वे अब रूस समेत अन्य ठंडे देशों के खरीदारों के साथ सीधे संपर्क में हैं। उनका तर्क है कि आने वाले वक्त में नए बाजारों में अपनी पकड़ मजबूत करने अमेरिका से होने वाले नुकसान की भरपाई हो सकेगी। लेकिन, इसमें सरकार का सहयोग भी जरूरी है।
इन देशों के बाजारों को खंगाल रहे कारोबारी
कारोबारियों का कहना है, ऑस्ट्रेलिया और यूके समेत कई देशों में भारतीय उत्पादों की अच्छी मांग है। रूस समेत सीआईएस देशों (यूक्रेन, बेलारूस, अजरबैजान, आर्मेनिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, मोल्दोवा, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और जॉर्जिया) के बाजारों को भी खंगाला जा रहा है। यूरोपीय देशों में भी वुलेन गारमेंट्स की मांग रहती है। इन बाजारों में भारतीय उत्पाद प्रतिस्पर्धात्मक हैं।
रूस में भारतीय वुलेन गारमेंट्स की प्रदर्शनी
अगले महीने रूस में भारतीय वुलेन गारमेंट्स की प्रदर्शनी लगाई जा रही है। वहां के खरीदारों से अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। इसके अलावा, अमेरिका एवं अन्य देशों के साथ डॉलर में कारोबार हो रहा है, लेकिन रूस के साथ रुपये में कारोबार की सुविधा है। इससे ट्रेड में स्थिरता आएगी और उद्यमी डॉलर की उठापठक से भी बच सकेंगे।
-हरीश दुआ, प्रधान, अपैरल निटवियर एक्सपोर्टर्स ऑर्गेनाइजेशन
ट्रंप के अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ ने उत्तर प्रदेश के निर्यातकों के लिए बाजार में टिके रहने की चुनौती खड़ी कर दी है। अमेरिकी आयातकों ने फुटवियर, चमड़ा, धातु और कालीन जैसे परंपरागत उत्पादों के आर्डर में खासी कटौती कर दी है। इससे अमेरिका को होने वाले कुल 35,545 करोड़ के निर्यात में 15,000 करोड़ रुपये तक की कमी आ सकती है।
- कारोबारियों का कहना है, अधिकांश सेक्टरों में पिछले आर्डर की 80 फीसदी आपूर्ति हो चुकी है। 20 फीसदी की अगले एक महीने में हो जाएगी। ताजा हालात के बाद 45 फीसदी से ज्यादा नए आर्डर होल्ड कर दिए गए हैं। चर्म निर्यात परिषद व अन्य संगठनों ने टैरिफ विवाद का हल होने तक केंद्र से अतिरिक्त सब्सिडी की मांग की है।
- उत्तर प्रदेश की पारंपरिक ताकत गैर-बुने कपड़े हैं, जिसमें एक साल में 11 फीसदी की वृद्धि देखी गई है। 15,500 करोड़ के निर्यात वाला ये सेक्टर बुरी तरह प्रभावित होगा। इसी तरह, यांत्रिक उपकरण, फुटवियर, फर्नीचर और राज्य की समृद्ध हस्तशिल्प विरासत कालीन जैसे क्षेत्र भी प्रभावित होंगे।
व्यय वित्त समिति वाणिज्य मंत्रालय के 2,250 करोड़ रुपये के निर्यात संवर्धन मिशन के प्रस्ताव पर जल्द ही विचार करेगी। इस मिशन का उद्देश्य घरेलू निर्यातकों को वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं, विशेषकर ट्रंप टैरिफ से बचाव में मदद करना है। एक अधिकारी ने कहा, वित्त मंत्रालय की यह समिति जल्द ही इस प्रस्ताव पर विचार करेगी। मंजूरी के बाद यह प्रस्ताव मंत्रिमंडल के पास जाएगा। इस मिशन में एमएसएमई और ई-कॉमर्स निर्यातकों के लिए आसान ऋण योजनाएं, विदेश में गोदाम सुविधा और वैश्विक ब्रांडिंग पहल जैसे घटक शामिल हो सकते हैं।
- वाणिज्य मंत्रालय ने अमेरिकी शुल्कों के प्रभाव को लेकर कपड़ा, रसायन, चमड़ा एवं जूता जैसे क्षेत्रों के हितधारकों के साथ कई दौर की बैठकें की हैं।
- सरकार ने एक फरवरी को पेश 2025-26 के बजट में 2,250 करोड़ रुपये के इस मिशन की घोषणा की थी।
टैरिफ में वृद्धि से उत्तराखंड से निर्यात होने वाले फार्मा, कीमत पत्थरों और एग्रो उत्पादों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। राज्य गठन के बाद उत्तराखंड ऑटोमोबाइल और फार्मा हब के रूप में स्थापित हुआ है। उत्तराखंड ड्रग्स मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद कलानी ने बताया, भारत के मुकाबले चीन और वियतनाम समेत अन्य देशों में टैरिफ कम है। इसका नुकसान फार्मा उद्योग को उठाना पड़ेगा।
- राज्य के हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और देहरादून के सेलाकुई औद्योगिक क्षेत्र में 280 फार्मा कंपनियां हैं। उत्तराखंड का देश के देश के फार्मा विनिर्माण में 20 फीसदी योगदान है। सालाना 1,500 करोड़ की दवाइयों का उत्पादन किया जा जाता है। इसमें 200-300 करोड़ रुपये की दवाइयों का निर्यात होता है।
- एशिया के सबसे बड़े फार्मा हब बद्दी में कुछ कंपनियां सिर्फ अमेरिका के लिए बनाती हैं दवाएं
- 3000 करोड़ रुपये की अमेरिका से दवाओं की मांग लंबित
- देश में बनने वाली कुल दवाओं में से करीब 35 फीसदी हिमाचल के बद्दी, बरोटीवाला और नालागढ़ औद्योगिक क्षेत्र में तैयार होती हैं। एशिया के इस सबसे बड़े फार्मा हब बद्दी में 350 दवा कंपनियां हैं। इसके अलावा, प्रदेश में कालाअंब, पांवटा साहिब, ऊना, अंब, कांगड़ा के संसारपुर टैरेस और सोलन के परवाणू में भी कई फार्मा कंपनियां हैं।
- बद्दी क्षेत्र में एक दर्जन कंपनियां ऐसी हैं, जहां से दवाओं का व्यापार सीधे अमेरिका के लिए होता है। ये अमेरिका की मांग के अनुसार दवाइयां बनाती हैं। इनकी मशीनरी भी अमेरिका ने अपने हिसाब से इंस्टॉल कराई है।
हिमाचल दवा निर्माता संघ के प्रदेश अध्यक्ष राजेश गुप्ता ने बताया, भारत की 40 फीसदी दवाएं अमेरिका खरीदता है। अगर फार्मा उद्योग पर भी टैरिफ लगता तो बड़ी संख्या में दवा कंपनियों के बंद होने की नौबत आ सकती है, क्योंकि अमेरिका के प्रभाव वाले यूरोप के अन्य देश भी टैरिफ के चलते भारत से दवा खरीद बंद कर सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के हैंडलूम और हस्तशिल्प उद्योग (विशेषकर पश्मीना एवं कानी शाल) ने बीते तीन साल में निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। टैरिफ के बाद कारोबारी सतर्क हो गए हैं। जम्मू-कश्मीर शॉल निर्यातक संगठन के अध्यक्ष मोहम्मद लतीफ भट्ट ने बताया, अमेरिका में माल महंगा होगा, पर कोई ऑर्डर रद्द नहीं हुआ है। हमारे लिए दूसरे देशों के बाजार खुले हुए हैं। अगर अमरीका में मांग घटी तो निर्यात को दूसरे देशों के बाजारों में मोड़ देंगे।
- वाणिज्यिक खुफिया एवं सांख्यिकी महानिदेशालय और जम्मू-कश्मीर आर्थिक सर्वे के मुताबिक, प्रदेश से कुल निर्यात तीन साल में बढ़कर 2023-24 में 1,162 करोड़ पहुंच गया। इसमें शॉल का निर्यात मूल्य 477.24 करोड़ रहा।
भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन का कहना है कि भारत पर अमेरिकी टैरिफ से जुड़ी चुनौतियां ज्यादा समय तक नहीं टिकने वाली हैं। इसका असर छह महीने (एक या दो तिमाही) में खत्म हो जाएगा। हालांकि, देश अन्य दीर्घकालिक चुनौतियों से जूझ रहा है। इससे निपटने के लिए निजी क्षेत्र को और अधिक प्रयास करने की जरूरत है। सीईए ने ट्रंप टैरिफ पर कहा, भारतीय उत्पादों पर 50 फीसदी ट्रंप टैरिफ का दीर्घकालिक रूप से भारत पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन, अल्पावधि में कुछ असर जरूर दिखेगा। रत्न-आभूषण, झींगा और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों पर पहले चरण का असर पड़ने के बाद दूसरे और तीसरे चरण के प्रभाव पड़ेंगे। उनसे निपटना अधिक कठिन होगा। सरकार स्थिति से अवगत है और प्रभावित क्षेत्रों के साथ बातचीत शुरू हो चुकी है। आने वाले दिनों में नीति निर्माताओं की प्रतिक्रिया मिलेगी और कुछ उपाय सामने आएंगे, लेकिन लोगों को धैर्य रखना होगा। नागेश्वरन ने कहा, कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सकता कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर उच्च टैरिफ लगाने का फैसला क्यों किया। क्या यह ऑपरेशन सिंदूर का नतीजा है या इससे भी ज्यादा रणनीतिक।