क्रांति के 10 साल: डिजिटल भुगतान में यूपीआई की धाक, 1.78 करोड़ से बढ़कर 24,162 करोड़ लेनदेन तक पहुंचा सफर
भारत के डिजिटल भुगतान की रीढ़ बने यूपीआई ने अपने बेमिसाल सफर के 10 साल पूरे कर लिए हैं। जानें कैसे मात्र 44 बैंकों से शुरू होकर आज 741 बैंकों तक पहुंचा यह नेटवर्क, और कैसे इसने दुनिया के कुल रियल-टाइम भुगतानों में 49% हिस्सेदारी हासिल कर वैश्विक मंच पर भारत का डंका बजाया। पूरी खबर के लिए अभी पढ़ें।
विस्तार
भारत में डिजिटल भुगतान क्रांति की रीढ़ बन चुका यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) अपने सफर के 10 साल पूरे कर रहा है। एनपीसीआई द्वारा 25 अगस्त 2016 को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की देखरेख में लॉन्च किए गए यूपीआई ने देश के कोने-कोने में डिजिटल वित्तीय समावेश का नया इतिहास रचा है। वित्त मंत्रालय के अनुसार, यूपीआई आज दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम भुगतान तंत्र बन चुका है, जिसने बीते दशक में लेनदेन की संख्या और मूल्य दोनों मोर्चों पर अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की है।
डिजिटल लेनदेन की इस क्रांति की शुरुआत कब और कैसे हुई थी?
यूपीआई की शुरुआत 25 अगस्त 2016 को हुई थी। लॉन्च के समय अप्रैल 2016 में केवल 21 बैंक इसके साथ लाइव थे और पहले महीने अगस्त 2016 में मात्र 90,000 लेनदेन हुए। वित्तीय वर्ष 2016-17 में लाइव बैंकों की संख्या 44 थी, जो वित्तीय वर्ष 2025-26 तक बढ़कर 703 हो गई और जुलाई 2026 तक 741 बैंकों तक पहुंच गई। आज यह सरकारी, निजी, स्मॉल फाइनेंस, पेमेंट्स और सहकारी बैंकों को जोड़कर देश के सुदूर इलाकों तक पहुंच चुका है।
आंकड़ों के आईने में यूपीआई ने कितनी बड़ी छलांग लगाई है?
बीते दशक में यूपीआई लेनदेन की मात्रा में लगभग 13,000 गुना की विशाल वृद्धि हुई है। वित्तीय वर्ष 2016-17 में वार्षिक लेनदेन की मात्रा जहां 1.78 करोड़ थी, वहीं वित्तीय वर्ष 2025-26 में यह 188% सीएजीआर के साथ 24,162 करोड़ पर पहुंच गई। इसी तरह, लेनदेन का मूल्य वित्तीय वर्ष 2016-17 के 0.07 लाख करोड़ रुपये से लगभग 4,000 गुना बढ़कर वित्तीय वर्ष 2025-26 में लगभग 314 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसमें 155% का सीएजीआर दर्ज किया गया। वर्ष 2026 में प्रतिदिन औसतन 66 करोड़ लेनदेन हुए, जबकि जुलाई 2026 में 2,366 करोड़ लेनदेन के साथ ₹29.88 लाख करोड़ मूल्य का रिकॉर्ड बना।
क्या छोटे लेनदेन में भी यूपीआई का दबदबा बढ़ा है?
यूपीआई अब रोजमर्रा की खरीदारी का अभिन्न हिस्सा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में पर्सन-टू-मर्चेंट (पीटूएम) यानी व्यापारियों को किए जाने वाले भुगतान की कुल लेनदेन मात्रा में हिस्सेदारी 63% रही, जो बार-बार होने वाले छोटे खुदरा भुगतानों को दर्शाती है। इसके विपरीत, व्यक्तियों के बीच होने वाले लेनदेन (पीटूपी) का कुल मूल्य में 71% योगदान है। संख्या के लिहाज से पी2एम लेनदेन में 86% भुगतान ₹500 से कम के हैं, जो साबित करता है कि छोटे खर्चों के लिए लोग नकदी के बजाय यूपीआई को चुन रहे हैं।
वैश्विक मंच पर भारतीय यूपीआई का डंका कैसे बज रहा है?
यूपीआई आज घरेलू सीमाएं लांघकर वैश्विक बेंचमार्क बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भी इसे दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम भुगतान प्रणाली माना है। वर्ष 2025 तक वैश्विक रियल-टाइम लेनदेन की मात्रा में भारतीय यूपीआई का हिस्सा लगभग 49% रहा है। वर्तमान में यह दुनिया के 11 देशों में चालू है, जिनमें संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), फ्रांस, भूटान, श्रीलंका, नेपाल, सिंगापुर, मॉरीशस, कतर, कंबोडिया, ग्रीस और मालदीव शामिल हैं।
यूपीआई के अगले दशक का रोडमैप क्या होने वाला है?
यूपीआई का अगला दशक भारत के डिजिटल भुगतान परिदृश्य में और भी बड़ा बदलाव लाएगा। सरकार नए उपयोगकर्ताओं और व्यापारियों को इस इकोसिस्टम से जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है। नीतिगत सहयोग, निरंतर तकनीकी प्रगति और वित्तीय समावेशन के बल पर यूपीआई-आधारित नवाचार के अगले चरण को मजबूत किया जाएगा ताकि देश के हर नागरिक को सुरक्षित और त्वरित भुगतान की सुविधा मिलती रहे।