Budget 2021: नौकरीपेशा और मध्य वर्ग के लिए विशेष योजनाएं पेश कर सकती है सरकार, गिरती अर्थव्यवस्था संभालना बड़ी चुनौती
- प्रमुख अर्थशास्त्रियों की राय- ढांचागत निवेश में बढ़ोतरी और उच्च टैक्स दरों से हो सकता है फायदा
- पीएसयू के विनिवेश और विदेशी कर्ज के माध्यम से पैसा जुटाने का सुझाव
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अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि सरकार 2021-22 के बजट में ऐसे उपाय करेगी जो बाजार में मांग बढ़ाने वाले साबित होंगे। सरकार को मूल ढांचागत खर्च बढ़ाने का भी सुझाव दिया जा रहा है, जिससे बाजार में तेजी आए और रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी हो। कोरोना काल में आर्थिक संसाधनों की कमी को पूरा करने के लिए पीएसयू संस्थानों के विनिवेश और विदेशी संस्थानों से कर्ज लेने का सुझाव दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे समय में जब कच्चे तेल की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ोतरी हो रही है, बढ़ती महंगाई पर लगाम लगाना सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। सुझाव है कि तेल की कीमतें स्थिर रखकर जनता को महंगाई की मार से बचाने की कोशिश की जानी चाहिए।
पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (PHDCCI) के प्रमुख अर्थशास्त्री डॉ. एसपी शर्मा ने अमर उजाला को बताया कि अक्तूबर-दिसंबर की तिमाही में हर महीने का जीएसटी कलेक्शन एक लाख करोड़ रूपये से ऊपर रहा है। यह अर्थव्यवस्था में सुधार का स्पष्ट संकेत है। इसके साथ-साथ टैक्स आधार (Tax Base) में सुधार का भी प्रमाण है। अगर सरकार नए सुधारों के जरिए टैक्स आधार का दायरा बढ़ा पाती है तो इससे टैक्स कलेक्शन में और ज्यादा मजबूती आएगी। इससे सरकार के पास कल्याणकारी योजनाओं और ढांचागत निर्माण क्षेत्र में निवेश करने के लिए ज्यादा धन उपलब्ध होगा।
डॉ. एसपी शर्मा के मुताबिक इसके लिए टैक्स की ऊपरी दर को 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी पर लाया जाना चाहिए। सामान्य लोगों की भाषा में इसे कॉर्पोरेट टैक्स भी कहा जाता है। उभरती अर्थव्यवस्था वाले हमारे देश में यह अभी भी बहुत ज्यादा है। टैक्स दरें घटाने से कॉर्पोरेट कंपनियों और ज्यादा आय वाले लोगों के पास ज्यादा धन बचेगा जो नए निवेश और खर्च के तौर पर बाजार में सामने आएगा। इससे बाजार में मांग बढ़ेगी और रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग क्षेत्र (MSME) कोरोना काल में आर्थिक रूप से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। यह वर्ग लगभग 6 करोड़ छोटी-छोटी दुकानों-फैक्ट्री इकाइयों से बना हुआ है जो देश में सबसे ज्यादा रोजगार दिलाने की भूमिका निभाता है। मजदूरों के पलायन से भी यही वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। सरकार ने इस वर्ग को मंदी से उबारने के लिए लगभग 22 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है जिसका 15 फीसदी बजट के रूप में और 85 फीसदी कर्ज के रूप में देना तय किया गया है।
लेकिन बाजार में मांग न होने के कारण कोई भी व्यापारी कर्ज लेने से बच रहा है, जिसके कारण सरकार के प्रयासों का सही लाभ नहीं मिल पा रहा है। इस सेक्टर को मजबूती देने के लिए सरकार को वैकल्पिक प्रयास करने होंगे। इसके लिए इस वर्ग की टैक्स दरें कम करना, ऐसे ढांचागत सेवाओं में निवेश करना शामिल हो सकता है, जिससे इस वर्ग की सेवाओं की मांग का सृजन हो सके।
एक्सपोर्ट बढ़ाना अर्थव्यवस्था में मांग को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। वर्तमान परिस्थिति में तमाम देशों की अर्थव्यवस्था भी चरमराई हुई है और कोरोना काल की वजह से मांग ठप पड़ी हुई है। परिस्थिति को देखते हुए निर्यात के लिए उद्यमियों को विशेष छूट देने की आवश्यकता है। सरकार इसके लिए टैक्स छूट के साथ-साथ कर्ज उपलब्धता बढ़ाने पर विचार कर सकती है।
ढांचागत खर्च बढ़ाना अर्थव्यवस्था में तेजी का एकमात्र विकल्प
ताइवान की चाओयंग यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नॉलॉजी में अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा के अनुसार केंद्र सरकार ने कई घोषणाओं के जरिए देश की अर्थव्यवस्था में मजबूती का प्रयास किया है। इसका कुछ असर दिख रहा है और कोरोना काल में जहां अर्थव्यवस्था में जी़डीपी की 25 फीसदी तक की गिरावट का अनुमान लगाया जा रहा था, जो अब केवल 7.7 फीसदी तक सिमट कर रह गया है। यह आंकड़ा बताता है कि सरकार के प्रयास काफी सफल रहे हैं। लेकिन इसकी एक सीमा है। अर्थव्यवस्था को इससे आगे की रफ्तार देने के लिए ढांचागत निवेश का 'टॉप गियर' लगाना होगा।
सरकार ने मेगा गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट, गंगा एक्सप्रेस वे, मेट्रो रेल विस्तार, बुलेट ट्रेन और जलमार्ग के विकास की महत्वाकांक्षी योजनाएं बनाई हैं। इसी प्रकार की दर्जनों सेवाओं को शुरू करने की आवश्यकता है। इन योजनाओं में भारी निवेश से सीमेंट, स्टील, पेट्रोल, परिवहन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मांग बढ़ेगी, जो आंतरिक खिंचाव से दूसरे क्षेत्रों में भी अच्छी मांग पैदा करेंगी। इससे रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि होगी जो अंततः लोगों के हाथों में पैसा पहुंचाने में कारगर होंगी।
यह निवेश स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी होना चाहिए। इन क्षेत्रों में निवेश लंबी अवधि में गुणवत्तायुक्त मानव संसाधन निर्माण और सेवा क्षेत्र के विस्तार में बेहद उपयोगी भूमिका निभाता है। ध्यान देने की बात यह है कि देश की अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्रों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ती जा रही है। वर्तमान स्थिति में यह 55 फीसदी तक बढ़ चुकी है। देश की जीडीपी में सेवा क्षेत्र की अहम भूमिका देखकर कोई सरकार इसकी उपेक्षा नहीं कर सकती, जबकि भारत सरकार ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बजट कम करने का काम किया है।
हर क्षेत्र पर सरकार की नजर
भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. गोपालकृष्ण अग्रवाल ने बताया कि कोरोना काल के प्रारंभ से ही अर्थव्यवस्था सुधारना सरकार की प्राथमिकताओं में रहा है। यही कारण है कि कई चरणों में सरकार ने कर्ज सुधार की योजनाएं पेश की और कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नए निवेश की योजनाएं बनाईं। उन्होंने कहा कि इस समय बढ़ती महंगाई दर पर लगाम लगाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। उन्हें उम्मीद है कि सरकार बजट में ऐसे उपायों की घोषणा करेगी, जो मांग में बढ़ोतरी करने वाले, नौकरियों के सृजन करने वाले और लोगों को टैक्स से राहत देने वाली होगी।
भाजपा नेता के मुताबिक लगातार टैक्स कलेक्शन में बढ़ोतरी बाजार से मंदी के दूर होने का संकेत है। शेयर मार्केट में आ रही रिकॉर्ड तेजी भी यही साबित करती है कि विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार पर भरोसा लौट रहा है। इस मौके का फायदा भारतीय कंपनियों को पूंजी सृजित करने में लगाना चाहिए, जिससे उन्हें आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल करने में मदद मिलेगी।
डॉ. गोपालकृष्ण अग्रवाल के अनुसार सरकार मध्य वर्ग को ध्यान में रखकर बजट पेश कर सकती है, क्योंकि यह मध्य वर्ग ही मांग सृजित करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। इसके लिए नौकरीपेशा लोगों के लिए विशेष योजनाएं पेश की जा सकती हैं।
डॉ. एसपी शर्मा के अनुसार कोरोना काल की मंदी ने सरकार के पास आय की संभावनाओं को कम अवश्य किया है, लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा और ढांचागत सेवाओं में निवेश बढ़ाने के लिए उसे सीमित अवधि के कर्ज लेने से नहीं हिचकना चाहिए। इन योजनाओं से उचित मात्रा में रिटर्न प्राप्त होगा, जो अंततः लाभ का सौदा साबित होगा। गोपालकृष्ण अग्रवाल के मुताबिक पीएसयू संस्थानों के विनिवेश के जरिए सरकार पैसा जुटा सकती है। वर्तमान समय में किसी नए तरह के टैक्स की कोई गुंजाइश नहीं है।