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श्रीलंका आर्थिक संकट: पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे बोले- देश को चीन या किसी और मुल्क के हाथ नहीं सौंपा गया

Mon, 18 Apr 2022 05:39 PM IST
दीपक चतुर्वेदी बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: दीपक चतुर्वेदी Updated Mon, 18 Apr 2022 05:39 PM IST
सार

आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका के पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने सोमवार को कहा कि श्रीलंका में चीन की कुछ परियोजनाएं हैं, लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं है कि देश को चीन या फिर किसी और मुल्क को सौंप दिया गया है।

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Sri lanka Crisis former PM Ranil Wickremesinghe said country has not been handed over to China or to anyone else
श्रीलंका संकट - फोटो : पीटीआई

विस्तार

श्रीलंका के हालात हर दिन के साथ बदतर होते जा रहे हैं। विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो चुका है और चीन समेत अन्य देशों का कर्ज आसमान पर पहुंच गया है। ताजा हालातों की बात करें तो द्विपीय देश ने साफ कर दिया है कि वो विदेशी कर्ज को चुकाने की स्थिति में नहीं है। इस बीच इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक संकट से जूझ रहे देश के पूर्व प्रधानमंत्री ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि श्रीलंका को किसी देश के हाथ में नहीं सौंपा गया है। 

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देश में चीन की कुछ परियोजनाएं
श्रीलंका में गंभीर आर्थिक संकट के बीच पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने सोमवार को कहा कि श्रीलंका में चीन की कुछ परियोजनाएं हैं, लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं है कि देश को चीन या फिर किसी और मुल्क को सौंप दिया गया है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि ईंधन के लिए भारत की क्रेडिट लाइन मई के पहले सप्ताह तक समाप्त हो जाएगी, इससे एक और संकट खड़ा हो जाएगा। फिलहाल, श्रीलंका सरकार ने भारत से क्रेडिट लाइन का विस्तार करने का अनुरोध किया है, ये जरूरी है क्योंकि सरकार ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया है। 
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विदेशी मुद्रा खत्म, बिगड़े हालात
वर्तमान हालातों की अगर बात करें तो देश के विदेशी मुद्रा संकट के बीच पेट्रोलियम की कीमतें आसमान छू गई हैं और पेट्रोल-पंप सूखे पड़े हैं। श्रीलंका की सरकार के पार पेट्रोल और डीजल खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा नहीं बची है जिससे ये संकट और भी गहरा गया है। कुछ दिनों पहले श्रीलंका से ऐसी तस्वीरे आईं कि लोग पेट्रोल खरीदने के लिए पेट्रोल पंप पर टूट पड़े हैं और लोगों को नियंत्रित करने के लिए सेना बुलानी पड़ी। हजारों लोग घंटों तक कतार में इंतजार करके तेल खरीद रहे हैं। देश में डॉलर की कमी ने सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। देश में फरवरी में महंगाई 17.5 प्रतिशत के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई जो कि पूरे एशिया में सबसे ज्यादा है। यहां लोगों को एक ब्रेड का पैकेट भी 0.75 डॉलर (150) रुपये में खरीदना पड़ रहा है। यहीं नहीं मौजूदा समय में एक चाय के लिए लोगों के 100 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। देश में एक किलो मिर्च की कीमत 710 रुपये हो गई, एक ही महीने में मिर्च की कीमत में 287 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यही नहीं  बैंगन की कीमत में 51 फीसदी बढ़ी,  तो प्याज के दाम 40 फीसदी तक बढ़ गए। एक किलो आलू के लिए  200 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं। 
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कोलंबो स्टॉक मार्केट पर लगा ताला 
गौरतलब है कि 1948 में ब्रिटेन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से श्रीलंका अपने सबसे खराब आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। इस समस्या से उबरने के लिए सरकार को कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। हालात ये हैं कि श्रीलंकाई शेयर बाजार को आज से पांच दिन के लिए बंद कर दिया गया है। श्रीलंका के सिक्योरिटीज कमीशन के मुताबिक 18 अप्रैल से 22 अप्रैल तक कोलांबो स्टॉक एक्सचेंज को बंद रखने का आदेश जारी किया है। रिपोर्ट की मानें तो ये बड़ा फैसला इसलिए लिया गया है कि ताकि निवेशकों को देश की आर्थिक स्थिति को समझने और उसे स्वीकार करने का समय मिल सके। सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन ऑफ श्रीलंका (एसईसीएस) ने अपने बयान में कहा कि स्टॉक एक्सचेंज के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर और सभी शेयरहोल्डरों ने शेयर बाजार को अस्थायी रूप से कुछ दिनों के लिए बंद करने की मांग की थी।


श्रीलंका पर है कई देशों का भारी कर्ज
गौरतलब है कि श्रीलंका पर चीन, जापान, भारत और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का भारी कर्ज है, लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार की कमी के कारण वो अपने कर्जों की किस्त तक नहीं दे पा रहा है। श्रीलंका 51 अरब डॉलर (करीब 3 लाख 88 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा) के कर्ज के तले दबा हुआ है। इस तरह श्रीलंका की सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ उसे विदेशी कर्ज का पेमेंट करना है तो दूसरी तरफ अपने लोगों को मुश्किल से उबारना है। हालात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विश्व बैंक की ओर से बीते साल अनुमान जताया गया था कि कोरोना महामारी के शुरू होने के बाद से देश में 500,000 लोग गरीबी के जाल में फंस गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जो परिवार पहले संपन्न माने जाते थे, उनके लिए भी दो जून की रोटी जुटानी मुश्किल पड़ रही है।

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