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Trump Tariffs: 'भारत ने नियमों का पालन किया, रूसी तेल से लाभ नहीं कमाया', पीटर नवारो के बयान पर पुरी का जवाब
Mon, 01 Sep 2025 02:40 PM IST
निर्मल कांत
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Mon, 01 Sep 2025 02:40 PM IST
सार
Trump Tariffs: केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहाकर पीटर नवारो की 'लॉन्ड्रोमैट' वाली टिप्पणी पर पलटवार किया है। पुरी ने कहा कि भारत ने रूसी तेल के आयात में कोई नियम नहीं तोड़ा और इसका मकसद वैश्विक बाजार को स्थिर रखना था। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत दशकों से पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा निर्यातक रहा है और इसमें कोई मुनाफाखोरी नहीं हुई है।
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हरदीप सिंह पुरी (फाइल)
- फोटो : एएनआई
विस्तार
केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो की 'लॉन्ड्रोमैट' वाली टिप्पणी को सिरे से खारिज किया। उन्होंने साफ कहा कि भारत ने यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी तेल खरीदने में कोई नियम नहीं तोड़ा है और भारत की ऊर्जा व्यापार नीति ने वैश्विक बाजार को स्थिर रखने और कीमतों को नियंत्रित करने में मदद की है।यहां लॉन्ड्रोमैट का मतलब संदिग्ध चीजो को वैध दिखाने की प्रक्रिया या जगह है।
पुरी ने एक अंग्रेजी अखबार में लेख में लिखा कि भारत ने कोई मुनाफाखोरी नहीं की है। उन्होंने बताया कि रूस की ओर से फरवरी 2022 में यूक्रेन पर हमले से बहुत पहले से ही भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातक रहा है और युद्ध के बाद भी भारत का निर्यात और मुनाफा लगभग समान बना हुआ है। उन्होंने लिखा, कुछ आलोचक आरोप लगाते हैं कि भारत रूसी तेल के लिए ‘लॉन्ड्रोमैट’ बन गया है। इससे ज्यादा गलत बात कुछ नहीं हो सकती।
भारत की ओर से रूसी तेल का आयाद यूक्रेन युद्ध के बाद एक फीसदी से बढ़कर करीब 40 फीसदी पहुंचा, क्योंकि पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद भारत को भारी छूट पर तेल मिलने लगा। इससे भारत को सस्ती उर्जा मिलती रही, लेकिन अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप प्रशास ने इसकी आलोचना की और भारत पर आरोप लगाया कि वह रूसी तेल को रिफाइन करके उसे यूरोप के देशो में निर्यात कर रहा है और मुनाफा कमा रहा है।
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ये भी पढ़ें: अप्रैल-जून में भारत की GDP में उम्मीद से ज्यादा वृद्धि से बाजार गुलजार; सेंसेक्स-निफ्टी में तेजी
पिछले हफ्ते पीटर नवारो ने एक्स पर कई पोस्ट में यूक्रेन युद्ध को 'मोदी का युद्ध' बताया और कहा कि भारत रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 'युद्ध मशीन' को फंड कर रहा है। उन्होंने भारत को एक 'तेल लॉबी के हाथों में पड़ी लोकतांत्रिक लॉन्ड्री' बताया और प्रधानमंत्री मोदी की भगवा वस्त्रों में तस्वीर भी पोस्ट की।
पुरी ने इसका जवाब दिया कि ईरान या वेनेजुएला की तरह रूसी तेल पर कोई सीधा प्रतिबंध नहीं है। उन्होंने लिखा, रूसी तेल पर जी-7 और यूरोपीय संघ की ओर से एक मूल्य सीमा व्यवस्था लागू की गई है, जिसका उद्देश्य तेल की आपूर्ति को चालू रखना और रूस की आय सीमित करना है। ऐसे 18 पैकेज लाए गए हैं और भारत ने सभी का पालन किया है।
पुरी ने जोर देकर कहा कि भारत का हर लेन-देन वैध है। उन्होंने बताया कि भारत ने कानूनी जहाजरानी (शिपिंग), बीमा, प्रमाणित व्यापारियों और जांचे-परखे चैनलों के जरिए ही व्यापार किया है। भारत ने कोई नियम नहीं तोड़ा है, बल्कि वैश्विक बाजार को स्थिर किया है और कीमतों को बढ़ने से रोका है।
ब्रोकरेज फर्म सीएलएसए की हालिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए पुरी ने कहा कि अगर भारत रूसी तेल आयात बंद कर देता है, तो कच्चे तेल की कीमतें 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। क्योंकि रूसी तेल के खरीदार सीमित हैं, भारत के हटने से वैश्विक आपूर्ति में एक फीसदी की कमी आ सकती है, जिससे कीमतें और महंगाई दोनों बढ़ेंगी। पुरी ने बताया कि भारत दशकों से दुनिया का चौथा सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातक रहा है और उसके रिफाइनर दुनियाभर के तेल को प्रोसेस करते हैं।
ये भी पढ़ें: New Rules From 1st September: आज से बदल गए हैं कई नियम; एलपीजी, एटीएम चार्ज और एफडी ब्याज दरों में बड़े बदलाव
उन्होंने कहा, निर्यात से आपूर्ति श्रृंखला चलती रहती है। रूस से तेल प्रतिबंध के बाद यूरोप ने खुद भारत से ईंधन मंगवाना शुरू किया। भारत के निर्यात और रिफाइनिंग मार्जिन में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। इसलिए मुनाफाखोरी का सवाल ही नहीं उठता।
पुरी ने कहा कि भारत ने यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक दामों में उछाल के दौरान अपने नागरिकों को राहत देने के लिए कई कदम उठाए। सरकारी तेल कंपनियों ने डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर तक का नुकसान झेला, केंद्र और राज्य सरकारों ने टैक्स कम किए और यह नियम लागू किया गया कि जो रिफाइनर पेट्रोल-डीजल निर्यात करते हैं, उन्हें कम से कम 50% पेट्रोल और 30% डीजल घरेलू बाजार में बेचना होगा।
उन्होंने कहा, इन कदमों की वजह से भले ही सरकार को बड़ी वित्तीय लागत चुकानी पड़ी, लेकिन देश में एक भी पेट्रोल पंप सूखा नहीं पड़ा और आम जनता को स्थिर कीमतें मिलती रहीं। पुरी ने कहा, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक देश (रूस) को पूरी तरह से नजरअंदाज करना संभव नहीं है। जो लोग भारत पर उंगली उठा रहे हैं, वे इस सच्चाई को अनदेखा कर रहे हैं। भारत ने अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन कर एक संभावित 200 डॉलर प्रति बैरल के झटके को टालने में मदद की है।
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पुरी ने एक अंग्रेजी अखबार में लेख में लिखा कि भारत ने कोई मुनाफाखोरी नहीं की है। उन्होंने बताया कि रूस की ओर से फरवरी 2022 में यूक्रेन पर हमले से बहुत पहले से ही भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातक रहा है और युद्ध के बाद भी भारत का निर्यात और मुनाफा लगभग समान बना हुआ है। उन्होंने लिखा, कुछ आलोचक आरोप लगाते हैं कि भारत रूसी तेल के लिए ‘लॉन्ड्रोमैट’ बन गया है। इससे ज्यादा गलत बात कुछ नहीं हो सकती।
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भारत की ओर से रूसी तेल का आयाद यूक्रेन युद्ध के बाद एक फीसदी से बढ़कर करीब 40 फीसदी पहुंचा, क्योंकि पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद भारत को भारी छूट पर तेल मिलने लगा। इससे भारत को सस्ती उर्जा मिलती रही, लेकिन अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप प्रशास ने इसकी आलोचना की और भारत पर आरोप लगाया कि वह रूसी तेल को रिफाइन करके उसे यूरोप के देशो में निर्यात कर रहा है और मुनाफा कमा रहा है।
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पिछले हफ्ते पीटर नवारो ने एक्स पर कई पोस्ट में यूक्रेन युद्ध को 'मोदी का युद्ध' बताया और कहा कि भारत रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 'युद्ध मशीन' को फंड कर रहा है। उन्होंने भारत को एक 'तेल लॉबी के हाथों में पड़ी लोकतांत्रिक लॉन्ड्री' बताया और प्रधानमंत्री मोदी की भगवा वस्त्रों में तस्वीर भी पोस्ट की।
पुरी ने इसका जवाब दिया कि ईरान या वेनेजुएला की तरह रूसी तेल पर कोई सीधा प्रतिबंध नहीं है। उन्होंने लिखा, रूसी तेल पर जी-7 और यूरोपीय संघ की ओर से एक मूल्य सीमा व्यवस्था लागू की गई है, जिसका उद्देश्य तेल की आपूर्ति को चालू रखना और रूस की आय सीमित करना है। ऐसे 18 पैकेज लाए गए हैं और भारत ने सभी का पालन किया है।
पुरी ने जोर देकर कहा कि भारत का हर लेन-देन वैध है। उन्होंने बताया कि भारत ने कानूनी जहाजरानी (शिपिंग), बीमा, प्रमाणित व्यापारियों और जांचे-परखे चैनलों के जरिए ही व्यापार किया है। भारत ने कोई नियम नहीं तोड़ा है, बल्कि वैश्विक बाजार को स्थिर किया है और कीमतों को बढ़ने से रोका है।
ब्रोकरेज फर्म सीएलएसए की हालिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए पुरी ने कहा कि अगर भारत रूसी तेल आयात बंद कर देता है, तो कच्चे तेल की कीमतें 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। क्योंकि रूसी तेल के खरीदार सीमित हैं, भारत के हटने से वैश्विक आपूर्ति में एक फीसदी की कमी आ सकती है, जिससे कीमतें और महंगाई दोनों बढ़ेंगी। पुरी ने बताया कि भारत दशकों से दुनिया का चौथा सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातक रहा है और उसके रिफाइनर दुनियाभर के तेल को प्रोसेस करते हैं।
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उन्होंने कहा, निर्यात से आपूर्ति श्रृंखला चलती रहती है। रूस से तेल प्रतिबंध के बाद यूरोप ने खुद भारत से ईंधन मंगवाना शुरू किया। भारत के निर्यात और रिफाइनिंग मार्जिन में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। इसलिए मुनाफाखोरी का सवाल ही नहीं उठता।
पुरी ने कहा कि भारत ने यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक दामों में उछाल के दौरान अपने नागरिकों को राहत देने के लिए कई कदम उठाए। सरकारी तेल कंपनियों ने डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर तक का नुकसान झेला, केंद्र और राज्य सरकारों ने टैक्स कम किए और यह नियम लागू किया गया कि जो रिफाइनर पेट्रोल-डीजल निर्यात करते हैं, उन्हें कम से कम 50% पेट्रोल और 30% डीजल घरेलू बाजार में बेचना होगा।
उन्होंने कहा, इन कदमों की वजह से भले ही सरकार को बड़ी वित्तीय लागत चुकानी पड़ी, लेकिन देश में एक भी पेट्रोल पंप सूखा नहीं पड़ा और आम जनता को स्थिर कीमतें मिलती रहीं। पुरी ने कहा, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक देश (रूस) को पूरी तरह से नजरअंदाज करना संभव नहीं है। जो लोग भारत पर उंगली उठा रहे हैं, वे इस सच्चाई को अनदेखा कर रहे हैं। भारत ने अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन कर एक संभावित 200 डॉलर प्रति बैरल के झटके को टालने में मदद की है।
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