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₹1.5 लाख करोड़ के शेयर कंपनी मालिकों ने बेच दिए: 2025 में टूटे सारे रिकार्ड, क्या यह बाजार के लिए खतरा?

Fri, 19 Dec 2025 08:53 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Fri, 19 Dec 2025 08:53 PM IST
सार

2025 में भारतीय बाजार में प्रमोटरों ने ₹1.5 लाख करोड़ के शेयर बेचकर नया रिकॉर्ड बनाया। क्या यह शेयर बाजार में गिरावट का संकेत है या नए अवसरों की शुरुआत? आइए इसे विस्तार से समझें।

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Promoters Selling Company Promoters Selling news in Indian Market Equity Selling in 2025 by Promoters
शेयर बाजार में बिकवाली - फोटो : amarujala.com

विस्तार

क्या भारतीय शेयर बाजार अपने चरम पर पहुंच गया है? मौजूदा हालात में यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि जिन लोगों ने भारतीय बाजार की दिग्गज कंपनियों को खड़ा किया, वही अब अपनी हिस्सेदारी बेचने की होड़ में हैं। 2025 में भारतीय शेयर बाजार में कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था। इस साल भारतीय कंपनियों के प्रमोटरों ने बिकवाली के सारे कीर्तिमान तोड़ दिए।

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आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इस साल कंपनियों के प्रमोटर्स यानी मालिकों ने 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक के शेयर बेच दिए हैं। यह लगातार तीसरा साल है जब बिकवाली का यह आंकड़ा एक लाख करोड़ रुपये के पार चला गया है, और इसने 2024 के 1.43 लाख करोड़ रुपये के पिछले रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है ।
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आइए इस रिपोर्ट में, हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर 'कंपनी के मालिक' अपना हिस्सा क्यों बेच रहे हैं, यह पैसा कहां जा रहा है, और क्या इससे आम निवेशकों को डरने की जरूरत है?

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1. कंपनी मालिकों की बिकवाली के आंकड़े क्या कह रहे? 

प्राइम डेटाबेस और कोटक सिक्योरिटीज जैसे संस्थानों के आंकड़ों के अनुसार, इस बिकवाली की दो मुख्य धाराएं हैं। पहली धारा है, सेकेंडरी मार्केट जिसके तहत ब्लॉक और बल्क डील्स आते हैं। इसके जरिए लगभग 1.35 लाख करोड़ रुपये की हिस्सेदारी सीधे शेयर बाजार में ब्लॉक डील्स के जरिए बेची गई । बिकवाली की दूसरी धारा है प्राइमरी मार्केट। इसके तहत आईपीओ और ओएफएस आते हैं। आईपीओ के जरिए भी प्रमोटरों ने ऑफर फॉर सेल (OFS) का रास्ता अपनाकर 18,000 करोड़ रुपये से ज्यादा जुटाए हैं।




भारत के कुछ सबसे प्रमुख व्यापारिक घरानों ने इस दौरान जमकर बिकवाली की है। भारती एयरटेल के प्रमोटर्स ने सबसे अधिक 44,682 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। इसके बाद इंडिगो में 14,497 करोड़ रुपये, विशाल मेगामार्ट 10,220 करोड़ रुपये, एडब्ल्यूएल एग्री कमोडिटीज 11,064 करोड़ रुपये और एमफैसिस 4,726 करोड़ रुपये की बिकवाली हुई। सैजिलिटी, बजाज फिनसर्व, कोहांस लाइफसाइंसेज, हिंदुस्तान जिंक, डिक्सन, एप्टस, केफिन टेक और बजाज हाउसिंग फाइनेंस में भी प्रमोटर्स की ओर से की गई बिक्री 1,000 करोड़ रुपये से अधिक है।

बाजार में हुई इस बिकवाली का नतीजा यह हुआ है कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड कंपनियों में निजी प्रमोटरों की हिस्सेदारी जून 2025 तक गिरकर 40.58% रह गई है, जो पिछले 8 वर्षों का सबसे निचला स्तर है ।

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2. भारतीय कंपनियों के प्रमोटर्स अपनी हिस्सेदारी क्यों बेच रहे?

बाजार में एक पुरानी कहावत है- 'प्रमोटर्स नो बेस्ट' (प्रमोटर अपने बिजनेस को सबसे बेहतर समझते हैं)। अगर वे बेच रहे हैं, तो इसके कई रणनीतिक कारण हैं। ये क्या हैं, आइए इन्हें समझते हैं।

  • वैल्यूएशन का फायदा 

जेएम फाइनेंशियल के एक विश्लेषण के मुताबिक, बिकवाली का एक बड़ा हिस्सा स्मॉल-कैप कंपनियों में देखा गया है। जिन कंपनियों में प्रमोटरों ने हिस्सेदारी घटाई है, उनमें से 78% स्मॉल-कैप हैं । यह इशारा करता है कि प्रमोटरों को लगता है कि उनके शेयरों की कीमतें बहुत बढ़ चुकी हैं और मुनाफा कमाने का यह सही समय है।

  • कर्ज से छुटकारा 

कई प्रमोटर्स ने कंपनी का कर्ज चुकाने के लिए शेयर बेचने का रास्ता अपनाया है। इसका सबसे ताज़ा उदाहरण ओला इलेक्ट्रिक है, जहां संस्थापक भाविश अग्रवाल ने 324 करोड़ रुपये के शेयर बेचे ताकि वे अपना निजी कर्ज चुका सकें और गिरवी रखे शेयरों को छुड़ा सकें । बाजार ने इसे सकारात्मक तौर पर लिया और कंपनी के शेयरों में इससे मजबूती नजर आई।

  • एमएनसी कंपनियों की ग्लोबल स्ट्रैटेजी

कई विदेशी कंपनियां यानी एमएनसी अपने मुख्यालयों  का कर्ज कम करने के लिए भारतीय यूनिट्स का उपयोग 'एटीएम' की तरह कर रही हैं। उदाहरण के लिए, वर्ल्हपूल कॉरपोरेशन ने अपनी भारतीय इकाई में हिस्सेदारी घटाकर 1,489 करोड़ रुपये जुटाए हैं। ।

  • रणनीतिक फैसला

भारती एयरटेल में प्रमोटर परिवार और सिंगटेल ने पूंजी की रिसाइकलिंग का हवाला देकर हजारों करोड़ के शेयर बेचे, लेकिन कंपनी के मजबूत प्रदर्शन के कारण स्टॉक प्राइस पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। वहीं, इंडिगो में राकेश गंगवाल का एग्जिट एक लंबे समय से चल रहे विवाद के समाधान के लिए था।

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शेयर बाजार का हाल - फोटो : Adobestock

3. किन लोगों ने खरीदे प्रमोटर्स के 1.5 लाख करोड़ के शेयर?

अगर कंपनियों के मालिक अपने शेयर बेच रहे हैं, तो आखिर खरीद कौन रहा है? इसका जवाब है- घरेलू संस्थागत निवेशक यानी डीआईआई। पहली बार ऐसा हुआ है कि भारतीय म्यूचुअल फंड्स और बीमा कंपनियों ने विदेशी निवेशकों यानी एफआईआई से अधिक ताकत दिखाई है।

2025 में, जब विदेशी प्रमोटर्स (जैसे ब्लैकस्टोन ने एमफेसिस में और व्हर्लपूल ने अपनी हिस्सेदारी बेची) अपने शेयर बेच रहे थे, तब एचडीएफसी, एसबीआई और आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल जैसे म्यूचुअल फंड्स ने इन शेयरों को खरीदा। इस तरह, इन निवेशकों ने अपने पास हर महीने एसआईपी के जरिए आ रहे 20,000 करोड़ रुपये से अधिक के प्रवाह का इस्तेमाल कर बाजार को गिरने से बचा लिया है। जून 2025 तक, एनएसबी की कंपनियों में डीआईआई की हिस्सेदारी रिकॉर्ड 17.82% तक पहुंच गई, और इन्होंने एफआईआई  को पीछे छोड़ दिया है ।

4. क्या आईपीओ बाजार का इस्तेमाल प्रमोटर्स अपने फायदे के लिए कर रहे?

निवेशकों के लिए एक चिंताजनक पहलू आईपीओ बाजार का ढांचा है। 2025 में आईपीओ के जरिए जो 1.54 लाख करोड़ रुपये जुटाए गए, उसमें से 63% (करीब 97,000 करोड़ रुपये) ऑफर फॉर सेल यानी ओएफएस था। इसका मतलब है कि आईपीओ का बड़ा पैसा कंपनी के विकास (Capex) में नहीं, बल्कि पुराने निवेशकों (PE Funds और Promoters) की जेब गर्म करने में इस्तेमाल हुआ। यह एक 'वेल्थ ट्रांसफर' है, यानी रिटेल निवेशकों की जेब से पैसे निकलकर प्रमोटर्स की जेब में चले गए।

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शेयर बाजार का हाल - फोटो : Adobestock

5. क्या मौजूदा हालात में निवेशकों को घबराना चाहिए? 

बाजार के लिहाज से देखें तो प्रमोटर सेलिंग हमेशा बुरी नहीं होती। इसे अलग-अलग मामलों में अलग-अलग तरह से देखा जाना चाहिए। जैसे अगर कोई स्मॉल-कैप कंपनी है, जिसके फंडामेंटल कमजोर हैं और प्रमोटर लगातार हिस्सा बेच रहे हैं, तो यह चिंता का विषय है। रिटेल निवेशकों को ऐसे शेयरों में बॉटम फिशिंग यानी गिरावट के दौरान खरीदारी से बचना चाहिए।

वहीं दूसरी ओर, अगर बिकवाली का मकसद 'प्लेज हटाना' यानी गिरवी पड़े शेयरों को छुड़ाना है, जैसा ओला इलेक्ट्रिक के मामले में किया गया या 'संस्थागत निवेशकों को जोड़ा गया' जैसा एमफेसिस के केस में हुआ, तो लंबी अवधि में इसे सही कहा जा सकता है। जब ब्लैकस्टोन ने एमफेसिस में अपना हिस्सा बेचा, तो घरेलू म्यूचुअल फंड्स ने इसे हाथों-हाथ लिया, जो स्टॉक की गुणवत्ता पर निवेशकों के भरोसे को दिखाता है। 

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6. आम निवेशकों के लिए इस बिकवाली के क्या मायने?

प्रमोटर्स की ओर से भारतीय बाजार में 1.5 लाख करोड़ की बिकवाली का आंकड़ा डरावना लग सकता है, लेकिन यह भारतीय बाजार के परिपक्व होने का भी संकेत है। अब कंपनियों का मालिकाना हक परिवारों से शिफ्ट होकर संस्थानों के पास जा रहा है। यह बाजार के लिहाज से अच्छी चीज हो सकती है।

लेकिन, बाजार में हो रही बिकवाली के बीच निवेशकों को 'क्या बेचा जा रहा है' से ज्यादा इस पर ध्यान देना चाहिए कि 'क्यों बेचा जा रहा है' और 'कौन खरीद रहा है'? अगर खरीदार मजबूत डीआई या एफआईआई हैं, तो फिर भी कुछ हद तक राहत की बात है। लेकिन, अगर बिकवाली केवल खुदरा निवेशकों के भरासे हो रही है, तो निवेशकों के लिए यह खतरे की घंटी साबित हो सकती है। ऐसे में सावधानी जरूरी है।

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