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घरेलू नीतियों, कर प्रणाली से भी महंगे हो रहे पेट्रोल-डीजल

Mon, 22 Feb 2021 06:33 AM IST
Jeet Kumar अमर उजाला रिसर्च टीम
अमर उजाला रिसर्च टीम Published by: Jeet Kumar Updated Mon, 22 Feb 2021 06:33 AM IST
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Petrol and diesel prices are also increasing due to domestic policies, tax system
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

देश इस समय अपनी जरूरत का 88 फीसदी (2019-20)  हिस्सा आयात से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ते दाम ईंधन का बजट बढ़ने में अहम वजह हो सकते हैं लेकिन यह सबसे बड़ा कारण नहीं है। 


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कच्चे तेल के मूल्य के बाद परिवहन और रिफाइनरी लागत भी पेट्रोल-डीजल के दामों में जोड़ी जाती है, लेकिन इसके बाद भी तैयार उत्पाद की कीमत और हमें मिलने वाले तेल के बीच जमीन आसमान का अंतर हो जाता है।

नतीजे में 31-33 रुपये में पेट्रोल पंप तक पहुंचने वाला तेल हमें 85 से 100 रुपये तक मिल रहा है। अमर उजाला ने तेल और इसकी कीमत से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर नजर डाली तो ऐसी कई वजहें सामने आईं जो एक दूसरे से जुड़ी हैं लेकिन जिनका अंतरराष्ट्रीय बाजार से कोई लेना-देना नहीं।

आगे भी कम होती नहीं दिखती कीमतें क्योंकि.....

  • अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। अगस्त के 40 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर अब 63 डॉलर पार
  • तेल एक्साइज ड्यूटी का प्रमुख स्रोत बना, अगर केंद्र या राज्य सरकार इसे कम करेगी तो कमाई घटेगी
  • केंद्र-राज्य में समन्वय की कमी, दोनों को आशंका कि कोई एक एक्साइज ड्यूटी घटाएगा तो दूसरा बढ़ा कर अपनी कमाई भी बढ़ाएगा

उपभोग की वृद्धि दर घटी
किसी वस्तु की मांग बढ़ने पर उसके दाम बढ़ते हैं। पेट्रोल-डीजल पर भी यह लागू होता है। इसे अच्छा माना जाता है क्योंकि इससे देश में आर्थिक और औद्योगिक गतिविधियां अच्छी चलने का संकेत मिलता है और परिणाम में उत्पादन बढ़ता है। 

लेकिन उपभोग की वृद्धि दर देश में घटी है। 2008 से 2014 के बीच उपभोग 6.7 प्रतिशत की दर से बढ़ा वहीं मोदी सरकार के छह सालों में वृद्धि दर 2.2 फीसदी ही रही।

आयात घटाना था, बढ़ा दिया
साल 2014  तक भारत 83 फीसदी तेल आयात कर रहा था। साल 2019-20 तक तेल आयात 88 फीसदी तक पहुंच गया। क्योंकि घरेलू उत्पादन घटा, भारतीय कंपनियां 2013-14 में 3.78 करोड़ टन कच्चा तेल और अन्य उत्पाद घर में तैयार कर रहीं थीं। 2019-20 मेें 3.22 करोड़ टन रह गया। 

उत्पादन नहीं बढ़ा, क्योंकि तेल की खोज नहीं हो रही

  • वित्त वर्ष 2014: यूपीए-2 के समय ऑयल एंड नेचुरल गैस ने भारत में तेल के स्रोतों की खोज के लिए 11.7 हजार करोड़ रुपये खर्च किए थे।
  • वर्ष 2019: 6,016 करोड़ यानी करीब आधा रह गया खर्च

इस समय देश में 60 करोड़ टन कच्चे तेल के ज्ञात भंडार हैं यह हमारी सालाना 25 करोड़ टन की जरूरत सिर्फ दो साल की पूरी कर सकते हैं।

खोज नहीं हो रही... क्योंकि पैसा कहीं और खर्च
तेल के नए स्रोतों की खोज का खर्च घटा क्योंकि इसका पैसा दूसरे मदों में खर्च हो रहा है।
 

साल 2014 साल 2020
10,800 करोड़ का कैश रिजर्व था ओएनजीसी के पास
 
970 करोड़ कैश रिजर्व रह गया वर्तमान में
 

यही पैसा कंपनियां नए शोध में लगाती हैं। कमी के वजह से एचपीसीएल में हिस्सेदारी खरीदना रही। एचपीसीएल के विनिवेश में केंद्र सरकार राह आसान बनाने के लिए यह खरीद हुई।

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