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Niti Aayog: एमएसएमई में मझोले उद्योग पिछड़े, सिर्फ 0.3% का योगदान; नीति आयोग ने गिनाईं 7 बड़ी चुनौतियां

Tue, 27 May 2025 06:03 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शुभम कुमार Updated Tue, 27 May 2025 06:03 AM IST
सार

नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश की जीडीपी और रोजगार में अहम भूमिका निभाने वाले मझोले उद्योग संरचनात्मक विषमताओं से जूझ रहे हैं। इसके लिए योजनाओं की जानकारी की कमी, फंडिंग और तकनीक जैसी 7 बड़ी चुनौतियों को दूर करना जरूरी।

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Niti Aayog said in the report, MSME sector is facing structural disparities News In Hindi
नीति आयोग

विस्तार

देश की जीडीपी में करीब 29 फीसदी, निर्यात में 40 फीसदी और रोजगार में 60 फीसदी से अधिक योगदान देने वाला सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र संरचनात्मक विषमताओं से जूझ रहा है। पंजीकृत एमएसएमई में सूक्ष्म उद्यमों की सबसे ज्यादा 97 फीसदी और लघु उद्यमों की 2.7 फीसदी हिस्सेदारी है। एमएसएमई के कुल निर्यात में 40 फीसदी का योगदान देने वाले मझोले उद्यमों का हिस्सा महज 0.3 फीसदी है, जो स्पष्ट रूप से संरचनात्मक विषमता का संकेत है।
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नीति आयोग ने सोमवार को ‘मझोले उद्यमों के लिए नीति तैयार करना’ शीर्षक से जारी रिपोर्ट में कहा, देश का विकास इंजन बनने के लिए मझोले उद्यमों को सात चुनौतियां पार करनी होंगी। ये चुनौतियां हैं...सरकारी योजनाओं के बारे में कम जानकारी, प्रोद्योगिकी अपग्रेडेशन की कमी, कुशल श्रमबल का अभाव, अनुपालन, नवाचार में बाधा, फंडिंग और जमीन-बुनियादी ढांचा। रिपोर्ट में इन उद्योगों की महत्वपूर्ण भूमिका का जिक्र करते हुए उनकी पूरी क्षमता उगाजर करने के लिए लक्षित हस्तक्षेप पर जोर दिया गया है।
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उपलब्ध मदद के बाद भी उपयोग में पिछड़ने की सात वजहें
सरकारी योजनाओं की कम जानकारी:
मझोले उद्योगों को एमएसएमई मंत्रालय की 18 योजनाओं में से 4-5 की ही जानकारी है। इसमें भी सिर्फ 10 फीसदी ने ही कुछ योजनाओं का लाभ उठाया है। 10 फीसदी उद्यमों ने ही निवेश मित्र, एनसीडी इंडिया और जेम जैसे पोर्टल का इस्तेमाल किया है।
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कुशल श्रमबल: कौशल विकास योजनाओं का लाभ नहीं उठाना कुशल श्रमबल की कमी का बड़ा कारण है। 88 फीसदी उद्यम कौशल विकास या प्रशिक्षण योजना का लाभ नहीं उठा रहे हैं। 31 फीसदी प्रशिक्षण कार्यक्रमों का अपने लिए प्रासंगिक नहीं मानते हैं। 

फंडिंग: सस्ता कर्ज नहीं मिलना, पूंजी बाजारों पर सीमित पहुंच और गारंटी की कमी मझोले उद्योगों के लिए फंडिंग की राह में बाधक हैं। बैंक मध्यम उद्योगों को कर्ज देने के लिए बड़ी कंपनियों की तुलना में चार फीसदी अधिक ब्याज वसूलते हैं।

प्रोद्योगिकी अपग्रेडेशन का अभाव: 60 फीसदी मझोले उद्यम अब भी पुरानी मशीनरी का इस्तेमाल करते हैं, जिससे उत्पादकता और गुणवत्ता प्रभावित होती है। अधिक लागत नई तकनीक अपनाने की उनकी राह में बड़ी बाधा है। 

नवाचार में बाधा: मझोले उद्यमों की वृद्धि और प्रतिस्पर्धा के लिए नवाचार महत्वपूर्ण है। फिर भी, इसके लिए उन्हें पर्याप्त समर्थन नहीं मिल रहा है। 78 फीसदी उद्यमों को लगता है कि नवाचार को बढ़ावा देने के लिए अतिरिक्त उपायों की जरूरत है। शोध एवं विकास के लिए समर्पित फंड गेम चेंजर साबित हो सकता है।

अनुपालन का बोझ: मझोले उद्योग का मानना है कि उनके लिए अनुपालन जरूरतें एमएसई से अधिक हैं। उन्हें श्रम, स्वास्थ्य, सुरक्षा निरीक्षकों के निरीक्षणों और ऑडिट से गुजरना पड़ता है। 


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जमीन-बुनियादी ढांचा : सस्ती भूमि और बुनियादी ढांचे तक पहुंच उद्योगों के लिए बड़ा मुद्दा है। पिछले दशक में सिर्फ महाराष्ट्र में ही औद्योगिक भूमि की लागत 150 फीसदी बढ़ी है। 
सिफारिश

आयोग ने की मंत्रालय से सिफारिश
आयोग ने एमएसएमई मंत्रालय में एक समर्पित शोध एवं विकास प्रकोष्ठ स्थापित करने सिफारिश की है। यह प्रकोष्ठ राष्ट्रीय महत्व की क्लस्टर आधारित परियोजनाओं के लिए आत्मनिर्भर भारत कोष का लाभ उठाएगा।अनुपालन को सुगम बनाने और उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए परीक्षण एवं प्रमाणन सुविधाओं पर भी ध्यान देने को कहा गया है।

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