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इंडो-पैसिफिक में नया शक्ति संतुलन: जापान और फिलीपींस के बीच रक्षा समझौता, जानें चीन के संकट से कैसे निपटेंगे

Thu, 15 Jan 2026 01:22 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Thu, 15 Jan 2026 01:22 PM IST
सार

Japan-Philippines Defense Pact: जापान और फिलीपींस ने 'एक्विजिशन एंड क्रॉस-सर्विसिंग एग्रीमेंट' (एसीएसए) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह रणनीतिक रक्षा समझौता इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता के बीच दोनों देशों के बीच सैन्य रसद और सुरक्षा सहयोग को एक नया आयाम प्रदान करेगा। आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं।

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Japan-Philippines Defense Pact ACSA Indo-Pacific Security South China Sea Dispute Military Logistics Agreement
दक्षिण चीन सागर (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

जापान और फिलीपींस ने  क्षेत्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक स्थिरता की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। दोनों देशों ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण रक्षा रसद समझौते (Acquisition and Cross-Servicing Agreement - ACSA) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह संधि ऐसे समय में हुई है जब दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में बीजिंग की सैन्य गतिविधियों ने एशियाई देशों और उनके सहयोगियों की चिंता बढ़ा दी है।

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रसद आपूर्ति में कैसे मददगार होगा समझौता?

मनीला में आयोजित एक आधिकारिक समारोह के दौरान जापानी विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोटेगी और फिलीपींस की विदेश सचिव थेरेसा लाजारो ने इस समझौते पर मुहर लगाई। इस नए रक्षा समझौते के तहत, दोनों देशों की सेनाएं संयुक्त प्रशिक्षण के दौरान गोला-बारूद, ईंधन, भोजन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कर-मुक्त आपूर्ति कर सकेंगी। यह समझौता न केवल सैन्य क्षमताओं को बढ़ाएगा, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रति तैयारी और संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में दोनों देशों की भागीदारी को भी सुगम बनाएगा। हालांकि, इस लॉजिस्टिक समझौते को प्रभावी होने से पहले जापानी सांसदों की सहमति जरूरी है।

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चीन से बढ़ते तनाव को कम करने में कैसे मदद मिलेगी?

यह समझौता सीधे तौर पर चीन की क्षेत्रीय विस्तारवादी नीतियों के जवाब के रूप में देखा जा रहा है। जापान और फिलीपींस, दोनों ही बीजिंग के साथ अलग-अलग क्षेत्रीय विवादों में उलझे हुए हैं। जहां फिलीपींस दक्षिण चीन सागर में चीनी तटरक्षक जहाजों की बढ़ती शत्रुता का सामना कर रहा है, वहीं जापान पूर्वी चीन सागर में अपने दावों वाले द्वीपों के आसपास चीनी घुसपैठ से जूझ रहा है।


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हाल के समय में, जापानी प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची की उस टिप्पणी ने बीजिंग को और नाराज कर दिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ताइवान के खिलाफ संभावित चीनी कार्रवाई जापान को हस्तक्षेप करने के लिए प्रेरित कर सकती है। अमेरिका, जो इन दोनों एशियाई देशों का एक प्रमुख संधि सहयोगी है, ने भी चीन को विवादित जलक्षेत्र में आक्रामकता के प्रति बार-बार चेतावनी दी है।

समझौते के लिए जापान ने फिलीपींस को क्या भरोसा दिया?

रक्षा सहयोग के साथ-साथ, जापान ने फिलीपींस के लिए नई सुरक्षा और आर्थिक विकास सहायता की भी घोषणा की है। यह फिलीपींस की विदेश नीति में आए उस बदलाव को दर्शाता है जो राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस जूनियर के कार्यकाल में शुरू हुआ है। उनके पूर्ववर्ती, रोड्रिगो दुतेर्ते ने चीन और रूस के साथ नजदीकी संबंध विकसित किए थे, लेकिन मार्कोस प्रशासन ने नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और 'स्वतंत्र एवं खुले इंडो-पैसिफिक' की दिशा में जापान और अमेरिका के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी है।

भविष्य के लिहाज से समझौता कितना अहम?

जापान और फिलीपींस के बीच यह नया समझौता उनके बढ़ते सुरक्षा गठजोड़ की एक कड़ी में शामिल हो गया है।

  • पारस्परिक पहुंच समझौता (आरएए): 2024 के मध्य में दोनों देशों ने आरएए पर हस्ताक्षर किए थे, जो सितंबर में लागू हुआ। यह एक-दूसरे के क्षेत्र में सैनिकों की तैनाती और बड़े पैमाने पर लाइव-फायर अभ्यास की अनुमति देता है।
  • गोपनीय सूचना साझाकरण: वर्तमान में, दोनों देश एक और समझौते पर बातचीत कर रहे हैं जिसका उद्देश्य सैन्य और रक्षा संबंधी गोपनीय सूचनाओं की सुरक्षा को बढ़ाना है।

जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि दोनों देश पूर्वी और दक्षिण चीन सागर में बल प्रयोग के माध्यम से यथास्थिति को बदलने के किसी भी एकतरफा प्रयास का विरोध करते हैं।

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अब आगे क्या?

जापान और फिलीपींस के बीच एसीएसए पर हस्ताक्षर होना इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रक्षा कूटनीति के एक नए अध्याय की शुरुआत है। यह न केवल दोनों देशों की सैन्य तत्परता को मजबूत करता है, बल्कि चीन के क्षेत्रीय प्रभुत्व को संतुलित करने के लिए एक बहुपक्षीय सुरक्षा ढांचे की नींव भी रखता है। आने वाले समय में, गोपनीय सूचनाओं के साझाकरण पर होने वाली वार्ता इस रणनीतिक साझेदारी को और अधिक गहराई प्रदान करेगी।

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