Crude Oil: रूस से तेल आयात घटा रहा इंडियन ऑयल, ब्राजील-अंगोला से खरीद बढ़ी; अमेरिका से व्यापार समझौते में मदद
इंडियन ऑयल ने रूसी कच्चे तेल की खरीद घटाकर ब्राजील, अंगोला और मध्य पूर्व से आयात बढ़ाया है। यह कदम भारत-अमेरिका व्यापार समझौते और टैरिफ राहत में अहम साबित हो सकता है।
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देश की सबसे बड़ी रिफाइनरी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) ने मार्च में रूसी तेल में कटौती की भरपाई के लिए ब्राजील की पेट्रोब्रास समेत कई अन्य देशों से 70 लाख बैरल तेल खरीदा है। घरेलू रिफाइनरियां अपने शीर्ष आपूर्तिकर्ता रूस से दूरी बनाने और मध्य पूर्व से आयात बढ़ाने के लिए रणनीतियों में बदलाव कर रही हैं। यह कदम भारत को अमेरिका के साथ टैरिफ कम करने के लिए व्यापार समझौता करने में मदद कर सकता है।
सूत्रों के अनुसार, आईओसी ने शेल से अबू धाबी के मुरबान ग्रेड का 10 लाख बैरल और व्यापारी मर्कुरिया से अपर जाकुम ग्रेड का 20 लाख बैरल खरीदा है। एक्सॉन से अंगोला के हंगो और क्लोव ग्रेड का 10 लाख बैरल भी खरीदा है। आईओसी ने वैकल्पिक अनुबंध के तहत पेट्रोब्रास से ब्राजील के बुजियोस तेल के 20 लाख बैरल भी खरीदे हैं, जो पारस्परिक रूप से सहमत शर्तों पर सौदा करने की सुविधा प्रदान करता है।
रूस से दूरी, रणनीति में बदलाव
गोपनीयता समझौतों के कारण तेल खरीदी के कुल मूल्य का आंकड़ा कंपनियों ने नहीं दिया है। आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर में भारत का रूसी तेल आयात दो वर्षों में सबसे निचले स्तर पर आ गया। दूसरी ओर, ओपेक देशों से आयात का हिस्सा 11 महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गया। 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत रियायती रूसी समुद्री कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा, आईओसी ने पिछले माह कोलंबिया की सरकारी तेल कंपनी इकोपेट्रोल से वैकल्पिक आपूर्ति समझौते के तहत पहला कोलंबियाई तेल खरीदा। इक्वाडोर के ओरिएंट क्रूड की भी पहली बार खरीदी की थी।
अमेरिका से व्यापार समझौते को मिल सकती है मजबूती
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से तेल आयात में कटौती और अन्य देशों से खरीद बढ़ाने का यह कदम भारत को अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते में मदद कर सकता है। खासतौर पर टैरिफ में राहत और ऊर्जा व्यापार को लेकर भारत की स्थिति मजबूत हो सकती है। हालांकि गोपनीयता समझौतों के चलते इन सौदों की कुल कीमत सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन यह साफ है कि भारतीय रिफाइनरियां अब केवल सस्ती आपूर्ति नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक संतुलन और दीर्घकालिक रणनीति को ध्यान में रखकर फैसले ले रही हैं।
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