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बदलेगा महंगाई मापने का तरीका: थोक मूल्य सूचकांक की जगह आएगा उत्पादक मूल्य सूचकांक, जानिए WPI व PPI में फर्क

Tue, 21 Jul 2026 02:14 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Tue, 21 Jul 2026 02:14 PM IST
सार

भारतीय अर्थव्यवस्था में महंगाई को मापने का पैमाना पूरी तरह बदलने जा रहा है। सरकार पांच वर्षों में WPI को हटाकर उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) लागू करेगी। जानिए इस ऐतिहासिक बदलाव के बारे में और अपने व्यावसायिक समझौतों को अभी से अपडेट करने के लिए पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

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India Shifts to Producer Price Index: What the Retirement of WPI Means for Your Business Contracts
महंगाई का गणित - फोटो : amarujala.com

विस्तार

भारतीय अर्थव्यवस्था में महंगाई के आकलन को अधिक पारदर्शी और वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने के लिए सरकार ने एक बड़ा नीतिगत कदम उठाया है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा 15 जून को देश का पहला उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) डेटा जारी करने के साथ ही थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। सरकार ने इस बड़े बदलाव के लिए पांच साल का ट्रांजिशन पीरियड तय किया है। दो दशकों से अधिक की तैयारी के बाद उठाए गए इस कदम से देश के नीतिगत फैसलों, औद्योगिक आंकड़ों और कॉर्पोरेट जगत के कमर्शियल अनुबंधों पर गहरा असर पड़ेगा। 

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थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) और उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) में क्या अंतर है?

WPI थोक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में बदलाव को मापता है, जबकि PPI फैक्ट्री गेट पर उत्पादकों द्वारा प्राप्त कीमतों को दर्शाता है, जिसमें थोक मार्जिन और टैक्स शामिल नहीं होते। इसे बिस्किट के उदाहरण से समझते हैं।  फैक्ट्री से निकलते समय उत्पादक को मिलने वाली कीमत पीपीआई है, थोक बाजार में प्रवेश करने पर इसकी कीमत डब्ल्यूपीआई है और खुदरा दुकान पर उपभोक्ता जो भुगतान करता है वह उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) है।

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सरकार आखिर क्यों करने जा रही है डब्ल्यूपीआई को पीपीआई से रिप्लेस?

भारत में लंबे समय से महंगाई मापने के लिए WPI और CPI का उपयोग हो रहा था, लेकिन इसमें फैक्ट्री गेट पर उत्पादक को मिलने वाली वास्तविक कीमतों के बारे में इससे जानकारी नहीं मिलती थी। इसके अलावा, WPI के ढांचे से सेवा क्षेत्र बाहर है, जो अर्थव्यवस्था में 50% से अधिक का योगदान देता है। PPI इस कमी को दूर करेगा और भारत को अमेरिका, चीन और जापान जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समकक्ष लाएगा, जो IMF की सिफारिशों के अनुकूल है।

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नए उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) के कौन-कौन से मुख्य हिस्से होंगे?

मंत्रालय के अनुसार, नई व्यवस्था में PPI के तीन मुख्य घटक शामिल हैं:

  • आउटपुट पीपीआई (OPPI): उत्पादकों को उनके अंतिम उत्पाद के लिए मिलने वाली कीमतें।
  • इनपुट पीपीआई (IPPI): उत्पादकों द्वारा कच्चे माल के लिए चुकाई जाने वाली कीमतें (फिलहाल यह ट्रायल के तौर पर केवल मैन्युफैक्चरिंग के लिए है)।
  • सर्विस पीपीआई (SPPI): यह बैंकिंग, सिक्योरिटीज, इंश्योरेंस, पेंशन फंड, रेलवे, हवाई यात्री परिवहन और टेलीकॉम जैसी सात सेवाओं की कीमतें मापेगा।

साथ ही, WPI का आधार वर्ष भी 2011-12 से बदलकर 2022-23 किया गया है और इसकी बास्केट को 697 से बढ़ाकर 957 आइटमकर दिया गया है।

इस बदलाव का भारतीय व्यापारिक अनुबंधों पर क्या असर पड़ेगा?

उद्योगों में प्राइसिंग, कॉस्ट एस्केलेशन और व्यापारिक अनुबंधों के लिए WPI को ही मुख्य बेंचमार्क माना जाता है। इसलिए पांच साल की संक्रमण अवधि दी गई है ताकि व्यवसाय समझौतों को री-कैलिब्रेट कर सकें। ईवाई (ईवाई) इंडिया के मुख्य नीति सलाहकार डी.के. श्रीवास्तव का कहना है कि कंपनियों को डब्ल्यूपीआई के हटने का इंतजार किए बिना अभी से अनुबंधों के ढांचे का पुनर्मूल्यांकन और एस्केलेशन क्लॉज को री-कैलिब्रेट करना शुरू कर देना चाहिए।

आर्थिक आंकड़ों और जीडीपी गणना पर इसका क्या प्रभाव होगा?

PPI केवल महंगाई की ट्रैकिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) को डेटा फीड करना शुरू कर चुका है। क्रिसिल की मुख्य अर्थशास्त्री दीप्ति देशपांडे के अनुसार, वर्तमान में वास्तविक जीडीपी के लिए WPI और CPI का उपयोग होता है, लेकिन आने वाले समय में **फैक्ट्री-स्तर की कीमतों को दर्शाने वाला PPI इस भूमिका को संभाल लेगा।

आगे क्या चुनौतियां और राह होगी?

यह बदलाव देश के आर्थिक आंकड़ों में बड़ा सुधार लाएगा। हालांकि, संक्रमण के दौर में व्यवसायों को डब्ल्यूपीआई और पीपीआई के बीच ट्रेंड के अंतर और अनुबंधों की री-नेगोशिएशन में कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन अंततः यह भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक पारदर्शी और वैश्विक मानकों के अनुरूप मजबूत बनाएगा।

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