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Russian Oil: 'ट्रंप का दावा और भारत का इनकार', आखिर रूस से कितना तेल खरीद रहे हम? जानिए आंकड़े क्या कह रहे

Fri, 17 Oct 2025 06:10 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Fri, 17 Oct 2025 06:10 PM IST
सार

Russian Oil: रूस से तेल आयात जून के 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन से घटकर सितंबर में 1.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया था। लेकिन अब इसमें इजाफा होने लगा है। इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि भारत रूस से तेल की खरीदारी घटा रहा है। हालांकि भारतीय अधिकारियों ने ट्रंप के दावों की आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं की है। शिपमेंट के आंकड़े क्या कह रहे हैं, आइए समझते हैं।

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India's Russian oil import rebound in Oct after dip in previous quarter
कच्चा तेल आयात के बिल में आई कमी - फोटो : पीटीआई

विस्तार

अक्तूबर की पहली छमाही में रूस से भारत के कच्चे तेल का आयात बढ़ा है। इससे पहले जुलाई से सितंबर के बीच इसमें कमी दिखी थी। त्योहारी मांग को पूरा करने के लिए रिफाइनरियां अब पूरी तरह से काम पर लौट आई हैं, और आयात तेजी दिख रही है। रूस से तेल आयात जून के 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन से घटकर सितम्बर में 1.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया था। जहाज ट्रैकिंग के आंकड़ों से इसकी पुष्टि होती है। अक्तूबर की शुरुआत में टैंकर-ट्रैकिंग डेटा में सुधार के संकेत मिलते हैं। भारत को यूराल और अन्य रूसी ग्रेड के शिपमेंट में तेजी आई है। इसे पश्चिमी बाजारों में कमजोर मांग और शिपिंग लचीलेपन के बीच नए सिरे से छूट से समर्थन मिला है।

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ट्रंप का दावा- भारत के पीएम रूस से तेल आयात रोकने पर सहमत

वैश्विक व्यापार विश्लेषण फर्म केप्लर के प्रारंभिक आंकड़ों से पता चला है कि अक्तूबर में आयात लगभग 1.8 मिलियन बैरल प्रति दिन (बीपीडी) रहा। पिछले महीने की तुलना में इसमें लगभग 250,000 बीपीडी का इजाफा हुआ। (हालांकि चालू माह के आंकड़ों में संशोधन किया जा सकता है)। ये आंकड़े अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 15 अक्तूबर के उस बयान से पहले के हैं जिसमें उन्होंने दावा किया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस से कच्चे तेल के आयात को रोकने पर सहमत हो गए हैं। हालांकि, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि उन्हें फोन पर हुई ऐसी किसी  बातचीत की जानकारी नहीं है।

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जानकार बोले- ट्रंप का बयान दबाव बनाने की रणनीति

केप्लर में प्रमुख शोध विश्लेषक (रिफाइनिंग व मॉडलिंग) सुमित रिटोलिया का मानना है कि ट्रम्प का बयान संभवतः किसी आसन्न नीतिगत परिवर्तन का प्रतिबिंब न होकर व्यापार वार्ता से जुड़ी दबाव की रणनीति है। उन्होंने कहा, "आर्थिक, संविदात्मक और रणनीतिक कारणों से रूसी बैरल भारत की ऊर्जा प्रणाली में गहराई से अंतर्निहित हैं।" भारतीय रिफाइनरियों ने भी कहा कि सरकार ने अभी तक उनसे रूसी तेल आयात बंद करने को नहीं कहा है।

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फरवरी 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण के बाद पश्चिमी देशों की ओर से मास्को पर प्रतिबंध लगाने और उसकी आपूर्ति बंद करने के बाद भारत ने छूट पर बेचे जाने वाला रूसी तेल खरीदना शुरू किया है। रूस से तेल के आयात की हिस्सेदारी 2019-20 (वित्त वर्ष 20) में  मात्र 1.7 प्रतिशत थी यह 2023-24 में बढ़कर 40 प्रतिशत हो गई और रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया।

अक्तूबर के पहले पखवारे में भी रूस से सबसे अधिक तेल की खरीदारी

अक्तूबर के पहले पखवाड़े में भी रूस का यही दर्जा बरकरार रहा। इराक लगभग 1.01 मिलियन बैरल प्रतिदिन के साथ भारत का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता है।  उसके बाद सऊदी अरब 8,30,000 बैरल प्रतिदिन के साथ दूसरे स्थान पर है। अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात को पीछे छोड़कर, 647,000 बैरल प्रतिदिन के साथ भारत का चौथा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया है। केप्लर के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात ने 394,000 बैरल प्रतिदिन की आपूर्ति की।

रिटोलिया ने कहा कि रूसी कच्चा तेल भारत के लिए संरचनात्मक रूप से महत्वपूर्ण बना हुआ है। रूसी कच्चा तेल भारत के कुल आयात का लगभग 34 प्रतिशत है। इस पर काफी आकर्षक छूट मिलती है। यह रिफाइनरों के लिए इतनी अधिक है कि जिसे वे नजरअंदाज नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, "जुलाई-सितंबर के दौरान आयात में गिरावट के बारे में काफी चर्चा हुई है। यह गिरावट टैरिफ संबंधी चिंताओं से कम और मौसमी कारकों, विशेष रूप से एमआरपीएल, सीपीसीएल और बीओआरएल जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनरियों में रखरखाव से जुड़ी गतिविधियों में वृद्धि के कारण हुई है।"

रूसी बैरल भारतीय रिफाइनरों के लिए उपलब्ध सबसे किफायती फीडस्टॉक

सितम्बर की शुरुआत तक की डिलीवरी के लिए अधिकांश अनुबंधों को 6-10 सप्ताह पहले ही अंतिम रूप दे दिया गया था। इसका अर्थ है कि सौदे 31 जुलाई से पहले ही मेच्योर्ड हो हो गए थे। इसलिए जुलाई-सितम्बर में गिरावट का मुख्य कारण रखरखाव कार्यक्रमों के कारण रिफाइनरियों की ओर से कम कच्चे तेल का प्रसंस्करण करना था। 2023 की तुलना में कम छूट के बावजूद, रूसी बैरल भारतीय रिफाइनरों के लिए उपलब्ध सबसे किफायती फीडस्टॉक विकल्पों में से एक बने हुए हैं। उन्होंने कहा, "हकीकत यह है कि रूसी आयात में कटौती करना मुश्किल, महंगा और जोखिम भरा होगा।"

प्रतिस्थापन के लिए कई आपूर्तिकर्ताओं से तेज़ी से स्केलिंग की आवश्यकता होगी, और लागत भी ज्यादा होगी (माल ढुलाई, कम छूट)। अगर मार्जिन कम हो जाता है या खुदरा कीमतें बढ़ जाती हैं, तो इसका नतीजा मुद्रास्फीति, राजनीतिक प्रतिक्रिया और रिफ़ाइनरी की कमजोर लाभप्रदता हो सकती है।

उनका मानना है कि रिफाइनर सरकार के निर्देश के बिना एक डॉलर भी नहीं छोड़ेंगे- जैसा कि ईरानी बैरल के मामले में हुआ था। हालांकि विविधीकरण के लिए जोर दार प्रयास किए गए हैं, रूसी कच्चे तेल के अनुबंध आमतौर पर आगमन से 6-10 हफ्ते पहले हस्ताक्षरित किए जाते हैं। इन सबमें समय लगता है। व्यवहार में, भारतीय रिफाइनर धीरे-धीरे अपने बास्केट का विस्तार कर रहे हैं, अल्पावधि में रूस की जगह लेने के लिए नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, निरंतरता और लचीलेपन को बढ़ाने के लिए।

भारत को अपने आर्थिक हितों और कूटनीतिक संबंधों दोनों को साधना होगा

भारत ने आर्थिक हितों और कूटनीतिक संबंधों के बीच संतुलन बनाते हुए लगातार एक स्वतंत्र विदेश और ऊर्जा नीति अपनाई है। रूसी कच्चे तेल से अचानक दूरी बनाना उसकी ऊर्जा सुरक्षा रणनीति को कमजोर कर देगा और ऐसा तब तक संभव नहीं है जब तक ईरान या वेनेज़ुएला जैसे औपचारिक प्रतिबंध नहीं लगाए जाते।

उन्होंने आगे कहा, "इस समय, यह असंभव है कि भारत केवल अमेरिका और यूरोपीय संघ के राजनीतिक दबाव को संतुष्ट करने के लिए संरचनात्मक कटौती लागू करे। यदि वाशिंगटन दबाव बढ़ाता है, तो भारतीय रिफाइनरियां विविधीकरण का प्रदर्शन करने और पश्चिमी भागीदारों को खुश करने के लिए लगभग 1,00,000-2,00,000 बैरल प्रतिदिन की सांकेतिक कटौती कर सकती हैं। हालांकि, ये कटौती परिवर्तनकारी होने के बजाय प्रतीकात्मक ही होंगी।"



ट्रंप को खुश करने के लिए अमेरिका से ज्यादा मात्रा में आयात करना एक विकल्प है, लेकिन इसकी अधिकतम सीमा लगभग 400,000-500,000 बैरल प्रतिदिन है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अमेरिकी ग्रेड को भारतीय रिफाइनिंग प्रणालियों के साथ रसद संबंधी कमियों, आर्थिक और अनुकूलता संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। केप्लर के आंकड़ों से पता चलता है कि 2025 में अब तक अमेरिकी कच्चे तेल का भारतीय आयात औसतन 310,000 बीपीडी रहा है, जो 2024 में 199,000 बीपीडी से बढ़कर लगभग 500,000 बीपीडी (अक्टूबर में अपेक्षित) के वार्षिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है।

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