भारत-न्यूजीलैंड ट्रेड डील: कृषि और प्रोसेस्ड फूड का बढ़ेगा निर्यात, 20 अक्तूबर से कौन सा बड़ा फायदा मिलेगा?
भारत-न्यूजीलैंड एफटीए 20 अक्तूबर से लागू होगा। प्रोसेस्ड फूड, मसाले, बेकरी, पैकेज्ड अनाज और अन्य उत्पादों पर जीरो ड्यूटी से भारतीय एक्सपोर्टर्स को फायदा मिलेगा। पूरी खबर पढ़ें।
विस्तार
भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुआ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) भारतीय किसानों, फूड प्रोसेसिंग कंपनियों और एमएसएमई एक्सपोर्टर्स के लिए नए बाजार का रास्ता खोल सकता है। यह समझौता 20 अक्तूबर से लागू होगा और इसके साथ कई भारतीय कृषि और प्रोसेस्ड फूड उत्पादों को न्यूजीलैंड में पहले दिन से ही शून्य शुल्क का लाभ मिलेगा। इससे भारतीय उत्पादों की कीमत प्रतिस्पर्धा बेहतर होने और न्यूजीलैंड के बाजार में उनकी पहुंच बढ़ने की संभावना है।
20 अक्तूबर से क्या बदलेगा?
ट्रेड प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (टीपीसीआई) के अनुसार, समझौते के लागू होते ही प्रोसेस्ड फूड और कई अन्य उत्पादों पर लगने वाला शुल्क खत्म हो जाएगा। फिलहाल इन उत्पादों पर 5 फीसदी तक टैरिफ लगता है, जिसे पहले दिन से घटाकर शून्य कर दिया जाएगा।
इसका सीधा मतलब है कि भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड में अपने उत्पाद बेचते समय इन उत्पादों पर आयात शुल्क का भुगतान नहीं करना होगा।
किन भारतीय उत्पादों को मिलेगा फायदा?
टीपीसीआई के मुताबिक, कई कृषि और खाद्य प्रसंस्करण उत्पादों को इस बदलाव का लाभ मिलेगा। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
- प्रोसेस्ड फूड
- मसाले और सीजनिंग
- कन्फेक्शनरी उत्पाद
- बेकरी उत्पाद
- पैकेज्ड अनाज
- सॉस
- फलों के जूस
- प्रोसेस्ड सब्जियां
इन उत्पादों पर शुल्क में कमी भारतीय कंपनियों को न्यूजीलैंड के बाजार में प्रतिस्पर्धा करने में मदद कर सकती है।
भारतीय एक्सपोर्टर्स को कितना बड़ा फायदा मिल सकता है?
टीपीसीआई के चेयरमैन मोहित सिंगला ने कहा कि सभी उत्पाद लाइनों में तत्काल 100 फीसदी जीरो-ड्यूटी एक्सेस मिलने से भारतीय निर्यातकों को ओशिनिया क्षेत्र में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी। उनके मुताबिक, इसका फायदा खास तौर पर फूड प्रोसेसिंग, टेक्सटाइल और लाइट इंजीनियरिंग क्षेत्रों को मिल सकता है।
यह व्यवस्था केवल बड़े निर्यातकों के लिए ही नहीं, बल्कि छोटे कारोबार और एमएसएमई कंपनियों के लिए भी न्यूजीलैंड के बाजार में विस्तार का अवसर पैदा करती है।
एमएसएमई और फूड प्रोसेसिंग कंपनियों के लिए क्या अवसर हैं?
टीपीसीआई ने कहा है कि वह एमएसएमई और एग्री-फूड कारोबार से जुड़ी कंपनियों को इस समझौते का फायदा उठाने में मदद करेगा। इसके लिए कंपनियों को न्यूजीलैंड के तकनीकी मानकों को पूरा करने और वहां के खरीदारों के साथ लंबे समय के कारोबारी संबंध बनाने पर ध्यान देना होगा।
यानी सिर्फ टैरिफ हटना पर्याप्त नहीं होगा। भारतीय कंपनियों को उत्पाद की गुणवत्ता, पैकेजिंग और संबंधित तकनीकी मानकों पर भी काम करना होगा।
टीपीसीआई एक्सपोर्टर्स की कैसे मदद करेगा?
व्यापार को बढ़ावा देने के लिए टीपीसीआई विशेष एक्सपोर्टर अवेयरनेस सेशन आयोजित करेगा। इसके अलावा एग्री-फूड प्रोसेसिंग और एमएसएमई मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर्स पर केंद्रित बायर-सेलर मीट भी आयोजित किए जाएंगे।
इन कार्यक्रमों का उद्देश्य भारतीय कारोबारियों को न्यूजीलैंड के खरीदारों से जोड़ना और नए निर्यात अवसरों की जानकारी देना है।
भारत के कृषि उत्पादों के लिए आगे क्या संभावनाएं हैं?
टीपीसीआई के अनुसार, न्यूजीलैंड में ड्यूटी-फ्री बाजार तक पहुंच मिलने से भारतीय वैल्यू-एडेड कृषि उत्पादों के लिए इंडो-पैसिफिक सप्लाई चेन में जुड़ने की गुंजाइश बढ़ेगी।
इस समझौते का असर खास तौर पर उन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जो कच्चे कृषि उत्पादों के बजाय प्रोसेस्ड और वैल्यू-एडेड फूड प्रोडक्ट्स का निर्यात करती हैं। समझौते के लागू होने के बाद भारतीय निर्यातकों के लिए न्यूजीलैंड बाजार में कारोबार बढ़ाने का नया अवसर उपलब्ध होगा। अब भारतीय कंपनियों के लिए चुनौती इस टैरिफ लाभ को वास्तविक निर्यात कारोबार में बदलने, न्यूजीलैंड के मानकों को पूरा करने और स्थानीय खरीदारों के साथ मजबूत कारोबारी संबंध बनाने की होगी।