{"_id":"5a23b4cb4f1c1bc8678bf649","slug":"in-this-world-of-advertisement-shop-is-ahead-of-fear","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"विज्ञापनों के इस दौर में, डर के आगे दुकान है","category":{"title":"Business Diary","title_hn":"बिज़नेस डायरी ","slug":"business-diary"}}
विज्ञापनों के इस दौर में, डर के आगे दुकान है
टीम अमर उजाला/दक्षा वैदकर
Updated Sun, 03 Dec 2017 01:54 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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दिसंबर 1993 में एक फिल्म आई थी, ‘धनवान’। उस फिल्म में करिश्मा कपूर हर चीज से डरती थीं और छोटी-छोटी बात को बढ़ा-चढ़ाकर गंभीर बीमारी तक पहुंचा देती थीं। फिल्म में जब मनीषा कोइराला उन्हें गाय का कच्चा और ताजा दूध पीने देती हैं, तो वह मना करते हुए कहती हैं, ‘इसमें बैक्टीरिया होता है। कच्चा दूध पीने से वह जिस्म में फैल जाता है, फिर आंतों पर असर करता है और आदमी मर जाता है।’
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वहीं, जब करिश्मा बारिश में अपने दादाजी यानी कादर खान को भीगते हुए देखती हैं, तो कहती हैं, ‘बारिश बहुत खतरनाक होती है। भीगने से जुकाम हो जाता है। खांसी हो जाती है। खांसी से फेफड़ा सूज जाता है। सूजन से सांस बंद हो जाती है और फिर आदमी मर जाता है।’ तब कादर खान चिढ़ते हुए कहते हैं कि तू मेरी पोती है कि यमराज की पोती है। हर वक्त मरने-मारने की बात करती है।
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इन 'ADD' को देख आप भी समझ नही पाएंगे बनाने वाले के दिमाग को, कहेंगे विज्ञापन है या फिर...
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करिश्मा कपूर के उसी अंदाज को आज कई कंपनियां अपना प्रोडक्ट बेचने के लिए अपना रही हैं। विज्ञापन के जरिए लोगों के मन में एक तरह का डर पैदा किया जाता है। उन्हें बताने की कोशिश की जाती है कि उक्त प्रोडक्ट आपके लिए क्यों जरूरी है? अब कंपनियां भी अच्छी तरह से जान गई हैं कि वर्तमान समय का आम आदमी हर चीज से डरता है। उसे सबसे ज्यादा चिंता अपने परिवार की है। वह उन्हें हर बुरी चीज से बचाना चाहता है। वह कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहता है। वह हर उस चीज को खरीदने को तैयार है, जिससे उसके परिवार की रक्षा हो सके।
जब टीवी पर अलग-अलग के विज्ञापनों के जरिए, वह देखता है कि फलां प्रोडक्ट खरीदने से जान बच सकती है, तो वह बिना देर किए तुरंत उसे खरीद लेता है। वह यह नहीं देखता है कि यह प्रोडक्ट क्या सचमुच उसके लिए इतना जरूरी है? सेहत और सुरक्षा को लेकर डरना ठीक है, लेकिन जिंदगी में यह जानना भी जरूरी है कि हमें उन चीजों की कितनी जरूरत है?
नल का पानी मत पियो, वाटर प्यूरीफायर लगाओ, वरना बीमार पड़ जाओगे। दूषित हवाएं बीमार न कर दें, उससे पहले घर में एयर प्यूरीफायर लगाओ। कार में फलां टायर ही लगाओ, क्योंकि वही आपको अचानक होने वाले एक्सीडेंट से बचा सकते हैं। बीमारी वाले मच्छर रात ही नहीं, सुबह भी आते हैं, इसलिए दिन में भी जलने चाहिए मच्छर भगाने वाली मशीन। फलां तेल ही खाएं, वरना पति को कभी भी हार्ट अटैक हो सकता है। आपके बाद आपके परिवार का क्या होगा? ये इंश्योरेंस पॉलिसी ही आपके परिवार की रक्षा करेगी... ये हैं कुछ विज्ञापनों की भाषा, जो डर दिखाकर आपको प्रोडक्ट खरीदने के लिए उकसाते हैं।
छोटे-छोटे डर से भी होता है फायदा:आप बिना सनस्क्रीन लगाए बाहर न निकलें, तो काले हो जाएंगे। इस जूते को पहनकर दौड़ें, वरना पैरों को नुकसान होगा। इस साबुन से ही नहाएं, वरना स्किन की नमी चली जाएगी। इस लिक्विड सोप से ही हाथ धोएं, वरना कीटाणु हाथों के जरिए आपके पेट में चले जाएंगे। ये सब भी एक तरह का डर बेच रहे हैं। हालांकि, ये डर बहुत बड़े नहीं हैं, फिर भी लोगों में चिंता तो बढ़ाते ही हैं। कंपनियों ने इस तरह के विज्ञापन बनाकर आपकी पूरी जिंदगी को एक तरह से अपने कंट्रोल में ले लिया है। हालांकि, ये भी सच है कि लोग फायदा देखकर इतनी जल्दी प्रोडक्ट नहीं खरीदते, जितना नुकसान हो जाएगा, इस डर से खरीदते हैं। यही वजह है कि लोगों को अगर किसी चीज को खरीदने के लिए तैयार करना है, तो कंपनियां वह वजह तलाशती हैं, जिसके जरिए लोगों को डर दिखाया जा सके। इसके लिए बाकायदा उनकी एक रिसर्च टीम भी काम करती है।
ऐसा नहीं है कि सभी कंपनियां अपने फायदे के लिए ही लोगों को डराती हैं और प्रोडक्ट बेचती हैं। कई बार यह जरूरी भी हो जाता है। उदाहरण के लिए, इंश्योरेंस वाले विज्ञापन को ही ले लें। अगर मरने का डर न दिखाया जाए, तो लोग इंश्योरेंस ही नहीं करवाते, जो कि आज के समय में सबके लिए जरूरी हो गया है। सरकार भी ऐसे विज्ञापन बनवाती है, जिसमें लोगों को ट्रैफिक नियमों का पालन करने, हेलमेट पहनने, गुटखा-तंबाकू व सिगरेट का इस्तेमाल न करने, शौचालय का इस्तेमाल करने की सीख दी जाती है। इन सभी विज्ञापनों में एक्सीडेंट, मौत, कैंसर या अन्य बीमारी का डर दिखाया जाता है, जो बिल्कुल सही है। इसके बिना लोग जागरूक ही नहीं होते। डर का सहारा लेकर अगर लोगों में जागरूकता बढ़ती है, तो ऐसा किया जाना चाहिए।
तार्किक और भावनात्मक, दो ही तरीके हैं
प्रतीकात्मक तस्वीर
ब्रांडिंग के क्षेत्र में कई साल काम कर चुके पंकज क्षीरसागर इस बारे में बताते हैं, ‘विज्ञापन में कई तरह की अपील होती हैं जैसे, प्यार, आकर्षण, डर, गौरव, लालच, लाभ। कोई क्रीम गोरा बनाने का दावा करती है, तो वह कंज्यूमर बेनिफिट की यूएसपी अपना रही है। कोई परफ्यूम के एेड में बता रहा है कि इससे लड़कियों का ध्यान अपनी ओर खींचा जा सकता है, तो यह एेड लड़कों की माचो फील वाली यूएसपी अपना रहा है। आप इस तरह समझें- यूएसपी यानी कंज्यूमर बेनिफिट प्लस रीजन व्हाय। यहां, यूएसपी का मतलब होता है यूनिक सेलिंग प्रोपोजिशन। उदाहरण के लिए, फेयर एंड लवली लें। इसकी यूएसपी क्या है? सात हफ्तों में गोरा करना। इसमें कंज्यूमर बेनिफिट क्या है? इससे स्किन फेयर होती है। कलर टोन लाइट होता है। दाग-धब्बे गायब होते हैं। इसके रीजन व्हाय में फेयर एंड लवली में क्या-क्या चीजें है, वह आ जाएंगी। इस तरह हर ऐड का प्रिसिंपल यूएसपी पर ही काम करता है। अब जूते का उदाहरण लें। जूते का काम एक ही है, लेकिन किसी कंपनी का जूता माचो हो जाता है, तो किसी अन्य कंपनी का जूता ऑफिशियल फेयर में आ जाता है। रिचनेस आ जाती है। इस तरह एेड एजेंसीज लोगों के इसी इमोशंस पर काम करती हैं।
ये सब एडवरटाइजिंग की अपील्स होती हैं। सभी विज्ञापन इन्हीं अपील्स पर काम करते हैं। डर भी एक अपील है। डर दिखाकर इंश्योरेंस पॉलिसी बेचना सालों से चल रहा है। हॉस्पिटल का खर्च होगा, तो मेडिकल इंश्योंरेस लें। मरने के डर से जीते जी इंश्योरेस का प्रीमियम भरते रहो। अब देखें, पहले के जमाने में कछुआ छाप अगरबत्ती होती थी। फिर जेट की टिकिया आ गई, जो रोज मशीन में लगती थी। फिर लिक्विड रिफिल पैक आ गया, जो 30 दिन चलता है। तीनों मॉस्किटो रिपेलेंट हैं। आप चाहते, तो मच्छरदानी में भी सो सकते थे, लेकिन एेड वालों ने इन चीजों को इस तरह बेचा कि यह आपकी जरूरत बन गया। वह इनके एेड में छोटे बच्चों को दिखाते हैं, जिनकी नींद मच्छर काटने से टूट जाती है और मां परेशान हो जाती है। यह लोगों को भावुक कर जोड़ने का तरीका है।
अब आप देखें कि सेनेटरी नैपकिन का उपयोग कई सालों से हो रहा है। काफी समय से इसे लेकर एेड बन रहे हैं। नैपकिन में हर बार कुछ अपडेट होकर नया प्रकार आ जाता है और फिर एेड को थोड़ा बदलकर दोबारा पेश किया जाता है। इनके सभी एेड में एक बात कॉमन होती है। वे एक आत्मविश्वास से भरी लड़की दिखाएंगे, जो जॉब करती है, स्पोर्ट में भाग लेती है, पिकनिक और पार्टी करती है। दरअसल, कुछ चीजें हमेशा कॉमन होती हैं, बस पेश करने का तरीका अलग होता है। यहां हमें समझना होगा कि विज्ञापन सीधे तौर पर दो तरह के होते हैं, एक तार्किक और दूसरा भावनात्मक। हर एडवरटाइजर इन्हीं के भीतर आने वाली अपील पर काम करता है। उन्हीं के अनुसार एेड को डिजाइन करता है। इसी के अंतर्गत यह तय होता है कि कुछ चीजों को डर के कॉन्सेप्ट से बेचना जरूरी होता है।’
विज्ञापन दिखाने का वक्त: विज्ञापन बनाने के पहले इस बात पर गौर किया जाता है कि यह प्रोडक्ट किस सेगमेंट के लिए है? उन्हें क्या-क्या पसंद है और उन तक किस तरह पहुंचा जाए? इस तरह परिवार से जुड़े या डराने वाले विज्ञापनों को ऐसे समय में ज्यादा दिखाया जाता है, जिस टाइम महिलाएं टीवी के सामने होती हैं। ये विज्ञापन पारिवारिक, सास-बहू के सीरियल, लव स्टोरीज या बच्चों के इर्द-गिर्द घूमने वाले सीरियल्स और फिल्मों के वक्त ज्यादा दिखाए जाते हैं, ताकि महिलाओं की नजर इन पर पड़े।
इमामी लिमिटेड के मीडिया डायरेक्टर धीरज अग्रवाल कहते हैं कि किसी भी प्रोडक्ट का विज्ञापन उससे होने वाले फायदे, उसकी खूबियों और फैक्ट्स के साथ ही बनाना चाहिए। गंभीर बीमारी या मौत का डर दिखाकर प्रोडक्ट बेचना ठीक नहीं। इस तरह के विज्ञापन से आखिर आप कितने दिन प्रोडक्ट को मार्केट में बेच सकेंगे? लोग नासमझ नहीं हैं कि बिना फायदे के ही प्रोडक्ट्स केवल डर की वजह से खरीद लें। वे सही-गलत समझ सकते हैं। सही बात बोलने से लॉन्ग टर्म फायदा होता है, इसलिए हम बेनिफिट दिखाकर ही प्रोडक्ट बेचते हैं। अगर आपको आपके प्रोडक्ट पर भरोसा है, तो बिना किसी को डराए भी प्रोडक्ट बेच सकते हैं।
साइकोलॉजिस्ट, डॉ. बिंदा सिंह बताती हैं कि हम लोग बहुत संवेदनशील होते हैं। अपनी जिंदगी और परिवार को लेकर बहुत डरे रहते हैं। अभी की हमारी लाइफ स्टाइल ने भी हमें असुरक्षित बना दिया है। हम बच्चों को कहते हैं कि एक मिनट तक हाथ धोआे। मॉस्किटो रिपेलेंट क्रीम हाथ और पैर में लगाए बिना खेलने मत जाओ। दरअसल, यह सब हमारी परवरिश का कसूर है। शुरू से ही हम बच्चों को इस तरह से डरा देते हैं कि वे बड़े होकर भी उस डर से बाहर नहीं निकल पाते हैं। इस तरह की बातों से हमारे अंदर आत्मविश्वास की कमी आ गई है। इसी असुरक्षा की भावना आैर आत्मविश्वास की कमी का फायदा कंपनियां उठाती हैं।
करन राघव क्रिएटिव डायरेक्टर, एमएनसी एडवरटाइजिंग कैंपेन में डर को इस्तेमाल करने की बात की जाए, तो सबसे पहले स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं और उत्पादों को बेचने के लिए ही डर का सहारा लिया जाता था। इसके बाद इंश्योरेंस कंपनियां भी डर को बेच कर अपनी पॉलिसी बेचने लगीं। पीछे-पीछे कई कंपनियां भी इस दौड़ में शामिल हो गईं। यहां यह समझना भी जरूरी है कि बाजार का एक समय पर एक चलन होता है, जिसके तहत कंपनियां अपने कैंपेन तय करती हैं। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि कंपनियां पहले काफी शोध कराती हैं और इसी शोध के आधार पर वे अपनी थीम तय करती हैं।
ये सब एडवरटाइजिंग की अपील्स होती हैं। सभी विज्ञापन इन्हीं अपील्स पर काम करते हैं। डर भी एक अपील है। डर दिखाकर इंश्योरेंस पॉलिसी बेचना सालों से चल रहा है। हॉस्पिटल का खर्च होगा, तो मेडिकल इंश्योंरेस लें। मरने के डर से जीते जी इंश्योरेस का प्रीमियम भरते रहो। अब देखें, पहले के जमाने में कछुआ छाप अगरबत्ती होती थी। फिर जेट की टिकिया आ गई, जो रोज मशीन में लगती थी। फिर लिक्विड रिफिल पैक आ गया, जो 30 दिन चलता है। तीनों मॉस्किटो रिपेलेंट हैं। आप चाहते, तो मच्छरदानी में भी सो सकते थे, लेकिन एेड वालों ने इन चीजों को इस तरह बेचा कि यह आपकी जरूरत बन गया। वह इनके एेड में छोटे बच्चों को दिखाते हैं, जिनकी नींद मच्छर काटने से टूट जाती है और मां परेशान हो जाती है। यह लोगों को भावुक कर जोड़ने का तरीका है।
अब आप देखें कि सेनेटरी नैपकिन का उपयोग कई सालों से हो रहा है। काफी समय से इसे लेकर एेड बन रहे हैं। नैपकिन में हर बार कुछ अपडेट होकर नया प्रकार आ जाता है और फिर एेड को थोड़ा बदलकर दोबारा पेश किया जाता है। इनके सभी एेड में एक बात कॉमन होती है। वे एक आत्मविश्वास से भरी लड़की दिखाएंगे, जो जॉब करती है, स्पोर्ट में भाग लेती है, पिकनिक और पार्टी करती है। दरअसल, कुछ चीजें हमेशा कॉमन होती हैं, बस पेश करने का तरीका अलग होता है। यहां हमें समझना होगा कि विज्ञापन सीधे तौर पर दो तरह के होते हैं, एक तार्किक और दूसरा भावनात्मक। हर एडवरटाइजर इन्हीं के भीतर आने वाली अपील पर काम करता है। उन्हीं के अनुसार एेड को डिजाइन करता है। इसी के अंतर्गत यह तय होता है कि कुछ चीजों को डर के कॉन्सेप्ट से बेचना जरूरी होता है।’
विज्ञापन दिखाने का वक्त: विज्ञापन बनाने के पहले इस बात पर गौर किया जाता है कि यह प्रोडक्ट किस सेगमेंट के लिए है? उन्हें क्या-क्या पसंद है और उन तक किस तरह पहुंचा जाए? इस तरह परिवार से जुड़े या डराने वाले विज्ञापनों को ऐसे समय में ज्यादा दिखाया जाता है, जिस टाइम महिलाएं टीवी के सामने होती हैं। ये विज्ञापन पारिवारिक, सास-बहू के सीरियल, लव स्टोरीज या बच्चों के इर्द-गिर्द घूमने वाले सीरियल्स और फिल्मों के वक्त ज्यादा दिखाए जाते हैं, ताकि महिलाओं की नजर इन पर पड़े।
इमामी लिमिटेड के मीडिया डायरेक्टर धीरज अग्रवाल कहते हैं कि किसी भी प्रोडक्ट का विज्ञापन उससे होने वाले फायदे, उसकी खूबियों और फैक्ट्स के साथ ही बनाना चाहिए। गंभीर बीमारी या मौत का डर दिखाकर प्रोडक्ट बेचना ठीक नहीं। इस तरह के विज्ञापन से आखिर आप कितने दिन प्रोडक्ट को मार्केट में बेच सकेंगे? लोग नासमझ नहीं हैं कि बिना फायदे के ही प्रोडक्ट्स केवल डर की वजह से खरीद लें। वे सही-गलत समझ सकते हैं। सही बात बोलने से लॉन्ग टर्म फायदा होता है, इसलिए हम बेनिफिट दिखाकर ही प्रोडक्ट बेचते हैं। अगर आपको आपके प्रोडक्ट पर भरोसा है, तो बिना किसी को डराए भी प्रोडक्ट बेच सकते हैं।
साइकोलॉजिस्ट, डॉ. बिंदा सिंह बताती हैं कि हम लोग बहुत संवेदनशील होते हैं। अपनी जिंदगी और परिवार को लेकर बहुत डरे रहते हैं। अभी की हमारी लाइफ स्टाइल ने भी हमें असुरक्षित बना दिया है। हम बच्चों को कहते हैं कि एक मिनट तक हाथ धोआे। मॉस्किटो रिपेलेंट क्रीम हाथ और पैर में लगाए बिना खेलने मत जाओ। दरअसल, यह सब हमारी परवरिश का कसूर है। शुरू से ही हम बच्चों को इस तरह से डरा देते हैं कि वे बड़े होकर भी उस डर से बाहर नहीं निकल पाते हैं। इस तरह की बातों से हमारे अंदर आत्मविश्वास की कमी आ गई है। इसी असुरक्षा की भावना आैर आत्मविश्वास की कमी का फायदा कंपनियां उठाती हैं।
करन राघव क्रिएटिव डायरेक्टर, एमएनसी एडवरटाइजिंग कैंपेन में डर को इस्तेमाल करने की बात की जाए, तो सबसे पहले स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं और उत्पादों को बेचने के लिए ही डर का सहारा लिया जाता था। इसके बाद इंश्योरेंस कंपनियां भी डर को बेच कर अपनी पॉलिसी बेचने लगीं। पीछे-पीछे कई कंपनियां भी इस दौड़ में शामिल हो गईं। यहां यह समझना भी जरूरी है कि बाजार का एक समय पर एक चलन होता है, जिसके तहत कंपनियां अपने कैंपेन तय करती हैं। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि कंपनियां पहले काफी शोध कराती हैं और इसी शोध के आधार पर वे अपनी थीम तय करती हैं।