प्रवासी संकट और रोजगार घटने से विकास पर असर, सुधार मेें लगेगा वक्त : आरबीआई
- घरेलू उपभोक्ता, कंपनियों और सरकार पर होगा सबसे ज्यादा असर
- भविष्य में अर्थव्यवस्था का आकार इस पर निर्भर करेगा कि महामारी का फैलाव कितना होता है
- कोविड-19 के बाद की दुनिया बदल जाएगी और नया सामान्य सामने आएगा।
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रिजर्व बैंक ने कोविड-19 महामारी से उपजे आर्थिक संकट को बेहद गंभीर बताया है। 2019-20 की मंगलवार को जारी सालाना रिपोर्ट में आरबीआई ने कहा कि शहरी इलाकों में खपत काफी कम हो गई है। प्रवासी संकट और रोजगार घटने से वृद्धि पर असर पड़ा है। मांग और खपत को पहले की तरह सामान्य होने में समय लगेगा। देश में संक्रमण की दर लगातार बढ़ती जा रही है, जिससे अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों का वास्तविक आकलन करना मुश्किल है।
केंद्रीय बैंक ने कहा कि सरकार को राजकोषीय घाटे पर काबू पाने और आर्थिक संकट से निकलने के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी। उत्पादन, विनिर्माण और व्यापार सहित लगभग सभी क्षेत्रों में व्यापक सुधार के जरिये ही नए रास्ते खुल सकते हैं और स्थितियों पर काबू पाया जा सकता है।
गतिशील और संभावनाओं वाली सामान्य प्रक्रिया के जरिये महामारी के अनुमानित प्रभावों का आकलन किया जा रहा है, लेकिन संक्रमण की दर लगातार बढ़ने से वास्तविक आकलन नहीं हो सकता है। अगस्त के आखिर में संक्रमण दर उच्चतम स्तर पर पहुंच सकती है, जिससे उत्पादन क्षमता और वास्तविक उत्पादन का अंतर (-)12 फीसदी पहुंच जाएगा। सबसे ज्यादा असर घरेलू उपभोक्ता, कंपनियों और सरकार पर होगा।
निवेश बढ़ाने के लिए भी सुधार जरूरी
रिपोर्ट में निवेश बढ़ाने पर खासा जोर दिया गया है, जिसके लिए व्यापक सुधार जरूरी है। रिजर्व बैंक के अनुसार, कोरोना से उत्पादन और आपूर्ति शृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है। सरकारी और निजी खपत बढ़ने से ही आर्थिक सुधार संभव है। 2040 तक देश के इन्फ्रा क्षेत्र में 40 खबर डॉलर के निवेश की जरूरत है।
2019-20 मेें सकल आय 1.5 लाख करोड़ रही, जो पिछले साल 1.95 लाख करोड़ थी। 30 जून, 2020 तक आरबीआई के पास कुल जमा 11.76 लाख करोड़ रहा। महामारी का दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं पर गहरा असर पड़ा है। भारत मेें भी संभावित वृद्धि की संभावनाएं कमजोर हुई हैं।
विनिर्माण और खनन क्षेत्र को 2.7 लाख करोड़ की चपत
आरबीआई ने कहा, 68 दिन के लॉकडाउन में आय पर सबसे ज्यादा असर पड़ा। सिर्फ विनिर्माण और खनन क्षेत्र को ही 2.7 लाख करोड़ की चपत लगी है। महामारी के दौरान व्हाइट कॉलर कर्मचारियों (कार्यालय में बैठक काम करने वाले) के लिए जहां वर्क फ्रॉम होम की सुविधा थी, वहीं जरूरी सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों को कार्यालय में बैठकर काम करना पड़ा।
इससे संक्रमण का जोखिम काफी बढ़ गया। होटल, रेस्तरां, विमानन, पर्यटन क्षेत्र में रोजगार को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। इस कारण 2020-21 में भारत की विकास दर शून्य से 4.5 फीसदी नीचे रहने का अनुमान है। भारतीय अर्थव्यवस्था अब उस स्थिति में पहुंच गई है, जहां आरक्षित कोष का प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती होगी। सरकार की प्राथमिकता किसानों की आय बढ़ाने और उपभोक्ताओं तक सस्ती खाद्य सामग्री पहुंचाने की होनी चाहिए। 4.5 फीसदी शून्य से भी नीचे रहेगी 2020-21 में विकास दर।
महंगाई और बढ़ाएगी मुश्किल
रिजर्व बैंक ने सालाना रिपोर्ट में कहा है कि खाद्य उत्पादों की आपूर्ति प्रभावित होने से आने वाले महीनों में महंगाई दर और बढ़ सकती है। वित्तीय बाजार पर बढ़ता जोखिम भी महंगाई बढ़ाने का कारण बनेगा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जुलाई में खुदरा महंगाई दर 6.93 फीसदी रही।
इस पर सब्जियों, दालों, मांस और मछली की बढ़ती कीमतों का सबसे ज्यादा असर पड़ा। गवर्नर शक्तिकांत दास ने भी मौद्रिक समीक्षा बैठक में रेपो रेट स्थिर रखने का कारण बढ़ती महंगाई बताया था। हालांकि, साल की दूसरी छमाही में महंगाई दर घटने की उम्मीद है।
उपभोक्ताओं के लिए 2 फीसदी तक सस्ते हुए कर्ज
आरबीआई ने कहा कि 2019-20 में खुदरा कर्ज को एक्सटर्नल बेंचमार्क से जोड़े जाने के बाद उपभोक्ताओं को 2 फीसदी तक सस्ता कर्ज मिला है। बैंकों ने रेपो रेट में कटौती का लाभ अपने ग्राहकों तक पहुंचाया जिससे अक्तूबर 2019 से जून 2020 के बीच होम लोन की दरें 1.04 फीसदी नीचे आईं।
वाहन कर्ज भी 1.02 फीसदी सस्ता हुआ जबकि पर्सनल लोन में 1.15 फीसदी और एमएसएमई के कर्ज की ब्याज दरों में 1.98 फीसदी कटौती हुई। हालांकि, कर्ज की वृद्धि दर 2018-19 के 13.3 फीसदी से गिरकर 6.1 फीसदी पर आ गई।
बाजार से जुटाएंगे 20 हजार करोड़
आरबीआई ने कहा है कि सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री के जरिये बाजार से 20 हजार करोड़ रुपये जुटाने की योजना है। इस प्रक्रिया को दो चरणों में पूरा किया जाएगा। 10 हजार करोड़ का पहला चरण 27 अगस्त को और दूसरा 3 सितंबर को पूरा किया जाएगा।