ट्रंप टैरिफ का असर: 0.40 फीसदी तक घट सकती है GDP की रफ्तार; अतिरिक्त जुर्माने से और धुंधला हो सकता है भविष्य
विशेषज्ञों का दावा है कि ट्रंप के टैरिफ से भारत की विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं को झटका लग सकता है। इतना ही नहीं जीडीपी की रफ्तार भी 0.40 फीसदी तक घट सकती है। वहीं, अतिरिक्त जुर्माने से भविष्य और भी धुंधला हो सकता है।
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वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत से आयात पर 25 फीसदी टैरिफ लगाने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा सकती है। घरेलू शेयर बाजार और रुपये पर भी असर डाल सकती है। टैरिफ की घोषणा के बाद रुपया बुधवार को टूटकर 88 के करीब रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। सेंसेक्स और निफ्टी में भी 0.6 फीसदी की गिरावट देखी गई।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह टैरिफ 2025-26 में भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार 0.40 फीसदी तक कम कर सकता है। अमेरिका अतिरिक्त जुर्माना लगाता है, तो भविष्य और भी धुंधला हो सकता है।वोंटोबेल में ईएम इक्विटीज के सह-प्रमुख राफेल लुएशर ने कहा, टैरिफ लागू रहे, तो भारत की विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं को झटका लग सकता है। इससे भारत की वृद्धि बाधित हो सकती है।
जेफरीज में वैश्विक फॉरेक्स के प्रमुख ब्रैड बेचटेल का कहना है, क्रूड में उछाल और विदेशी निवेशकों की पूंजी निकासी के बाद अमेरिकी टैरिफ से रुपये में और गिरावट आ सकती है। यह 90 का स्तर भी छू सकता है। वहीं, गोल्डमैन सैश के अर्थशास्त्री शांतनु सेनगुप्ता का कहना है, अमेरिका में नीतिगत अनिश्चितता बढ़ने से भारतीय कंपनियां खासकर अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव में आने वाली इकाइयां निवेश संबंधी फैसले टाल सकती हैं। हालांकि, डीबीएस बैंक के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि श्रम-प्रधान उद्योग एवं छोटी निर्यातक कंपनियां राजकोषीय मदद व आगे दरों में कटौती से नकारात्मक जोखिम की भरपाई करने में सक्षम होंगी।
ऑलस्प्रिंग ग्लोबल इन्वेस्टमेंट्स में टोटल इमर्जिंग मार्केट्स इक्विटी की प्रमुख एलिसन शिमादा ने कहा, टैरिफ का व्यापक आर्थिक प्रभाव सीमित हो सकता है, क्योंकि भारत का निर्यात जीडीपी का सिर्फ 2-3 फीसदी है। पर, भारत रूस-अमेरिका दोनों से व्यापारिक संबंध चाहता है। वह अमेरिका से आयात बढ़ा सकता है। बार्कलेज का कहना है कि टैरिफ का जीडीपी वृद्धि पर व्यापक असर पड़ने की आशंका नहीं है। उम्मीद है, अंतिम टैरिफ दर आगे चलकर 25% से नीचे आ सकती है।
आभूषण उद्योग : एक लाख से ज्यादा नौकरियां खतरे में
अमेरिकी टैरिफ से भारत के रत्न और आभूषण उद्योग पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। आभूषण उद्योग के मुताबिक, देश की निर्यात अर्थव्यवस्था में यह उद्योग एक प्रमुख योगदानकर्ता है। टैरिफ से एक लाख नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है।
अखिल भारतीय रत्न एवं आभूषण घरेलू परिषद के चेयरमैन राजेश रोकड़े ने कहा, हस्तनिर्मित आभूषणों के निर्यात पर भारी असर पड़ सकता है। टैरिफ से एक लाख से अधिक लोग बेरोजगार हो सकते हैं।अमेरिका भारतीय रत्न और आभूषणों के सबसे बड़े बाजारों में से एक है...पिछले वित्त वर्ष में अमेरिका को 9.9 अरब डॉलर मूल्य के आभूषण निर्यात किए गए थे।
स्टील : 1,300 करोड़ रुपये घटेगा आर्सेलर का मुनाफा
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी स्टील निर्माता कंपनी आर्सेलर मित्तल ने आशंका जताई है कि टैरिफ से उसके मुनाफे में करीब 1,300 करोड़ रुपये की कमी आ सकती है। कंपनी के वित्त प्रमुख जेनुइनो क्रिस्टिनो ने कहा, हम कनाडा से अमेरिका को उच्च मूल्यवर्धित सामग्री की आपूर्ति करते हैं। इसकी जगह आसानी से नहीं ली जा सकती।
अमेरिका में विनिर्माण बढ़ाकर समाधान निकालेगी
आर्सेलर मित्तल अमेरिका में अपने विनिर्माण को बढ़ाकर समस्या का समाधान ढूंढ रही है। जून में इसने निप्पॉन स्टील का 50% हिस्से का अधिग्रहण पूरा कर लिया था। इससे अलबामा स्थित इस संयंत्र का पूर्ण नियंत्रण उसके हाथ में आ गया।
आईफोन निर्माण पर नहीं पड़ेगा असर
विश्लेषकों का मानना है, टैरिफ के बावजूद भारत में आईफोन का निर्माण करना सस्ता विकल्प ही बना रहेगा। एपल की रणनीति से वाकिफ उद्योग के अधिकारी ने कहा कि एपल की निर्माण योजनाएं लंबी अवधि के लिए बनाई गई हैं। एपल ने अपने भारत निर्यात को लगभग पूरी तरह अमेरिकी बाजार के लिए पुनर्गठित किया है और मार्च और मई के बीच फॉक्सकॉन ने भारत से 3.2 अरब डॉलर मूल्य के आईफोन निर्यात किए हैं, जो सभी अमेरिकी बाजार में उपलब्ध होंगे।
एपल के लिए चीन के बजाय भारत अब विनिर्माण में विविधता लाने की उसकी रणनीति का मुख्य आधार है...काउंटरपॉइंट रिसर्च के मुताबिक, अप्रैल और जून के बीच अमेरिकी बाजार में बेचे गए सभी आईफोन में से 71% की आपूर्ति भारत ने की, जो एक साल पहले 31% थी।
वस्त्र उद्योग : निर्यात में कमी आने के आसार
टेक्सटाइल उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे प्रतिस्पर्धी देशों में कम टैरिफ के कारण भारतीय निर्यातकों के लिए मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। अमेरिका कपड़ा निर्यात में भारत के लिए बड़ा बाजार है। वियतनाम में 20%, जबकि इंडोनेशिया को अमेरिका से 19% टैरिफ का सामना करना पड़ता है। भारतीय निर्यातकों को ऑर्डर रद्द होने और कीमतें कम करने जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
परिधान निर्यात संवर्धन परिषद के अध्यक्ष सुधरी सेखरी ने कहा, भारत को तब तक ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है, जब तक वियतनाम और बांग्लादेश पर लागू टैरिफ को मौजूदा स्तरों से कम नहीं किया जाता।
चावल : अस्थायी बाधा, मूल्य लाभ के कारण अमेरिकी बाजार में टिका रहेगा भारतीय अनाज
भारतीय चावल निर्यातक महासंघ (आईआरईएफ) ने टैरिफ को इस क्षेत्र के लिए अस्थायी बाधा करार दिया। महासंघ का कहना है कि भारत अब भी प्रतिस्पर्धियों की तुलना में मूल्य लाभ बरकरार रखता है। यही वजह है कि उच्च टैरिफ के दीर्घकालिक बाधा बनने की गुंजाइश कम ही है। भारतीय चावल पर नया अमेरिकी टैरिफ चीन (34%), वियतनाम (46%), पाकिस्तान (29%) और थाईलैंड (36%) जैसे प्रतिस्पर्धी देशों पर लगाए गए शुल्कों से कम है।
पश्चिम एशिया बासमती चावल का प्रमुख बाजार
पश्चिम एशिया भारतीय बासमती चावल का प्रमुख बाजार है। वहीं, अमेरिका को 2023-24 में भारत ने कुल 52.4 लाख टन वैश्विक निर्यात में से महज 2.34 लाख टन चावल ही निर्यात किया।
स्वास्थ्य : अमेरिका में दवाएं महंगी...मरीज होंगे परेशान
- जिस अमेरिका की 47 फीसदी दवाओं की जरूरतें भारत से पूरी होती हैं, 25 फीसदी टैरिफ का फैसला उसी पर भारी पड़ सकता है। इससे अमेरिका में जरूरी दवाओं की लागत बढ़ेगी। मरीजों को ज्यादा पैसे देने होंगे। इससे बीमा कंपनियां भी प्रीमियम बढ़ा सकती हैं।
- फार्मेक्सिल के अध्यक्ष नमित जोशी ने कहा, अमेरिकी बाजार सक्रिय दवा सामग्री (एपीआई) और कम लागत वाली जीवन रक्षक कैंसर दवाओं, एंटीबायोटिक आैर जेनरिक दवाओं के लिए भारत पर अधिक निर्भर है। भारतीय कंपनियां दवाइयों की कीमतें बढ़ाती हैं, तो अमेरिका को वैकल्पिक स्रोत खोजने में कठिन चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
- अन्य देशों से आयात में तीन से पांच वर्ष लगेंगे : औषधि निर्माण को अन्य देशों या अमेरिका में घरेलू स्रोतों में स्थानांतरित करने के प्रयासों में कई वर्ष लगने का अनुमान है। यह कम से कम 3-5 वर्ष हो सकता है।
- अमेरिका को भारत करीब 9 अरब डॉलर का फार्मा निर्यात करता है...अमेरिका में भारत के कुल निर्यात का 28% फार्मा उत्पाद हैं। 80% फार्मा की कच्ची सामग्री अमेरिका में नहीं बनती।