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एचएमटी के अधिकतर कर्मचारी वीआरएस लेने को तैयार नहीं

Sat, 09 Apr 2016 04:08 AM IST
शिशिर चौरसिया / अमर उजाला, दिल्ली
शिशिर चौरसिया / अमर उजाला, दिल्ली Updated Sat, 09 Apr 2016 04:08 AM IST
सार

  • बंगलूरू के भी करीब 150 कर्मचारियों को है वीआरएस नामंजूर
  • वीआरएस के तहत मिलने वाली रकम 30-40 लाख रुपये 

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HMT employees declines to take VRS
एचएमटी

विस्तार

भारी उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाले एचएमटी समूह के तीन उपक्रमों को बंद करने और सभी कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) देने के सरकार के फैसले पर सभी कर्मचारी सहमत नहीं हैं।

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उत्तराखंड के रानीबाग इकाई में तो आधे से अधिक कर्मचारियों ने वीआरएस लेने से इंकार कर दिया है, जबकि बंगलूरू इकाई में भी ऐसे कर्मचारियों की संख्या डेढ़ सौ के करीब है। कर्मचारियों के इस रुख से परेशान कंपनी के अधिकारियों ने मंत्रालय को इस तथ्य से अवगत करा दिया है।
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मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि रानीबाग इकाई में इस समय करीब ढाई-तीन सौ कर्मचारी कार्यरत हैं। उनमें से करीब 200 कर्मचारियों ने वीआरएस लेने से इंकार कर दिया है। उन्होंने कहा है कि या तो सरकार कारखाने में फिर से उत्पादन शुरू करे या फिर उन्हें उसी तरह वेतन का भुगतान करती रहे जैसे कि अभी तक हो रहा है।
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उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति (सीसीईए) ने एचएमटी वॉचेज लिमिटेड, एचएमटी चिनार वॉचेज लिमिटेड और एचएमटी बियरिंग लिमिटेड को बंद कर उनके कर्मचारियों को वर्ष 2007 के वेतन के आधार पर वीआरएस देने का फैसला किया है।

सियासी उथल-पुथल में फंसी सरकार

HMT employees declines to take VRS
Uttrakhand MLA

अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, कश्मीर इकाई में ऐसी कोई समस्या नहीं है क्योंकि वहां महज 30 कर्मचारी ही बचे हैं। वहां सभी वीआरएस लेने पर सहमत हैं। लेकिन रानीबाग इकाई के ढाई-तीन सौ कर्मचायिों में से करीब 200 कर्मचारी वीआरएस लेने को तैयार नहीं हैं।

बंगलूरू के सात-आठ सौ कर्मचारियों में से करीब 150 कर्मचारी वीआरएस नहीं लेने पर अड़े हैं। हालांकि इन कर्मचारियों को वीआरएस के मद में 30 से 40 लाख रुपये मिल रहे हैं, लेकिन वे इसे स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

मंत्रालय के एक अन्य अधिकारी ने बताया कि रानीबाग इकाई में वीआरएस नहीं स्वीकारने वाले कर्मचारियों को एक राजनीतिक दल से संरक्षण मिला हुआ है। उत्तराखंड में इस समय वैसे ही राजनीतिक उथल पुथल मची हुई है। इसलिए इस मामले पर क्या रुख अपनाया जाए, तय नहीं हो पाया है। हालांकि इस मामले पर सरकार के पास विकल्प है कि सभी को जबरन रिटायर कर दें। लेकिन इसके उपयोग से बचने की कोशिश की जा रही है। 

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