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Niti Ayog Report: सरकारी स्कूलों में क्यों घट रहे छात्र और क्या है प्राइवेट स्कूलों की असलियत? जानिए कड़वा सच

Thu, 07 May 2026 03:28 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Thu, 07 May 2026 03:28 PM IST
सार

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत में शिक्षा के बदलते ट्रेंड, प्राइवेट स्कूलों की गुणवत्ता और शिक्षकों की कमी के संकट को विस्तार से समझें। इस विश्लेषण को अभी पढ़ें। 

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Government School Enrollment Plunges Below 50% as NITI Aayog Flags Quality Concerns in Booming Private Sector
नीति आयोग की रिपोर्ट - फोटो : amarujala.com

विस्तार

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था और उसका भविष्य शिक्षा क्षेत्र के बुनियादी ढांचे पर निर्भर करता है। वर्तमान में भारत के स्कूली शिक्षा सिस्टम में एक बड़ा ढांचागत बदलाव देखा जा रहा है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो दशकों में भारतीय माता-पिता का झुकाव सरकारी के बजाय प्राइवेट स्कूलों की तरफ तेजी से बढ़ा है। हालांकि, शिक्षा के क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर की इस तेज वृद्धि ने गुणवत्ता, समानता और रेगुलेशन को लेकर भी कई गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। आइए, इस महत्वपूर्ण रिपोर्ट और इसके आर्थिक व सामाजिक प्रभावों को सवाल-जवाब के माध्यम से आसान भाषा में समझते हैं।

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सवाल: सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या में कितनी गिरावट दर्ज की गई है?

जवाब: नीति आयोग की रिपोर्ट के डेटा के अनुसार, पिछले दो दशकों में सरकारी स्कूलों में दाखिले में भारी गिरावट आई है। साल 2005 में जहां 71 प्रतिशत छात्र सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, वहीं वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा गिरकर मात्र 49.24 प्रतिशत रह गया है। इसके विपरीत, अब माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर 44.01 प्रतिशत संस्थान प्राइवेट स्कूलों के रूप में संचालित हो रहे हैं।

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सवाल: अभिभावक सरकारी स्कूलों के मुकाबले प्राइवेट स्कूलों को क्यों चुन रहे हैं?

जवाब: यह शिफ्ट मुख्य रूप से एक धारणा से प्रेरित है। अभिभावकों का मानना है कि प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को बेहतर अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा, कड़ा अनुशासन और भविष्य में रोजगार के अधिक बेहतर अवसर मिलते हैं। इसी कारण वे प्राइवेट संस्थानों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

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सवाल: क्या प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा का स्तर वास्तव में बेहतर है?

जवाब: रिपोर्ट आगाह करती है कि अभिभावकों की उम्मीदें हमेशा जमीनी परिणामों से मेल नहीं खातीं। कम फीस वाले प्राइवेट स्कूलों (एलएफपी) में स्थिति चिंताजनक है, जहां कक्षा 5 के 35 प्रतिशत छात्र कक्षा 2 की किताब भी नहीं पढ़ सकते, जबकि 60 प्रतिशत छात्र बुनियादी भाग का सवाल हल नहीं कर पाते। इसके अलावा, ऐसे कई स्कूल शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम के बुनियादी मानकों को पूरा नहीं करते और वहां टॉयलेट, खेल के मैदान और साफ पीने के पानी जैसी जरूरी सुविधाओं का अभाव है। इन स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती अक्सर अनौपचारिक होती है, और उन्हें कम वेतन तथा बिना जॉब सिक्योरिटी के काम करना पड़ता है, जिसका सीधा असर पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ता है।

सवाल: स्कूलों में शिक्षकों की कमी और मैनेजमेंट की वर्तमान स्थिति क्या है?

जवाब: देश भर के लगभग 14 लाख स्कूलों में करीब 1.01 करोड़ शिक्षक कार्यरत हैं। छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार के बावजूद, ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में शिक्षकों की भारी कमी और उनके नौकरी छोड़ने की दर बहुत अधिक है। रिपोर्ट सबसे बड़ी चिंता 'सिंगल-टीचर स्कूल' को मानती है। वर्तमान में 1 लाख से अधिक स्कूल (कुल स्कूलों का 7 प्रतिशत से ज्यादा) केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जिससे छात्रों को सीखने के सार्थक अवसर नहीं मिल पाते। साथ ही, शिक्षकों की अनुचित तैनाती, कठिन कार्य परिस्थितियां, प्रशासनिक बोझ और विषय की अपर्याप्त विशेषज्ञता जैसी कई चुनौतियां मौजूद हैं।

सवाल: शिक्षा को भविष्य के अनुकूल बनाने के लिए क्या नए कदम उठाए जा रहे हैं?

जवाब: तकनीकी कौशल को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा मंत्रालय ने अक्तूबर 2025 में घोषणा की है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 और एनसीएफ-एसई-2023 के तहत कक्षा 3 से 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और कंप्यूटेशनल थिंकिंग' को एक अनिवार्य कौशल के रूप में पढ़ाया जाएगा। सीबीएसई और एनसीईआरटी इसका पाठ्यक्रम विकसित करेंगे। हालांकि, रिपोर्ट मानती है कि बुनियादी ढांचे की कमी और शिक्षकों के पूरी तरह तैयार न होने के कारण इन नए विषयों को प्रभावी ढंग से लागू करना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।



शिक्षा क्षेत्र में यह बदलाव अभिभावकों की बेहतर शिक्षा की आकांक्षाओं का परिणाम है। लेकिन केवल प्राइवेट स्कूलों की संख्या बढ़ना सफलता की गारंटी नहीं है। नीति निर्माताओं को रेगुलेशन, शिक्षकों की ट्रेनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों पर तुरंत ध्यान देना होगा ताकि देश के हर छात्र को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।

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