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सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन नहीं, जन जागरूकता का सहारा लेगी सरकार

Wed, 02 Oct 2019 06:06 PM IST
‌डिंपल अलवधी बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला Published by: ‌डिंपल अलवधी Updated Wed, 02 Oct 2019 06:06 PM IST
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government not banning single use plastic but creating awareness

भारत सरकार ने सिंगल यूज प्लास्टिक के खिलाफ अभियान को जन जागरूकता तक ही सीमित रखा है और प्लास्टिक पर पूरी तरह रोक नहीं लगाने का फैसला लिया है। इस संदर्भ में ट्विटर हैंडल 'स्वच्छ भारत' पर सरकार ने कहा है कि 11 सितंबर 2019 को पीएम मोदी द्वारा लॉन्च किए गए स्वच्छता ही सेवा मिशन का मकसद सिंगल यूज प्लास्टिक को बैन करना नहीं है। बल्कि सरकार का मकसद सिंगल यूज प्लास्टिक के खिलाफ जागरूकता फैलाना है।

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अगर सरकार सिंगल यूज प्लास्टिक पर पूर्ण पाबंदी लगा देती है, तो ये उद्योग के लिए ठीक नहीं होगा क्योंकि अर्थव्यवस्था में सुस्ती है और इससे कईं लोगों की नौकरी खतरे में आ सकती है। इसलिए प्लास्टिक पर पूरी तरह रोक से स्थिति और बिगड़ सकती है।

इस संदर्भ में दो अधिकारियों ने कहा है कि प्लास्टिक बैग्स, कप, प्लेट, छोटी बोतल, स्ट्रॉ और कुछ प्रकार के पाउच को बैन करने के लिए अभी कोई कदम नहीं उठाया जाएगा। लेकिन यह प्रयास किया जाएगा कि प्लास्टिक कम से कम इस्तेमाल किया जाए। 

वहीं पर्यावरण मंत्रालय के नौकरशाह चंद्र किशोर मिश्रा ने कहा है कि, 'सिंगल यूज प्लास्टिक के उत्पाद जैसे पॉलिथिन बैग्स और स्टेरोफॉम के स्टोरेज, मैन्युफैक्चरिंग को लेकर सरकार राज्यों से मौजूदा कानूनों को लागू करने को कहेगी।'

क्या है सिंगल यूज प्लास्टिक

सिंगल यूज प्लास्टिक वह है, जिसका प्रयोग केवल एक ही बार किया जाए। इसमें प्लास्टिक की थैलियां, प्लेट, ग्लास, चम्मच, बोतलें, स्ट्रॉ और थर्माकोल शामिल हैं। इनका एक बार इस्तेमाल के बाद फेंक दिया जाता है। इस प्लास्टिक में पाए जाने वाले केमिकल पर्यावरण के साथ ही लोगों के लिए काफी घातक हैं। 

ये सामान होते है सिंगल यूज प्लास्टिक

- पॉलिथीन और प्लास्टिक के कैरी बैग
- प्लास्टिक के डिस्पोजेबल प्लेट, ग्लास
- मिनरल वाटर की बोतलें
- थर्मोकोल के प्लेट, ग्लास व अन्य बर्तन
- कोल्ड ड्रिंक पीने में इस्तेमाल होने वाली स्ट्रॉ 

इन विकल्पों का करें इस्तेमाल 

  • प्लास्टिक की जगह पेपर के बने स्ट्रॉ का प्रयोग कर सकते हैं। 
  • प्लास्टिक की पानी के बोतलों के स्थान पर कॉपर, शीशा या धातु की बोतलों का प्रयोग करें। 
  • प्लास्टिक के कप की जगह पेपर से बनी प्याली का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • जूट या कागज से बनी थैली का प्रयोग कर सकते हैं।
  • स्टील के चाकू, चम्मच का इस्तेमाल कर सकते हैं। लकड़ी के चम्मच भी मार्केट में उपलब्ध है। 

गन्ने की भूसी बेहतर विकल्प 

सिंगल यूज प्लास्टिक के स्थान पर गन्ने की भूसी बेहतर विकल्प है। गन्ने की भूसी से बने चम्मच, प्लेट, डिब्बा आदि का प्रयोग दुकानदार और व्यवसायी तेजी से कर रहे हैं। बीते एक महीने से इसकी काफी डिमांड बढ़ी है। पहले गन्ने की भूसी का एक डिब्बे की कीमत 15 रुपये थी। अब अधिक उत्पादन होने के चलते एक डिब्बा साढ़े सात रुपये में बिक रहा है। सिंगल यूज प्लास्टिक बंद होने से इसका उत्पादन अधिक होगा। ऐसा होने से इसकी कीमत और कम होने की संभावना है। 

रेलवे में शुरू होगा कुल्हड़ का प्रयोग

रेल यात्रियों को जल्दी ही 400 रेलवे स्टेशनों पर चाय, लस्सी और खाने-पीने का सामान मिट्टी से बने कुल्हड़, गिलास और दूसरे बर्तनों में मिलने लगेगा। खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) ने गुरुवार को कहा कि रेल मंत्रालय ने 400 रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को खाने-पीने का सामान मिट्टी से बने बर्तनों में उपलब्ध कराने का निर्णय किया है।

प्लास्टिक प्रयोग पर लगेगा अंकुश

इस कदम से जहां एक तरफ स्थानीय और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा सिंगल यूज प्लास्टिक के उपयोग पर अंकुश लगेगा, वहीं दूसरी तरफ कुम्हारों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।

कुम्हारों को मिलेंगी इलेक्ट्रिक चाक

केवीआईसी के चेयरमैन विनय कुमार सक्सेना ने कहा कि रेलवे की इस पहल से उत्साहित आयोग कुम्हारों के बीच 30,000 इलेक्ट्रिक चाक का वितरण करने का फैसला किया है। साथ ही मिट्टी के बने सामानों को पुनर्चक्रमण और नष्ट करने के लिये मशीन (ग्राइंडिंग मशीन) भी उपलब्ध कराएगा। 

क्या आप प्लास्टिक प्रदूषण के बारे में जानते हैं ये जरूरी बातें?

  • प्लास्टिक की उत्पत्ति सेलूलोज डेरिवेटिव में हुई थी। प्रथम सिंथेटिक प्लास्टिक को बेकेलाइट कहा गया और इसे जीवाश्म ईंधन से निकाला गया था।
  • फेंकी हुई प्लास्टिक धीरे-धीरे अपघटित होती है एवं इसके रसायन आसपास के परिवेश में घुलने लगते हैं। यह समय के साथ और छोटे-छोटे घटकों में टूटती जाती है और हमारी खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करती है।
  • यहां यह स्पष्ट करना बहुत आवश्यक है कि प्लास्टिक की बोतलें ही केवल समस्या नहीं हैं, बल्कि प्लास्टिक के कुछ छोटे रूप भी हैं, जिन्हें माइक्रोबिड्स कहा जाता है। ये बेहद खतरनाक तत्त्व होते हैं। इनका आकार 5 मिलीमीटर से अधिक नहीं होता है।
  • इनका इस्तेमाल सौंदर्य उत्पादों तथा अन्य क्षेत्रों में किया जाता है। ये खतरनाक रसायनों को अवशोषित करते हैं। जब पक्षी एवं मछलियां इनका सेवन करती हैं तो यह उनके शरीर में चले जाते हैं।
  • भारतीय मानक ब्यूरो ने हाल ही में जैव रूप से अपघटित न होने वाले माइक्रोबिड्स को उपभोक्ता उत्पादों में उपयोग के लिये असुरक्षित बताया है।
  • अधिकांशतः प्लास्टिक का जैविक क्षरण नहीं होता है। यही कारण है कि वर्तमान में उत्पन्न किया गया प्लास्टिक कचरा सैकड़ों-हजारों साल तक पर्यावरण में मौजूद रहेगा। ऐसे में इसके उत्पादन और निस्तारण के विषय में गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श किए जाने की आवश्यकता है।

वर्तमान स्थिति की बात करें तो- 

  • स्थिति यह है कि वर्तमान समय में प्रत्येक वर्ष तकरीबन 15 हजार टन प्लास्टिक का उपयोग किया जा रहा है। प्रतिवर्ष हम इतनी अधिक मात्रा में एक ऐसा पदार्थ इकठ्ठा कर रहे हैं जिसके निस्तारण का हमारे पास कोई विकल्प मौजूद नहीं है।
  • यही कारण है कि आज के समय में जहां देखो प्लास्टिक एवं इससे निर्मित पदार्थों का ढेर देखने को मिल जाता है।
  • पहले तो यह ढेर धरती तक ही सीमित था लेकिन अब यह नदियों से लेकर समुद्र तक हर जगह नजर आने लगा है। धरती पर रहने वाले जीव-जंतुओं से लेकर समुद्री जीव भी हर दिन प्लास्टिक निगलने को विवश है।
  • इसके कारण प्रत्येक वर्ष तकरीबन एक लाख से अधिक जलीय जीवों की मृत्यु होती है।
  • समुद्र के प्रति मील वर्ग में लगभग 46 हजार प्लास्टिक के टुकड़े पाए जाते हैं।
  • इतना ही नहीं हर साल प्लास्टिक बैग का निर्माण करने में लगभग 4.3 अरब गैलन कच्चे तेल का इस्तेमाल होता है।

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