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आभूषणों का वर्चस्व: तेजी से बढ़ते दाम के बीच भी सोने की चमक कायम, खरीद का बदला पैटर्न

Tue, 06 Jan 2026 10:56 AM IST
रिया दुबे अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क Published by: रिया दुबे Updated Tue, 06 Jan 2026 10:56 AM IST
सार

सोने की कीमतें बीते तीन दशकों में कई गुना बढ़ने के बावजूद भारत में इसकी मांग बनी हुई है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि आभूषण-केंद्रित खरीद अब धीरे-धीरे निवेश की ओर शिफ्ट हो रही है। जूलरी की हिस्सेदारी घटी है, जबकि गोल्ड कॉइन, बिस्किट और निवेश-उन्मुख खरीद बढ़ी है। 

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Gold continues to shine despite rapidly rising prices, buying patterns change
सोना - फोटो : Adobestock

विस्तार

वैश्विक बाजार में लगातार महंगा होता सोना आमतौर पर मांग घटने का संकेत माना जाता है, लेकिन भारत के संदर्भ में यह धारणा पूरी तरह सही साबित नहीं होती। विश्व स्वर्ण परिषद (डब्ल्यूजीसी), आरबीआई, डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ कमर्शियल इंटेलिजेंस एंड स्टैटिस्टिक्स (डीजीसीआईएस) और प्रमुख जूलरी उद्योग संगठनों के आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन दशक में कीमतों में कई गुना की बढ़ोतरी के बावजूद भारत में सोने की कुल खरीद, उसके स्वरूप और कैरेट प्राथमिकताओं में उल्लेखनीय बदलाव आया है। बदलाव सिर्फ आभूषण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गोल्ड बिस्किट, कॉइन और निवेश-उन्मुख खरीद में भी दिखाई देता है।

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2005 से 2025 के बीच सोने की कीमतें 10 गुना बढ़ी 

आरबीआई एवं डब्ल्यूजीसी के संयुक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि 2005 से 2025 के बीच सोने की कीमतें 10 गुना बढ़ने के बावजूद भारत में उसकी प्रासंगिकता कम नहीं हुई। फर्क सिर्फ इतना आया है कि जूलरी आधारित बाजार धीरे-धीरे निवेश केंद्रित हो रहा है। डब्ल्यूजीसी के मुताबिक, 2005 में सोना करीब 430 डॉलर प्रति औंस था, जो 2025 में 4,300 डॉलर प्रति औंस के पार पहुंच गया। इसके बाद भी भारत में सोने की सालाना मांग औसतन 800 से 1,000 टन के बीच बनी रही। इस दशक में भारतीय बाजार में सोने की खरीद का बड़ा हिस्सा पारंपरिक आभूषणों का था। डीजीसीआईएस के आयात आंकड़ों के मुताबिक, सोने की कुल खपत में करीब 75-80 फीसदी हिस्सा आभूषणों का रहा। कैरेट के लिहाज से 22 कैरेट सोना सर्वाधिक लोकप्रिय रहा। विशेषकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, जहां इसे सांस्कृतिक एवं पारिवारिक संपत्ति के रूप में देखा जाता है। 24 कैरेट सोने की मांग सीमित रही और वह मुख्यतः सिक्कों या छोटे बिस्किट तक केंद्रित थी।

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ऐसे बदला खरीदारी का स्वरूप

तीन दशकों में सोने में तेज उछाल के बावजूद देश में सोने की मांग में गिरावट नहीं आई, बल्कि खरीदारी का स्वरूप बदल गया। डब्ल्यूजीसी के मुताबिक, इस अवधि में जूलरी की हिस्सेदारी घटकर 60-65 फीसदी रह गई, जबकि गोल्ड कॉइन और बिस्किट की मांग बढ़कर 25-30 फीसदी तक पहुंच गई।


यह बदलाव शहरी मध्य वर्ग और युवा निवेशकों में अधिक स्पष्ट रहा, जिन्होंने सोने को पहनने के बजाय मूल्य संरक्षण व निवेश के साधन के रूप में देखना शुरू किया। कैरेट प्राथमिकताओं में भी बदलाव आया। 22 कैरेट जूलरी का वर्चस्व बना रहा, लेकिन 18 कैरेट की मांग शहरी बाजारों में तेजी से बढ़ी। खासकर ब्रांडेड जूलरी और हीरे जड़े आभूषणों में।

कीमत-खरीद अनुपात: दो दशकों की तुलना

अगर 2005-2015 और 2015-2025 की तुलना की जाए, तो एक स्पष्ट रुझान सामने आता है। पहले दशक में कीमत बढ़ने के बावजूद कुल मांग अपेक्षाकृत स्थिर रही, क्योंकि सोना सामाजिक और सांस्कृतिक जरूरत से जुड़ा था। दूसरे दशक में कीमतों में और तेज वृद्धि के बावजूद मांग में सीमित गिरावट आई, जबकि निवेश उन्मुख खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

शीर्ष-5 खरीदार राज्य

डब्ल्यूजीसी, ऑल इंडिया जेम्स एंड जूलरी डोमेस्टिक काउंसिल और उद्योग संगठनों के क्षेत्रीय आकलन बताते हैं कि भारत में सोना खरीद के मामले में कुछ राज्य लगातार अग्रणी रहे हैं। तमिलनाडु देश का सबसे बड़ा स्वर्ण बाजार माना जाता है, जहां विवाह और धार्मिक परंपराओं में भारी मात्रा में सोने की खरीद होती है। इसके बाद महाराष्ट्र और केरल का स्थान है। कर्नाटक और गुजरात भी शीर्ष पांच में शामिल हैं। उत्तर भारत पिछड़ा हुआ है।

चांदी 2,600 रुपये महंगी

बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और मजबूत वैश्विक रुख के बीच सोमवार को दिल्ली सराफा बाजार में सोना 960 रुपये महंगा होकर 1,40,400 रुपये प्रति 10 ग्राम के भाव पहुंच गया। चांदी की कीमतों में भी 2,600 रुपये की भारी तेजी रही और यह 2.44 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पहुंच गई। मिरै एसेट शेयरखान के प्रमुख (जिंस) प्रवीण सिंह ने कहा, निकोलस मादुरो को हिरासत में लिए जाने के बाद वैश्विक बाजार में सोना 87.74 डॉलर चढ़कर 4,418.2 डॉलर के स्तर पर कारोबार कर रहा है।

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