Explainer: बाजार से विदेशी निवेशकों का मोहभंग? निकाले हजारों करोड़ रुपये, 10 सवालों के जवाब से समझें सबकुछ
क्या भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों का मोहभंग गया है? पश्चिम एशिया संकट के बीच बाजार का जो हाल है वह तो कुछ ऐसा ही बयां कर रहा है। लगातार तीसरे महीने विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय बाजार से हजारों करोड़ रुपये निकाल लिए हैं। विदेशी निवेशकों ने सिर्फ मई 2026 में भारतीय शेयर बाजार से 32,963 करोड़ रुपये निकाले हैं। क्या है पूरा माजरा? आसान भाषा में समझें 10 बड़े सवालों के जवाब।
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भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों (एफपीआई) की बिकवाली का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने मई 2026 में लगातार तीसरे महीने इक्विटी बाजार से भारी पूंजी निकाली है। भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक निवेश के बदलते रुख का असर दलाल स्ट्रीट पर साफ देखने को मिल रहा है। इस मौजूदा कारोबारी माहौल और बाजार की चाल को समझने के लिए, आइए इस विषय का 10 आसान सवालों और जवाबों के जरिए विश्लेषण करते हैं।
पश्चिम एशिया संकट के बीच बाजार की चाल से जुड़े 10 सबसे अहम सवाल और उनके जवाब
1. वैश्विक तनाव के बीच भारतीय बाजार में अभी ताजा हालात क्या हैं?
जवाब: नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने मई 2026 में भारतीय शेयर बाजार से 32,963 करोड़ रुपये की भारी-भरकम निकासी की है। इसके असर से इस वर्ष में अब तक सेंसेक्स में 12.5 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आ चुकी है। यह 86100 के ऊपरी स्तरों से फिसलकर 74,775के स्तर तक पहुंच गया है। इस दौरान निफ्टी में भी करीब 10 से 11 प्रतिशत की गिरावट आई है और यह अपने उच्चतम स्तर 26,373.20 से धड़ाम होकर 25,500 के स्तर पर पहुंच गया है।
2. क्या विदेशी निवेशकों का पैसा निकालने का यह ट्रेंड नया है?
जवाब: नहीं, यह इस साल 2026 का लगातार तीसरा महीना है जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार में नेट सेलर (शुद्ध रूप से बिकवाल) बने हुए हैं। विदेशी निवेशक या एफपीआई जैसे पेंशल फंड, हेज फंड और विदेशी म्यूचुअल फंड भारतीय बाजार में खास तौर पर शेयर और बॉन्ड में निवेश करते हैं। एफपीआई की ओर से बिकवाली का साफ मतलब है कि विदेशी निवेशक जिन्होंने कभाी भारतीय शेयरों पर भरोसा जताया था वे अब अपने पैसे निकालकर अपने देश या दूसरे बाजारों की ओर ले जा रहे हैं।
3. साल 2026 में अब तक विदेशी निवेशक कुल कितनी रकम निकाल चुके हैं?
जवाब: इस साल की शुरुआत से लेकर अब तक, विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार (इक्विटी) से कुल 2,24,932 करोड़ रुपये की पूंजी निकाली है। इस बिकवाली में पश्चिम एशिया संकट ने आग में घी का काम किया है। इससे पहले ही रूस यूक्रेन युद्ध और ट्रंप के टैरिफ प्रकरण के कारण विदेशी निवेशकों के बीच भारतीय बाजार को लेकर अनिश्चितता दिखी थी। हाल के महीनों में डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होकर 95 रुपये के पार चला गया। इसका असर भी विदेशी निवेशकों के रुझान पर पड़ा। यदि डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया कमजोर होता है, तो विदेशी निवेशकों को अपने मुनाफे पर नुकसान उठाना पड़ता है, इस कारण वे भारतीय बाजार से अपना पैसा निकालकर कहीं और निवेश करना बेहतर समझते हैं।
4. पिछले कुछ महीनों में विदेशी निवेश का आंकड़ा कैसा रहा है?
जवाब: एनएसडीएल के डेटा के अनुसार, मार्च में निवेशकों ने सबसे अधिक 1,17,775 करोड़ रुपये निकाले थे, जो इस साल का अब तक का सबसे बड़ा मासिक आउटफ्लो है। इसके बाद अप्रैल में भी 60,847 करोड़ रुपये निकाले गए। हालांकि, फरवरी में 22,615 करोड़ रुपये का निवेश आया था, लेकिन उससे पहले जनवरी में भी 35,962 करोड़ रुपये की बिकवाली हुई थी।
5. विदेशी निवेशकों के बाजार से पैसा निकालने की सबसे मुख्य वजह क्या है?
जवाब: बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी निवेशकों की इस बिकवाली का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में चल रहा भू-राजनीतिक तनाव है। अमेरिका और इस्राइल की ओर से ईरान पर हमला करने के बाद दुनिया के तेल कारोबार के लिए अहम होर्मुज जलडमरुमध्य बाधित हो गया। इसके असर से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल का भाव आसमान छूने लगा। विदेशी कच्चे तेल पर निर्भर भारत पर भी इस संकट का असर पड़ा। इससे डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो गया और विदेशी निवेशकों ने बिकवाली शुरू कर दी। इसके अलावे टैक्स हैवन देशों जैसे मॉरीशस, सिंगापुर, लक्जमबर्ग और आयरलैंड जैसे देशों के जरिए भारतीय बाजार में हिस्सा लेने वाले अनरेगुलेट फंड्स ने भी वैश्विक भू- राजनीति के बाधित होने के बाद भारतीय बाजार से पैसे निकालने शुरू कर दिए। सितंबर 2024 से अप्रैल 2026 तक के आंकड़ों की बात करें तो भारतीय बाजार में अमेरिकी निवेशकों अपने निवेश में करीब 10% की बिकवाली की है। इसके अलावे सिंगापुर के निवेशकों ने 29%, मॉरिशस के निवेशकों ने 26% और लक्जमबर्ग के निवेशकों ने भारतीय बाजार में अपनी हिस्सेदारी करीब 16% तक घटा दी है। हालांकि, सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि इसी दौरान जापान और फ्रांस ने भारत में मामूली निवेश बढ़ाया है।
6. पश्चिम एशिया के तनाव से भारत के शेयर बाजार पर क्या असर पड़ता है?
जवाब: पश्चिम एशिया के तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थीं। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा और तेल जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है, इसलिए महंगे तेल से भारत का आयात बिल बढ़ने और महंगाई में इजाफा होने की चिंता निवेशकों को सता रही है।
7. क्या वैश्विक निवेश के रुझान में भी कोई बदलाव आया है जिसका नुकसान भारत को हो रहा है?
जवाब: हां, बाजार के जानकारों का मानना है कि इन दिनों दुनियाभर के निवेशकों का पैसा उन क्षेत्रों में ज्यादा जा रहा है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पर आधारित निवेश चक्र का फायदा उठा रहे हैं। फिलहाल वैश्विक स्तर पर भारत को एक प्रमुख एआई केंद्रित बाजार के रूप में नहीं देखा जा रहा है, जिससे विदेशी फंड्स भारत के बजाय दूसरी जगह जा रहे हैं।
8. इन सबके बीच क्या भारतीय बाजार के लिए कोई राहत की खबर है?
जवाब: जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वीके विजयकुमार के मुताबिक कुछ सकारात्मक संकेत भी हैं। ब्रेंट क्रूड ऑयल का गिरकर 105 डॉलर से नीचे आना और भारतीय रुपये का 96.96 के स्तर से मजबूत होकर 96.20 के स्तर पर पहुंचना बाजार के लिए अच्छी खबरें हैं।
9. शेयर बाजार में इस समय ट्रेडिंग का क्या ट्रेंड दिख रहा है?
जवाब: वीके विजयकुमार के अनुसार, इस समय बाजार में 'डिप्स पर खरीदारी और रैली में बिकवाली' का ट्रेंड चल रहा है, जिसे रिटेल निवेशकों को बेहद सावधानी से हैंडल करना होगा।
10. लार्जकैप बनाम स्मॉलकैप शेयरों में कैसा प्रदर्शन दिख रहा है?
जवाब: बड़ी कंपनियों (लार्जकैप) के शेयरों का वैल्युएशन सस्ता होने के बावजूद वहां विदेशी निवेशकों की बिकवाली का भारी दबाव है। वहीं इसके उलट, अच्छे नतीजे और मजबूत ग्रोथ का अनुमान देने वाली छोटी और मंझोली कंपनियों में निवेशकों की दिलचस्पी बनी हुई है और वहां मोमेंटम नजर आ रहा है।
कुल मिलाकर, कच्चे तेल की कीमतों में आई हल्की गिरावट और रुपये की रिकवरी से भारतीय अर्थव्यवस्था को तात्कालिक राहत मिली है, लेकिन विदेशी निवेशकों का 'सेल-ऑफ' चिंता का विषय है। जब तक विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजार में दोबारा खरीदारी शुरू नहीं करते, तब तक लार्जकैप और मिडकैप के बीच प्रदर्शन का यह अंतर बने रहने की संभावना है। ऐसे में निवेशकों के लिए सही रणनीति और सतर्कता ही मुनाफे की कुंजी है।