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दवाओं के भ्रामक विज्ञापन पर लग सकता है 10 लाख का जुर्माना

Wed, 15 Jan 2020 06:31 PM IST
paliwal पालीवाल बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला Published by: paliwal पालीवाल Updated Wed, 15 Jan 2020 06:31 PM IST
सार

  • भ्रामक विज्ञापन देकर प्रचार करने वाली दवा कंपनियों पर सख्ती बरतने की तैयारी 
  • दो साल तक की जेल हो सकती है भ्रामक विज्ञापन देने पर
  • दोबारा अपराध पर 50 लाख जुर्माना और पांच साल तक की जेल

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false advertisement on medicine will land you in jail and fine of 10 lakh rupees

विस्तार

सरकार दवाओं के असर के बारे में भ्रामक विज्ञापन देकर प्रचार करने वाली दवा कंपनियों या व्यक्तियों पर सख्ती बरतने की तैयारी में है। ऐसा करने वाली कंपनियों और व्यक्तियों को भारी जुर्माना और जेल की सजा हो सकती है। ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (ऑब्जेक्शनेबल एडवर्टाइजमेंट) एक्ट-1954 के प्रस्तावित संशोधन के मुताबिक, भ्रामक विज्ञापन देने से जुड़े अपराध में पहली बार दोषी पाए जाने पर 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का भुगतान करना होगा और दो साल जेल की भी सजा होगी। 

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इसके तहत, दोबारा या उसके बाद ऐसा अपराध करने वाले दोषियों पर जुर्माने की राशि को बढ़कर 50 लाख रुपये किया जा सकता है। साथ ही जेल की सजा भी बढ़ाकर पांच साल तक हो सकती है। प्रस्तावित संशोधन के मुताबिक, एक्ट का दायरा बढ़ाकर डिजिटल एडवर्टाइजिंग, नोटिस, सुर्कलर, लेबल, रैपर, इनवॉइस, बैनर और पोस्टर समेत दूसरे माध्यमों को इसके दायरे में लाया जाएगा। फिलहाल पहली बार गलत दावा करने पर छह महीने तक की जेल या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। इसके बाद दोबारा या कितनी भी बार गलत दावा करने पर एक साल तक अधिकतम जेल या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।

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समिति ने दिया भारी जुर्माने का प्रस्ताव

भ्रामक विज्ञापन के जरिए दवाओं की गलत जानकारी देने वाली दवा कंपनियों पर लगाम कसने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक समिति गठित की थी। इसका उद्देश्य ऐसी कंपनियों और व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज कराने, भारी जुर्माना लगाने और उनके शीर्ष मैनेजरों को जेल भेजने के लिए मौजूदा कानूनों में संशोधनों की सिफारिश करना था। कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करने वालों पर भारी जुर्माना लगाने का प्रस्ताव दिया गया है।

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कानून के दायरे में आएं टीवी-इंटरनेट

समिति के एक सदस्य ने एडवर्टाइजमेंट की परिभाषा को भी कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के मुताबिक बदलने का प्रस्ताव दिया है। मौजूदा कानून सिर्फ अखबारों में स्वास्थ्य से जुड़े गलत दावे देने पर रोक लगाते हैं, जबकि टीवी या इंटरनेट पर गलत दावों की समस्या से निपटने के लिए इनमें कोई प्रावधान नहीं हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में लोगों तक टीवी और इंटरनेट की पहुंच को देखते हुए इन दोनों माध्यमों पर भ्रामक विज्ञापन के जरिए प्रचार करने पर पाबंदी लगाई जानी चाहिए।  

प्रस्तावित संशोधन में हैं ये बातें 

प्रस्तावित संशोधन में कहा गया है कि विज्ञापन का अर्थ लाइट, साउंड, स्मोक, गैस, प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, इंटरनेट या वेबसाइट के जरिए किया गया कोई भी ऑडियो या विजुअल प्रचार, नुमाइंदगी, समर्थन और एलान होगा। इसमें नोटिस, सर्कुलर, लेबल, रैपर, इनवॉइस, बैनर, पोस्टर या ऐसे दूसरे दस्तावेज जैसे माध्यम भी शामिल हैं। संशोधन में अच्छी भावना के साथ की गई कार्रवाई को कानूनी प्रक्रियाओं से बचाने के लिए भी एक प्रावधान शामिल किया गया है। 

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