त्योहारी सीजन में बिजली की मांग 13 फीसदी गिरी, आर्थिक सुस्ती बनी बड़ी वजह
- त्योहारी सीजन में मांग कम रहने से आर्थिक सुस्ती गहराने के संकेत
- 13.2 फीसदी घटी अक्तूबर में भारत में घटी बिजली की मांग
- महाराष्ट्र और गुजरात जैसे औद्योगिक राज्यों पर सबसे ज्यादा असर
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भारत में एक बार फिर आर्थिक सुस्ती गहराने के संकेत मिले हैं। दरअसल अक्तूबर महीने में एक साल पहले के समान महीने की तुलना में बिजली की मांग में 13.2 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई, जो पिछले लगभग 12 साल में सबसे बड़ी गिरावट है। यह आंकड़ा इसलिए भी दिलचस्प है, क्योंकि त्योहारी सीजन में यह गिरावट देखने को मिली है जब ज्यादा मांग की उम्मीद की जाती है।
वर्तमान में अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए एशिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था भारत को बिजली की खासी जरूरत है, लेकिन बिजली की खपत में यह गिरावट देश की आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती की ओर इशारा करती है। इससे सरकार की 2024 तक भारत को 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था में तब्दील करने की योजना को झटका लग सकता है।
इससे पहले उपभोक्ता मांग में कमी और सरकारी खर्च में सुस्ती के चलते अप्रैल-जून तिमाही में भारत की जीडीपी विकास दर छह साल के निचले स्तर पर पहुंच गई और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि बिजली की मांग में कमी से सुस्ती बढ़ने के संकेत मिलते हैं।
राष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त और नीति संस्थान में प्रोफेसर एन आर भानुमूर्ति ने कहा, ‘विशेषकर औद्योगिक क्षेत्र में सुस्ती की जड़ें गहरी दिखती हैं। इससे चालू वित्त वर्ष के दौरान विकास की संभावनाओं को लेकर निश्चित रूप से चिंताएं बढ़ेंगी।’
महाराष्ट्र जैसे औद्योगिक राज्यों में सबसे ज्यादा घटी मांग
बिजली की मांग में सबसे ज्यादा कमी महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में देखने को मिली। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले महीने महाराष्ट्र में मांग में 22.4 फीसदी और गुजरात में 18.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। देश के उत्तर और पूर्वी हिस्से के चार छोटे राज्यों को छोड़ दें तो लगभग सभी क्षेत्रों में मांग में गिरावट रही।
14 साल के निचले स्तर पर आईआईपी
इससे पहले सितंबर में भारत के औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) में लगभग 5.2 फीसदी की कमी दर्ज की गई, जो लगभग 14 साल में सबसे बड़ी गिरावट थी। इससे कई कदम उठाए जाने के बावजूद मांग नहीं बढ़ने को लेकर सरकार की चिंताएं खासी बढ़ गई थीं। वहीं भारत में ईंधन की मांग बीते छह साल के निचले स्तर पर है, जिसे अर्थशास्त्री आर्थिक संकेतक के रूप में देखते रहे हैं।
अर्थशास्त्रियों ने कहा कि उपभोक्ता मांग और निवेश में कमी के चलते भारत की जीडीपी विकास दर 5.8 फीसदी रह सकती है। रिजर्व बैंक (आरबीआई) पिछले महीने ही मार्च, 2020 में समाप्त वित्त वर्ष के लिए अपने विकास अनुमान को 80 आधार अंक घटाकर 6.1 फीसदी कर चुका है।
तमाम क्षेत्रों पर सुस्ती की मार
आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती का असर कारों से लेकर बिस्किट तक की बिक्री पर दिख रहा है। कई उद्योगों में बड़े स्तर पर छंटनी पर काम हो रहा है। उदाहरण के लिए, भारत का वाहन क्षेत्र बिक्री में कमी के चलते हजारों लोगों को नौकरी से निकाल चुका है। एन आर भानुमूर्ति ने कहा, ‘अब हम चालू वित्त वर्ष में विकास दर 6 फीसदी से कम रहने की बात कर रहे हैं।’