Budget 2023: क्या इस आपदा को 'अवसर' बना सकेगी सरकार? बजट पर टिकीं देश की निगाहें
Budget 2023: आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि देश पर कर्ज बेहिसाब बढ़ता जा रहा है। यह देश की कुल जीडीपी का 89 फीसदी हो चुका है। विभिन्न राज्यों द्वारा विभिन्न संस्थाओं से लिया गया कर्ज भी जीडीपी का लगभग 4.77 फीसदी (ऑफ बजट कर्ज) हो चुका है...
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केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एक फरवरी को देश का बजट (Budget 2023) पेश करेंगी। उनके सामने दुनिया की सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था के बीच देश की आर्थिक गति बनाए रखने की चुनौती है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के बजट पूर्व भाषण में जिस तरह किसानों, महिलाओं और समाज के वंचित, पिछड़े वर्गों को आगे बढ़ाने की बात कही गई है, उससे यह भी स्पष्ट है कि सरकार सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के विकास पर अपना ध्यान केंद्रित रखेगी। अगले आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए सरकार लोकलुभावन योजनाओं को भी जारी रखने की कोशिश कर सकती है। लेकिन सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि सुस्त होती अर्थव्यवस्था में उसकी आय कम हो सकती है। ऐसे में निर्मला सीतारमण देश की उम्मीदों पर कैसे खरी उतरेंगी?
सरकार की आय के प्रमुख साधन जीएसटी के रूप में प्राप्त टैक्स, आयकर, विभिन्न सेवाओं पर लाइसेंस फीस और अन्य टैक्स, विनिवेश और देश-विदेश की संस्थाओं से कर्ज लेना शामिल होता है। पिछले छह महीने से ज्यादा समय से जीएसटी का कुल संग्रह एक लाख करोड़ रुपये से पार रहा है। आगे भी इसके बढ़ते रहने की संभावना है। टेलीकॉम क्षेत्र के लाइसेंस क्षेत्र से भी सरकार को बड़ी राशि मिलने की उम्मीद है। विनिवेश के क्षेत्र में सरकार के प्रयास के बाद भी अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है।
विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से कर्ज लेना सरकार के पास आय का अंतिम बड़ा साधन है, लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि देश पर कर्ज बेहिसाब बढ़ता जा रहा है। यह देश की कुल जीडीपी का 89 फीसदी हो चुका है। विभिन्न राज्यों द्वारा विभिन्न संस्थाओं से लिया गया कर्ज भी जीडीपी का लगभग 4.77 फीसदी (ऑफ बजट कर्ज) हो चुका है। इस प्रकार देश पर इसकी जीडीपी का लगभग 94 फीसदी कर्ज हो चुका है।
विश्व बैंक के मानकों के अनुसार किसी देश की जीडीपी के 77 फीसदी से अधिक कर्ज होने को अर्थव्यवस्था की दृष्टि से सही नहीं माना जाता है। अपनी जीडीपी का लगभग 125 फीसदी कर्ज लेकर श्रीलंका आर्थिक तौर पर तबाह हो चुका है। भारत के पास जापान जैसी निवेश की विश्वसनीयता, सस्ता कर्ज पाने की शक्ति हासिल नहीं है, जो उसे जीडीपी के 200 फीसदी से भी ज्यादा कर्ज हो जाने के बाद भी बचाकर रख सके। उसकी मुद्रा भी अमेरिका के डॉलर जैसी मजबूत नहीं है जो उसे कर्ज के जाल से बचा सके।
जापान को केवल 0.25-0.50 फीसदी तक की दर पर कर्ज मिल जाता है, जबकि भारत के लिए यही कर्ज 6-7 प्रतिशत तक हो जाता है। डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती कीमत से इसी कर्ज को बाद में चुकाने पर और भारी राशि का भुगतान करना पड़ता है। इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। आज सरकार को कुल आय का लगभग 43 फीसदी हिस्सा पुरानी देनदारी को चुकाने में निकल जाता है। यदि कर्ज लेना जारी रहा तो इस हिस्सेदारी में और ज्यादा बढ़ोतरी होगी, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगी। यही कारण है कि आर्थिक विशेषज्ञों की सलाह है कि भारत को इस तरह के कर्ज के जाल में फंसने से बचना चाहिए।
मूलभूत ढांचे में निवेश बढ़ाए सरकार
आर्थिक मामलों के जानकार डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि दुनिया की सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था के बीच भारत का निर्यात कमजोर पड़ने की संभावना है। पिछले कुछ महीनों के आंकड़े भी इस तरफ इशारा कर रहे हैं। लेकिन चीन के कोरोना संक्रमण के जाल में फंसने से उसकी अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। वह दुनिया को अपेक्षित निर्यात करने में बुरी तरह असफल साबित हो रहा है। निर्माण से लेकर लॉजिस्टिक्स तक के क्षेत्र में उसके सामने परेशानियां पैदा हुई हैं।
भारत के सामने अवसर है कि वह आगे बढ़कर दुनिया के निर्यात बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाए। यह हिस्सेदारी खाद्य पदार्थों, प्रसंस्कृत उत्पादों, कपड़ा-मशीनों और सेवाओं के क्षेत्र में हो सकती है। अपनी आर्थिक रफ्तार बनाए रखने के लिए सरकार को मूलभूत ढांचे के निर्माण में लगातार भारी निवेश जारी रखना चाहिए। इससे लोहा, स्टील, पेंट, सीमेंट, परिवहन के साथ लगभग पचास क्षेत्रों के उद्योंगों को रफ्तार मिलेगी। यह देश में रोजगार बढ़ाने वाला कदम साबित होगा, जो सरकार की सबसे बड़ी चुनौती बनती दिख रही है। इससे एफएमसीजी उत्पादों की मांग में भी बढ़ोतरी होगी, जो पूरी अर्थव्यवस्था के चक्र को घुमाने में मददगार होगी। आईएमएफ के नए अनुमानों में देश में महंगाई दर में लगातार कमी आने की संभावना जताई गई है। इससे भी स्थिति से निपटने में मदद मिलेगी।
निवेश हेतु अनुकूल नीतियां बनाए सरकार
डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि इस समय दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में, विशेषकर आईटी सेक्टर में छंटनी हो रही है। अकेले भारत के एक लाख के करीब युवा इससे प्रभावित हो सकते हैं। इससे सरकार के सामने इन युवाओं को भी रोजगार उपलब्ध कराने की चुनौती बढ़ेगी तो विदेशी मुद्रा के रूप में होने वाली देश की आय भी प्रभावित होगी।
लेकिन सरकार को इस अवसर को अपनी ताकत बनाने पर विचार करना चाहिए। बेहतर निवेश नीति बनाकर दुनिया की दिग्गज आईटी कंपनियों को भारत में आईटी सेवाओं के उत्पादन को प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे इन युवाओं को रोजगार के अवसर मिलने के साथ घरेलू स्तर पर आईटी के सेक्टर को मजबूती दी जा सकेगी। हमें ध्यान रखना चाहिए कि आईटी सेक्टर की बड़ी ताकत बनने के बाद भी अभी तक हम केवल आईटी पेशेवरों के निर्यात तक ही सीमित रह गए हैं। यदि भारत को अपने यहां गूगल, फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसी बड़ी कंपनियां बनाने की शक्ति हासिल करनी है, तो उसे इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए।