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Hindi News ›   Business ›   Business Diary ›   Berger Paints India Ltd. CEO Abhijit Roy interview

साक्षात्कार: बर्जर पेंट्स के सीईओ से खास-बातचीत, पेंट इंडस्ट्री में तो असफल हो गईं बहुराष्ट्रीय कंपनियां

Mon, 13 Feb 2023 05:28 AM IST
संजय अभिज्ञान संजय अभिज्ञान
Updated Mon, 13 Feb 2023 05:28 AM IST
सार

कोलकाता में बर्जर हाउस स्थित कंपनी के मुख्यालय में वरिष्ठ पत्रकार संजय अभिज्ञान की अभिजीत रॉय से खास बातचीत के कुछ अंश...

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Berger Paints India Ltd. CEO Abhijit Roy interview
बर्जर पेंट्स इंडिया लिमिटेड के प्रबंध निदेशक व सीईओ अभिजीत रॉय। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

10,000 करोड़ सालाना कारोबार की दहलीज पर खड़ी बर्जर पेंट्स इंडिया लिमिटेड आगामी दिसंबर में अपनी सौवीं सालगिरह मनाने जा रही है। देश की इस दूसरी सबसे बड़ी पेंट कंपनी के प्रबंध निदेशक व सीईओ अभिजीत रॉय बता रहे हैं कि देसी कंपनियों ने इस इंडस्ट्री में मल्टीनेशनल कंपनियों को कैसे बहुत पीछे छोड़ दिया। साथ ही, किस तरह ई-कॉमर्स से लगभग अछूता रहने के बावजूद रंग-रोगन उद्योग तरक्की कर रहा है। कोलकाता में बर्जर हाउस स्थित कंपनी के मुख्यालय में वरिष्ठ पत्रकार संजय अभिज्ञान की अभिजीत रॉय से खास बातचीत के कुछ अंश...

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देश की दूसरी सबसे बड़ी पेंट कंपनी अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर उपभोक्ताओं और शेयरधारकों को क्या तोहफे देने जा रही है?
तोहफे तो मिलेंगे। उपभोक्ताओं के लिए नए उत्पाद आएंगे। शेयरधारकों को भी फायदा मिलेगा। पर, यह जरूर है कि बड़ा लंबा और रोचक सफर रहा। दिसंबर, 1923 में हैडफील्ड्स के नाम से स्थापित हमारी कंपनी का पहला संयंत्र हावड़ा के पास शिवपुर में लगा था। फिर कई पड़ाव आए। इसका नाम ब्रिटिश पेंट्स हुआ। कंपनी विजय माल्या के पास गई। बाद में 1990 के आसपास कंपनी का नियंत्रण इसके मौजूदा स्वामी ढींगरा परिवार के हाथ आया। आज बर्जर पेंट्स भारत की दूसरी, एशिया की चौथी व दुनिया की सातवीं बड़ी पेंट कंपनी है।
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पेंट उद्योग में शीर्ष तीन पर देसी कंपनियां हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां क्यों पीछे रह गईं?
पेंट उद्योग ही नहीं, बिल्डिंग मैटीरियल के सभी सेगमेंट में बहुराष्ट्रीय कंपनियां पीछे हैं। यह घटना पिछले एक दशक में ही घटी है। वजह यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारतीय ग्राहकों के मिजाज एवं कीमतों को लेकर उनकी संवेदनशीलता और व्यवहार को ठीक से भांपने में असफल रहीं। देसी खिलाड़ी इनका सही अंदाजा लगा लेते हैं। विदेशियों से तो फैक्टरियों में लेबर तक नहीं संभाली जाती। जापान की कनसाई, अमेरिका की शरविन विलियम्स या नीदरलैंड की एग्जोनोबल की बात करें तो भारत में हैं सब मौजूद, लेकिन कोई मार्केट लीडर नहीं बन पाई।

एशियन पेंट 40 फीसदी के साथ नंबर-1 है, जबकि बर्जर पेंट्स का बाजार हिस्सा सिर्फ 20 फीसदी है। इतना अंतर क्यों?
हम घरेलू रंग-रोगन सेगमेंट में देर से आए। 30 साल पहले तक कंपनी औद्योगिक उपयोग के रंग-रोगन बनाती थी। हमने अपना फोकस 1990 के बाद बदला और घरेलू पेंट श्रेणी पर जोर दिया, जबकि एशियन पेंट का 60 के दशक से ही इस पर फोकस था। एक और बात, देश में कई पॉकेट्स ऐसी हैं, जहां बर्जर सबसे ज्यादा बिकता है। दूसरी कंपनी उसे वहां से हिला नहीं पा रही। एक मिसाल देखें। लखनऊ के बाजार में 25 साल से बर्जर पेंट्स लीडर है। एशियन पेंट्स हमें वहां हिला नहीं पाती, जबकि कानपुर में एशियन पेंट सबसे ज्यादा बिकता है। उधर, बांग्लादेश में बर्जर का कारोबार एशियन पेंट के मुकाबले चार गुना ज्यादा होगा।

बर्जर पेंट्स की सालाना बिक्री 9,000 करोड़ है। क्या शताब्दी वर्ष में 10,000 करोड़ का बेंचमार्क छू पाएगी?
खुशखबरी देना चाहूंगा कि शताब्दी वर्ष शुरू होने से पहले ही हम 10,000 करोड़ का लक्ष्य पा लेंगे। मार्च अंत तक ही ऐसा हो जाएगा। अप्रैल से आरंभ होने वाले शताब्दी वर्ष में अगली मंजिल का सफर शुरू होगा।

लेकिन, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को चलाने वाली वर्कफोर्स तो देसी ही होती है?
मैनपावर देसी है, लेकिन नियंत्रण तो विदेशी है। हिंदुस्तान के मसले विदेशियों की समझ में आसानी से नहीं आते। इसलिए, वे मैदान छोड़कर भाग खडे़ होते हैं। दो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के संयंत्र तो बर्जर इंडिया ने ही टेकओवर किए हैं। शरविन विलियम्स ने निटको नाम की कंपनी खरीदी थी। आठ साल चलाने की असफल कोशिश के बाद वह अपना घरेलू पेंट बिजनेस हमें बेच गई। एम्सटर्डम की कंपनी एग्जोनोबल का पश्चिम बंगाल के रिशरा क्षेत्र में 1,200 टन क्षमता का संयंत्र था। वह लेबर के मसले नहीं संभाल पाई और हमें बेच दिया। हमने उसकी वर्कफोर्स का प्रयोग करते हुए मशीनरी में मामूली निवेश के बाद उत्पादन क्षमता बढ़ाकर 6,000 टन कर दी। फर्क प्रबंधन की गुणवत्ता का है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लेकर कोई हीनभावना नहीं होनी चाहिए। हम उनसे बहुत बेहतर काम कर सकते हैं, यह पेंट उद्योग ने साबित कर दिया है।

बर्जर का 80 फीसदी उत्पादन घरेलू रंग-रोगन और 20 फीसदी औद्योगिक पेंट श्रेणी में है। क्या यह अनुपात सामान्य है? देश-विदेश में यह अनुपात कितना होता है?
यह मुल्क पर निर्भर करता है। चीन में पेंट कंपनियां 50-50 के अनुपात में उत्पादन करती हैं। यूरोप में यह 60-40 है। यानी 60 फीसदी घरेलू पेंट श्रेणी और बाकी औद्योगिक उत्पादों की। हमारे देश का औद्योगिक विकास अपेक्षाकृत कम है, इसलिए औद्योगिक कोटिंग या पेंट उत्पादों की मांग कम है। बर्जर पेंट्स उद्योगों में इस्तेमाल रंग-रोगन बनाने वाला नंबर-1 उत्पादक रहा है। आज मोबाइल, कार, चश्मा जैसे हजारों उत्पादों पर प्रोटेक्टिव कोटिंग होती है। इसलिए, हमारी औद्योगिक पेंट रेंज ज्यादा विविध है। मानता हूं कि हमारा उत्पादन रेश्यो निकट भविष्य में 80-20 ही रहेगा।

औद्योगिक पेंट की रेंज ज्यादा विविध क्यों है? इसे और स्पष्ट करेंगे?
उत्पाद और कारखाने की मांग के हिसाब से पेंट बनाना होता है। उसमें रिसर्च भी चाहिए। मसलन, एक पेंट ऐसा है, जिसे कारखानों की दीवारों और बाहरी हिस्सों पर किया जाए तो 35% तक कम बिजली खपत होती है। यह कमाल की कुचालकता वाला इंसुलेशन पेंट है। दूसरा पेंट ऐसा है, जिसे सड़कों पर बिछाया जाए तो ऊर्जा उत्पादन करता है। ऐसा पेंट भी है, जो पुलों की सतह से पानी की एक बूंद तक नहीं पार होने देता है। एक-से-एक गुणों वाली संरक्षक परत नए दौर के पेंट निर्माता दे रहे हैं।

लेकिन, मौजूदा वित्तवर्ष की तीसरी तिमाही तो घाटे की खबर देकर गई है?
तिमाही घाटे की वजह दूसरी थीं। 2021-22 की तीसरी तिमाही की वृद्धि दर बहुत ज्यादा 24 फीसदी थी। पहला, बहुत उच्च आधार से आगे बढ़ना था। दूसरा, इस बार दिवाली का सीजन बहुत छोटा रहा क्योंकि यह त्योहार अक्तूबर में ही आ गया। तीसरा, इंद्रदेव कुपित थे। बारिश का सीजन लंबा खिंच गया। इससे कई इलाकों में रंगाई-पुताई देर से शुरू हुई। हालांकि, इस दौरान कच्चे माल के दाम गिरे, लेकिन उसका लाभ हम नहीं उठा सके क्योंकि पुराना स्टॉक अधिक दाम वाला था। याद दिलाना चाहूंगा कि तीसरी तिमाही में ओवरआल बिक्री में सर्वाधिक वृद्धि दर बर्जर पेंट्स की थी।


ऑफलाइन वितरण तंत्र कितना फैल चुका है?
बर्जर के कोई 35,000 वितरक देशभर में हैं। स्टॉक रखने के सेंटर 140 हो चुके हैं।

पेंट इंडस्ट्री प्रदूषणकारी रसायनों के प्रयोग के लिए बदनाम रही है। बर्जर के कारखाने कितने पर्यावरण अनुकूल हैं?
हमारे सारे कारखाने शून्य तरल कचरा सिद्धांत पर चलते हैं। वे सब सीआईआई के ग्रीन प्रोडक्शन सर्टिफिकेट अपने पास रखते हैं। लेड, क्रोम, मरकरी जैसे रसायन प्रयोग नहीं करते। सभी संयंत्र सौर ऊर्जा से चलते हैं। सीजनल उत्पादन के दबाव में ही ग्रिड की बिजली का इस्तेमाल करते हैं। कारखानों में एटिक तकनीक के पेंट लगते हैं, जो 35 फीसदी तक बिजली बचाते हैं।

क्या रंग-रोगन के ग्राहकों की पसंद राज्यों के हिसाब से बदलती है?
कलर शेड और पेंट की नेचर...दोनों के चयन पर असर पड़ता है। यूपी, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा और मध्यप्रदेश जैसे हिंदी बेल्ट के राज्यों में हल्के रंग, पेस्टल शेड पसंद किए जाते हैं। पूर्वी राज्यों जैसे प. बंगाल, नॉर्थ ईस्ट में ब्राइट कलर और रंग-बिरंगे कॉम्बिनेशन चलते हैं। बाहरी दीवारो ंपर काई जमने के कारण अधिक वर्षा वाले उत्तर पूर्व राज्यों या उत्तर भारत के पहाड़ी राज्यों में बेहतर क्वालिटी की मांग होती है। अपेक्षाकृत सूखे इलाकों वाले राज्यों में इनकी मांग कम होती है।

कंपनी के नवनिर्मित लखनऊ प्लांट के बारे में कोई ताजा जानकारी?
वहां उत्पादन इसी सप्ताह शुरू हो रहा है। यह हमारा अब तक का सबसे बड़ा और सबसे आधुनिक संयंत्र है। यह हमारी मौजूदा वार्षिक उत्पादन क्षमता 62,000 टन को बढ़ाकर सीधे 95,000 टन कर देगा। हम 1,000 करोड़ का निवेश लखनऊ में कर रहे हैं। हमारा लगभग हर तरह का उत्पाद वहां तैयार होगा। एक अहम पहलू यह कि उसमें कलर-स्टेनर का एक यूनिट ऐसा होगा, जिसे केवल महिलाएं ही संभालेंगी। वह पूरी तरह मातृशक्ति को समर्पित होगा।

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