फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Business ›   Bonus ›   Will Tata Sons undergo restructuring to avoid listing Noel Tata proposes splitting company what happens next

लिस्टिंग से बचने के लिए टाटा संस में होगा फेरबदल?: नोएल ने रखा कंपनी बांटने का प्रस्ताव, आगे क्या होगा?

Wed, 23 Sep 2026 06:58 AM IST
प्रशांत तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: प्रशांत तिवारी Updated Wed, 23 Sep 2026 06:58 AM IST
सार

टाटा संस की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग को लेकर टाटा समूह में अंदरूनी मतभेद गहरा गए हैं। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में टाटा संस को कई अलग-अलग इकाइयों में बांटने का प्रस्ताव रखा, जिसे लिस्टिंग टालने के संभावित विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। 

विज्ञापन
Will Tata Sons undergo restructuring to avoid listing Noel Tata proposes splitting company what happens next
नोएल टाटा - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

देश के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में शामिल टाटा समूह में अंदरूनी स्तर पर खींचतान बढ़ती दिखाई दे रही है। होल्डिंग कंपनी टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने को लेकर जहां शीर्ष स्तर पर मतभेद सामने आ रहे हैं, वहीं टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा लिस्टिंग से बचने के लिए दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने टाटा संस को कई अलग-अलग इकाइयों में बांटकर उसका पुनर्गठन करने का प्रस्ताव रखा है।
विज्ञापन


आरबीआई के फैसले के बाद बढ़ा लिस्टिंग का दबाव
आरबीआई की ओर से टाटा संस का पंजीकरण रद्द करने का आवेदन खारिज किए जाने के बाद कंपनी के शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की संभावना काफी बढ़ गई है। हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा इसके पक्ष में नहीं हैं। 17 सितंबर को हुई टाटा संस की बोर्ड बैठक में उन्होंने कंपनी का पुनर्गठन कर उसे कई अलग-अलग इकाइयों में बांटने का प्रस्ताव रखा। माना जा रहा है कि इस रास्ते से कंपनी की लिस्टिंग की जरूरत को टालने की कोशिश की जा सकती है।
विज्ञापन


बोर्ड में प्रस्ताव पर नहीं बनी सहमति
नोएल टाटा के इस प्रस्ताव के बाद बोर्ड के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए। नोएल ने एन चंद्रशेखरन को कार्यकारी चेयरमैन के तौर पर दोबारा नियुक्त करने और लिस्टिंग की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का भी विरोध किया। दूसरी ओर, बोर्ड के अधिकांश सदस्यों ने इन प्रस्तावों का समर्थन किया। टाटा संस में 18.37 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाला शापूरजी पलोनजी (एसपी) ग्रुप कंपनी की सार्वजनिक लिस्टिंग के पक्ष में है। इसकी एक बड़ी वजह उसकी वित्तीय जरूरतें और कर्ज चुकाने का दबाव है।
विज्ञापन
विज्ञापन


जमीन पर बेहद पेचीदा है कंपनी का बंटवारा
विशेषज्ञों के मुताबिक, टाटा संस को कई हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव सुनने में भले ही एक विकल्प लगता हो, लेकिन इसे लागू करना आसान नहीं होगा। कैटलिस्ट एडवाइजर्स के केतन दलाल के अनुसार, टाटा संस के विशाल आकार को देखते हुए ऐसे किसी भी पुनर्गठन में कई तरह की नियामकीय, कारोबारी और टैक्स से जुड़ी जटिलताएं सामने आ सकती हैं। अगर इस कदम को आरबीआई के नियमों या पंजीकरण रद्द न करने के फैसले से बचने की कोशिश के तौर पर देखा गया, तो केंद्रीय बैंक से मंजूरी हासिल करना भी मुश्किल हो सकता है।

चार बोर्ड बैठकों में धीरे-धीरे बढ़ता गया विवाद
टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच शीर्ष नेतृत्व और एन चंद्रशेखरन के कार्यकाल को लेकर विवाद अचानक नहीं उठा। पिछले कुछ महीनों में हुई बोर्ड बैठकों के दौरान मतभेद लगातार गहराते गए।

24 फरवरी: चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल पर चर्चा होनी थी। लेकिन नोएल टाटा ने एयर इंडिया और टाटा डिजिटल जैसे कारोबारों में हुए भारी घाटे का हवाला देते हुए आपत्ति जताई। इसके बाद फैसला टाल दिया गया।
26 मई और 12 जून: इन बैठकों में नए कारोबारों की संशोधित योजनाओं पर चर्चा हुई, लेकिन किसी साझा निष्कर्ष पर सहमति नहीं बन सकी। 12 अगस्त को चंद्रशेखरन ने कहा कि वह तीसरा कार्यकाल नहीं चाहते।
3 सितंबर: चंद्रशेखरन ने 12 अगस्त के अपने फैसले को बदलने की कोशिश की। बोर्ड ने उनसे अपने निर्णय पर दोबारा विचार करने को कहा।
17 सितंबर: इस बैठक में विवाद खुलकर सामने आया और बोर्ड ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को मंजूरी दे दी।

4-1 के फैसले ने खोल दिया कॉर्पोरेट नियंत्रण का पेच
17 सितंबर की बैठक में टाटा संस के बोर्ड ने 4-1 के बहुमत से दो अहम प्रस्तावों को मंजूरी दी। पहला, एन चंद्रशेखरन को पांच साल का नया कार्यकाल देना और दूसरा, आरबीआई के लिस्टिंग नियमों के अनुपालन की दिशा में आगे बढ़ना। दोनों मामलों में नोएल टाटा ने असहमति जताई। वहीं दूसरे नॉमिनी निदेशक वेणु श्रीनिवासन और अन्य निदेशकों ने प्रस्तावों का समर्थन किया। अब विवाद का एक अहम कानूनी पहलू टाटा संस के आर्टिकल 121 से जुड़ गया है। सवाल यह है कि क्या इस प्रावधान के तहत कुछ फैसलों के लिए टाटा ट्रस्ट्स के दोनों नॉमिनी निदेशकों का सकारात्मक बहुमत जरूरी है।

आर्टिकल 121 या चेयरमैन का कास्टिंग वोट, असली लड़ाई यहीं
मामले का सबसे पेचीदा सवाल यह है कि अगर ट्रस्ट्स के दोनों नॉमिनी निदेशकों में किसी प्रस्ताव पर बराबर मत बंट जाएं, तो क्या चेयरमैन का निर्णायक यानी कास्टिंग वोट उस स्थिति को बदल सकता है? बोर्ड का पक्ष है कि दोनों नॉमिनी निदेशकों के बीच 1-1 की बराबरी होने के बाद चेयरमैन ने अपने कास्टिंग वोट का इस्तेमाल कर प्रस्ताव को मंजूरी दिलाई। दूसरी तरफ, ट्रस्ट्स का तर्क है कि आर्टिकल 121 में दिया गया प्रावधान पहले से तय शर्त है। उनके मुताबिक, जब दोनों नॉमिनी निदेशकों में से सिर्फ एक ने प्रस्ताव का समर्थन किया, तो जरूरी बहुमत नहीं मिला और प्रस्ताव वहीं खारिज माना जाना चाहिए था।

टाटा संस विवाद ने कॉर्पोरेट गवर्नेंस का बड़ा सवाल उठाया
यह पूरा विवाद सिर्फ टाटा संस तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे कंपनियों में कॉर्पोरेट नियंत्रण और गवर्नेंस से जुड़े कई अहम सवाल भी सामने आते हैं। भारत में किसी कंपनी पर नियंत्रण केवल शेयरों की हिस्सेदारी से तय नहीं होता। ट्रस्ट डीड, नॉमिनी डायरेक्टर्स, कोरम की शर्तें और वीटो जैसे अधिकार भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। जब प्रमोटरों के बीच सहमति रहती है तो व्यवस्था आसानी से चलती रहती है, लेकिन मतभेद पैदा होने पर यही प्रावधान कानूनी विवाद का आधार बन सकते हैं।


ये भी पढ़ें: त्योहारों में बरसेगा पैसा: 29 दिन में बाजार में आएंगे 6.20 लाख करोड़, दुर्गा पूजा से दिवाली तक होगी खरीदारी

कंपनियों के लिए इस विवाद से क्या सीख निकलती है?
इस पूरे मामले से कॉर्पोरेट जगत के लिए कुछ अहम सबक भी सामने आते हैं। कंपनियों के आर्टिकल्स में सिर्फ बाहरी चुनौतियों से निपटने की व्यवस्था होना काफी नहीं है, बल्कि नॉमिनी निदेशकों के बीच मतभेद की स्थिति से निपटने का रास्ता भी साफ होना चाहिए। इसी तरह, कोरम की शर्तों को किसी बाहरी ट्रस्ट या संस्था के कामकाज पर पूरी तरह निर्भर रखने से बचना जरूरी है। कॉर्पोरेट गवर्नेंस से जुड़े नियम बनाते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वे केवल सामान्य परिस्थितियों में ही नहीं, बल्कि सबसे कठिन और विवादित परिस्थितियों में भी स्पष्ट तरीके से काम करें।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed