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वसीयत बनाना काफी नहीं, सही प्रारूप चुनें: यह महज जायदाद बांटने की चिट्ठी नहीं, कानूनी औजार है

Mon, 07 Sep 2026 10:44 AM IST
द बोनस बोनस डेस्क, अमर उजाला।
बोनस डेस्क, अमर उजाला। Published by: द बोनस Updated Mon, 07 Sep 2026 10:44 AM IST
सार

एस्टेट प्लानिंग में वसीयत केवल जायदाद बांटने की चिट्ठी नहीं, बल्कि यह तय करने का कानूनी औजार है कि आपके न रहने पर क्या होना चाहिए और क्या बिल्कुल नहीं।

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Merely making will not enough choose right format it is legal instrument not just letter to distribute assets
वसीयत और संपत्ति का बंटवारे में कई बातों पर ध्यान जरूरी? - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

नेक्शजेन एस्टेट प्लानिंग सॉल्यूशंस के फाउंडर डायरेक्टर डॉ. दीपक जैन के अनुसार, वसीयत का चुनाव करते समय परिवार की जरूरतों, भावी पीढ़ियों और कानूनी पेचीदगियों को समझना अनिवार्य है।
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5 तरह की होती हैं वसीयत
  1. साधारण वसीयतः सीधे-सादे परिवार और सीमित संपत्ति के लिए यह पर्याप्त है। ध्यान रहे, यह केवल एक पीढ़ी तक ही संपत्ति का प्रबंध कर सकती है। अगली पीढ़ियों के लिए यह काम नहीं आती।
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  3. शर्त आधारित वसीयतः इसमें संपत्ति हस्तांतरण के साथ कानूनी शर्त जोड़ी जाती है। मसलन, पुत्र की उम्र 30 वर्ष पूरी होने पर ही संपत्ति उसे मिले, अन्यथा पत्नी के पास रहे।
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  5. पारस्परिक व संयुक्त वसीयतः पारस्परिक वसीयत में पति-पत्नी अलग-अलग दस्तावेजों में एक-दूसरे को सब कुछ सौंपते हैं, लेकिन जीवित साथी को बाद में इसे बदलने का पूरा अधिकार रहता है। वहीं, संयुक्त वसीयत एक ही दस्तावेज पर बनती है। एक की मृत्यु के बाद जीवित साथी इसे अकेले बदल नहीं सकता।
  6. हस्तलिखित वसीयतः अपने हाथ से लिखी वसीयत। लिखावट साफ हो, तो अदालत में इस पर धोखाधड़ी या मानसिक रूप से अस्वस्थ होने का आरोप लगाना लगभग नामुमकिन होता है।
  7. मौखिक वसीयतः आम नागरिकों के लिए यह अमान्य है (मुस्लिम पर्सनल लॉ में मान्य)। हालांकि, भारतीय कानून में युद्ध में तैनात सैनिकों और मर्चेंट नेवी अधिकारियों को आपात स्थिति में मौखिक वसीयत का विशेष अधिकार है, जिसे 60 दिनों में दर्ज कराना होता है।
पति-पत्नी के लिए संयुक्त वसीयत क्यों बेहतर ?
दंपतियों के लिए विशेषज्ञ संयुक्त वसीयत को प्राथमिकता देते हैं। दोनों के जीवित रहने तक वे भावनात्मक और वित्तीय रूप से मजबूत होते हैं। लेकिन किसी एक के जाने के बाद जीवित साथी अकेला और बच्चों पर निर्भर हो जाता है।
  • यदि सिर्फ 'मिरर या म्यूचुअल वसीयत' हो, तो बच्चे जीवित माता या पिता पर दबाव डालकर वसीयत बदलवा सकते हैं, जिससे परिवार में कलह बढ़ती है। संयुक्त वसीयत होने पर जीवित साथी कानूनी रूप से बंधा होता है और बच्चों के किसी भी दबाव को यह कहकर टाल सकता है कि वसीयत बदलना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है।
गवाह का सही चुनाव जरूरी
वसीयत को वैध करने के लिए कम से कम 2 गवाह अनिवार्य हैं। जिसे संपत्ति मिल रही है या उसका जीवनसाथी, कभी गवाह नहीं बन सकता। गवाह आपसे उम्र में छोटा और स्वस्थ हो, ताकि उसके जीवित रहने की संभावना अधिक रहे।
  • परिवार का निष्पक्ष शुभचिंतक हो। उसकी ईमानदारी असंदिग्ध हो।
  • उसे बुनियादी कानूनी प्रक्रियाओं की सामान्य समझ होनी चाहिए।
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