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यूपीआई पर एमडीआर की मार: क्या महंगा होगा म्यूचुअल फंड निवेश? जानें एसआईपी और एकमुश्त निवेश पर क्या होगा असर

Mon, 28 Sep 2026 06:41 AM IST
प्रशांत तिवारी बोनस डेस्क, अमर उजाला।
बोनस डेस्क, अमर उजाला। Published by: प्रशांत तिवारी Updated Mon, 28 Sep 2026 06:41 AM IST
सार

15 अक्टूबर से चुनिंदा यूपीआई लेनदेन पर MDR लागू होगा। म्यूचुअल फंड के यूपीआई ऑटोपे SIP को इससे छूट मिलेगी, जबकि एकमुश्त निवेश पर 0.02% शुल्क लगेगा। ब्रोकर वॉलेट टॉप-अप भी इसके दायरे में आएंगे, जिससे ब्रोकिंग कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और उसका असर ग्राहकों पर पड़ने की आशंका है। 

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Impact of MDR  UPI Mutual Fund Investments Become Costlier Find Out How SIP and Lump Sum Investments Affected
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

यूपीआई ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होने जा रहा है। इस नए शुल्क के दायरे में म्यूचुअल फंड और शेयर ब्रोकिंग से जुड़े कुछ खास भुगतान भी आएंगे। हालांकि, आम निवेशकों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इसका असर उनकी जेब पर पड़ेगा और क्या म्यूचुअल फंड कंपनियां या ब्रोकर इस अतिरिक्त लागत का बोझ ग्राहकों पर डालेंगे?

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15 अक्टूबर से चुनिंदा UPI ट्रांजैक्शन पर लगेगा MDR
15 अक्टूबर से चुनिंदा यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर शुल्क देना होगा। यह चार्ज मुख्य रूप से म्यूचुअल फंड में एकमुश्त किए जाने वाले निवेश, डेट-मार्केट भुगतानों और ब्रोकर वॉलेट टॉप-अप करने के लिए यूपीआई इस्तेमाल करने पर लगेगा। यह शुल्क 15 लाख रुपये से कम के भुगतान पर ट्रांजैक्शन के आकार के हिसाब से लगेगा, जबकि 15 लाख रुपये से अधिक के लेनदेन पर अधिकतम 300 रुपये का फ्लैट चार्ज तय किया गया है।
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म्यूचुअल फंड निवेशकों को कितना देना होगा?
राहत की बात यह है कि यूपीआई ऑटोपे के जरिये चलने वाले म्यूचुअल फंड एसआईपी इस चार्ज से पूरी तरह मुक्त हैं। जो निवेशक यूपीआई के जरिये एकमुश्त पैसा लगाते हैं, उन्हें 0.02% के इस एमडीआर का सामना करना पड़ेगा। जानकारों का मानना है कि म्यूचुअल फंड उद्योग इस लागत को खुद ही वहन कर सकता है और इसे निवेशकों पर नहीं डालेगा। हालांकि, यदि कोई निवेशक लिक्विड फंड्स में बार-बार पैसे डालेगा और निकालेगा, तो फंड हाउसों की लागत जरूर बढ़ेगी। ऐसे में कुछ कंपनियां नेट बैंकिंग या एनईएफटी जैसे वैकल्पिक तरीकों को अपनाने के लिए कह सकती हैं।
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शेयर बाजार के निवेशकों और ब्रोकरों पर भी असर
सभी ब्रोकिंग फर्म इस दायरे में आएंगी, विशेषकर डिस्काउंट ब्रोकर और शून्य ब्रोकरेज देने वाली कंपनियां इससे अधिक प्रभावित हो सकती हैं। ब्रोकरों का कहना है कि निवेशक कई बार ट्रेडिंग खाते में पैसे ट्रांसफर करते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वे तुरंत ट्रेड करें। बिना ट्रेडिंग के केवल वॉलेट टॉपअप करने पर भी ब्रोकरों को यह शुल्क चुकाना होगा।


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क्या ग्राहकों पर डाल सकते हैं अतिरिक्त लागत?
ऐसा अंदेशा है कि ब्रोकर इस लागत को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ग्राहकों तक पहुंचा सकते हैं या फिर यूपीआई ट्रांसफर के बजाय अन्य माध्यमों का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। जेरोधा के फाउंडर नितिन कामत ने सोशल मीडिया पर कहा है कि यदि हर यूपीआई ट्रांसफर पर लागत आएगी, तो इसे अनिश्चितकाल तक सोख पाना मुश्किल होगा।

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