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ईयू: भारतीय आईटी कंपनियों पर अनिश्चितता की तलवार

Sat, 25 Jun 2016 02:05 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 25 Jun 2016 02:05 AM IST
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sword of uncertainty on Indian IT companies after britains referendum result
आईटी उद्योग का लगभग 30 फीसदी निर्यात यूरोप में - फोटो : Reuters
औद्योगिक संगठन नैसकॉम का कहना है कि यूरोपीय यूनियन से ब्रिटेन के अलग होने पर भारत के 108 अरब डॉलर के सूचना प्रौद्योगिकी निर्यात उद्योग पर निकट भविष्य में अनिश्चितता आने की आशंका है। लेाकिन लंबे समय में यह फैसला भारत के लिए चुनौतियों के साथ अवसर भी लेकर आएगा।
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भारत के आईटी-बीपीएम उद्योग के  लिए यूरोप दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। आईटी उद्योग का लगभग 30 फीसदी निर्यात यूरोप में होता है और इसमें 17 फीसदी हिस्सेदारी ब्रिटेन की है। 
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नैस्कॉम के अध्यक्ष आर. चंद्रशेखर के मुताबिक नैस्कॉम ने ब्रुसेल्स व लंदन के नीति निर्माताओं से जल्द से जल्द इस मामले में अपने दिशा-निर्देश को स्पष्ट करने की गुजारिश की है ताकि यूरोप व ब्रिटेन में निवेश को लेकर भारतीय आईटी कंपनियां अनिश्चतता में नहीं रहें।
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नैस्कॉम के मुताबिक आईटी निर्यात में ब्रिटेन  की काफी अहम भूमिका है क्योंकि अधिकतर आईटी कंपनियां ब्रिटेन को यूरोप में प्रवेश गेट के रूप में इस्तेमाल करती हैं। नैस्कॉम का कहना है कि ब्रिटिश पौंड के मूल्य में गिरावट आने से पहले से जारी अनुबंध प्रभावित होंगे और प्राप्त होने वाले राजस्व में कमी आएगी। इस कमी की भरपाई ब्रिटेन की कंपनियों के साथ नई सेवा शर्त तय करने पर ही हो पाएगी।

नैसकॉम का मानना है कि ब्रिटेन के ईयू से बाहर आने से जो अनिश्चितता आई है उससे कई बड़ी परियोजनाएं प्रभावित होंगी क्योंकि ईयू के दोबारा से परियोजना की सेवा शर्तें को लेकर बातचीत के बाद ही तय हो पाएगा कि पुरानी परियोजनाओं पर काम जारी रहता है या फिर उन परियोजनाओं को छोड़ना पड़ता है।

नैस्कॉम के मुताबिक भारतीय आईटी कंपनियों को ईयू के साथ कारोबार करने के लिए अलग मुख्यालय की स्थापना करनी होगी। इससे कंपनियों के विनिवेश के साथ अपने प्रशिक्षित कर्मचारियों को भी यूरोप की कई जगहों पर भेजना पड़ेगा।

ब्रेक्जिट से भारत को हो सकता है फायदा : फियो सीईओ 

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फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशंस (फियो) के सीईओ व महानिदेशक अजय सहाय का कहना है कि ईयू से ब्रिटेन के अलग होने से भारत को लंबे समय में इसका फायदा भी मिल सकता है। उनका कहना है कि ईयू से अलग होने के बाद ब्रिटेन के पास अपने सारे नए दिशा-निर्देश व ईयू के साथ नए नियमों को तय करने के लिए दो साल का समय होगा। ऐसे में फिलहाल जो भी समस्या आएगी वह मुद्रा से जुड़ी होगी। 

सहाय ने कहा कि ईयू से अलग होने पर ब्रिटेन का दर्जा भी ईयू के लिए भारत की तरह हो जाएगा और ब्रिटेन ईयू के अन्य देशों में शुल्क मुक्त निर्यात नहीं कर पाएगा। ऐसे में भारत ब्रिटेन को उन देशों में होने वाले निर्यात में कड़ा मुकाबला दे सकता है और भारतीय निर्यातकों के लिए उन देशों में संभावनाएं बनेंगी। वैसे ही, ब्रिटेन में ईयू के अन्य देशों के नागरिकों की आवाजाही रुक जाएगी और इसका फायदा भारत के सेवा निर्यातकों को मिल सकता है।

उन्होंने कहा कि अगर ब्रिटेन को पहले की तरह ही ईयू के साथ शुल्क मुक्त व्यापार की इजाजत दे दी जाती है और ईयू के लोगों का बेरोकटोक आने-जाने की इजाजत रहती है तो भारत के लिए कुछ खास नहीं बदलेगा। वर्ष 2015-16 में भारत ने ईयू में 35.35 अरब डॉलर का निर्यात किया वहीं इस अवधि में ब्रिटेन में भारत ने 9.35 अरब डॉलर का निर्यात किया।

सहाय कहते हैं कि करेंसी में गिरावट से ईयू व ब्रिटेन में आयात महंगा होगा और उनकी लागत अधिक होगी। ऐसे में भारत के निर्यात अफ्रीकी देशों में ब्रिटेन व ईयू से होने वाले निर्यात का मुकाबला कर पाएंगे या उन्हें मात दे पाएंगे।

Published By Rahul Sankrityayan
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