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क्या मोरेटोरियम अवधि के दौरान ऋण के ब्याज पर लगेगा ब्याज? पांच अक्तूबर को होगी सुनवाई

Mon, 28 Sep 2020 12:04 PM IST
‌डिंपल अलवधी बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ‌डिंपल अलवधी Updated Mon, 28 Sep 2020 12:04 PM IST
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Supreme Court adjourns for 5 October hearing on PIL against charging interest on interest on loan during moratorium
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : पीटीआई

सुप्रीम कोर्ट (SC) ने लोन मोरेटोरियम अवधि के दौरान ऋण के ब्याज पर ब्याज लेने के खिलाफ दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई पांच अक्तूबर यानी सोमवार के लिए स्थगित कर दी है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ एडवोकेट राजीव दत्ता ने कहा कि केंद्र सरकार इस मामले में कोई ठोस फैसला नहीं ले पाई है। इसलिए सरकार को और समय चाहिए।

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कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक अक्तूबर तक हलफनामा देने को कहा है। पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मोरेटोरियम की अवधि में स्थगित कर्ज की किस्तों के ब्याज पर ब्याज वसूलने का कोई तुक नहीं है। ग्राहकों को कुल छह महीने तक किस्त टालने का विकल्प मिला था।
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केंद्र ने शीर्ष अदालत को बताया कि इस मामले में बहुत गंभीरता के साथ विचार किया गया है और निर्णय लेने की प्रक्रिया बेहद उन्नत स्तर पर है। न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वह विभिन्न उद्योगों, व्यापार संघों और व्यक्तियों द्वारा दायर याचिका की सुनवाई पांच अक्तूबर को करेगी। 

इस बीच ईएमआई के भुगतान को लेकर कई सवाल खड़े हुए हैं। ऋण स्थगन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि, 'हमारी चिंता केवल यह है कि क्या स्थगित किए गए ब्याज को बाद में देय शुल्कों में जोड़ा जाएगा या ब्याज पर ब्याज लगेगा।'

न्यायालय ने इससे पहले 12 जून को वित्त मंत्रालय और आरबीआई से तीन दिन के भीतर एक बैठक करने को कहा था जिसमें रोक अवधि के दौरान स्थगित कर्ज किस्त के भुगतान पर ब्याज पर ब्याज वसूली से छूट दिए जाने पर फैसला करने को कहा गया। शीर्ष अदालत का मानना है कि यह पूरी रोक अवधि के दौरान ब्याज को पूरी तरह से छूट का सवाल नहीं है, बल्कि यह मामला बैंकों की ओर से ब्याज के ऊपर ब्याज वसूले जाने तक सीमित है।

बिगड़ सकती है बैंकों की वित्तीय स्थिति
इससे पहले आरबीआई ने उच्चतम न्यायालय से कहा था कि कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर वह कर्ज किस्त के भुगतान में राहत के हर संभव उपाय कर रहा है। लेकिन जबरदस्ती ब्याज माफ करवाना उसे सही निर्णय नहीं लगता है क्योंकि इससे बैंकों की वित्तीय स्थिति बिगड़ सकती है। इसका खामियाजा बैंक के जमाधारकों को भी भुगतना पड़ सकता है। 

रिजर्व बैंक ने किस्त भुगतान पर रोक के दौरान ब्याज लगाने को चुनौती देने वाली याचिका का जवाब देते हुए कहा था कि उसका नियामकीय पैकेज, एक स्थगन, रोक की प्रकृति का है, इसे माफी अथवा इससे छूट के तौर पर नहीं माना जाना चाहिए।  

केंद्र सरकार की तरफ से अदालत में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पहले कहा था, 'बैंकिंग क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, हम ऐसा कोई भी निर्णय नहीं ले सकते हैं जो अर्थव्यवस्था को कमजोर कर सकता है। हमने ब्याज माफ नहीं करने का फैसला लिया है लेकिन भुगतान के दबाव को कम किया जाएगा।'


बैंकों को हो सकता है दो लाख करोड़ का नुकसान
रिजर्व बैंक ने कोरोना वायरस लॉकडाउन के कारण आर्थिक गतिविधियों के बंद रहने के दौरान पहले तीन माह और उसके बाद फिर तीन माह और कर्जदारों को उनकी बैंक किस्त के भुगतान से राहत दी थी। इस दौरान किस्त नहीं चुकाने पर बैंक की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की गई। आरबीआई ने कहा कि इस अवधि का ब्याज भी नहीं लिया गया, तो बैंकों को दो लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा।

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